बॉम्बे हाईकोर्ट ने 83 वर्षीय बुजुर्ग पिता के साथ दुर्व्यवहार और मारपीट के मामले में 52 वर्षीय बेटे को घर से निकालने के आदेश को सही ठहराया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिकों को शांतिपूर्ण और गरिमापूर्ण जीवन जीने का पूरा अधिकार है और किसी भी संतान को उनके इस अधिकार का हनन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
जस्टिस एन जे जमादार की एकल पीठ ने मुंबई के कलिना स्थित आवास से बेटे को बेदखल करने के भरण-पोषण न्यायाधिकरण (मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल) और अपीलीय न्यायाधिकरण के फैसलों के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी। अदालत ने अपने 27 अगस्त के आदेश में कहा कि सीसीटीवी फुटेज और मेडिकल रिकॉर्ड्स से बुजुर्ग पिता पर हुए हमलों और दुर्व्यवहार की पुष्टि होती है।
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि भाई-बहनों के बीच संपत्ति को लेकर विवाद हो सकता है, लेकिन यह बुजुर्ग पिता के साथ किए गए अशोभनीय और आपत्तिजनक आचरण को किसी भी तरह सही नहीं ठहरा सकता। रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत दर्शाते हैं कि याचिकाकर्ता के बर्ताव से वरिष्ठ नागरिक का सामान्य, शांत और सम्मानजनक जीवन गंभीर रूप से प्रभावित हुआ था।
वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत बेदखली का अधिकार
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 एक कल्याणकारी कानून है। इसका मूल उद्देश्य बुजुर्गों को उपेक्षा, प्रताड़ना और बुनियादी जरूरतों से वंचित होने से बचाना है, जिसमें उनके आवास और संपत्ति की सुरक्षा भी शामिल है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी वरिष्ठ नागरिक ने औपचारिक रूप से वित्तीय भरण-पोषण की मांग नहीं भी की है, तब भी कानून के तहत बेदखली का आदेश दिया जा सकता है। कानून में ‘भरण-पोषण’ की परिभाषा में आवास का अधिकार भी शामिल है। इसका एक नकारात्मक पहलू यह भी है कि बच्चों या रिश्तेदारों को किसी बुजुर्ग को उनके ही घर में रहने और शांतिपूर्ण उपभोग से वंचित करने का कोई हक नहीं है।
मारपीट के आरोप और पुलिस शिकायतें
मामले के अनुसार, 83 वर्षीय पिता ने 2007 के कानून के तहत ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाकर अपने 52 वर्षीय बेटे को घर से निकालने की गुहार लगाई थी। पिता का आरोप था कि उनका बेटा शराब का आदी है, उसका स्वभाव आक्रामक और हिंसक है, और वह लगातार उनके तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मारपीट व बदसलूकी करता है। इसके अलावा वह संपत्ति बेचकर पैसे देने का दबाव भी बना रहा था।
पिता की ओर से जुलाई 2022 और फरवरी 2023 की घटनाओं के बाद पुलिस में दो औपचारिक शिकायतें भी दर्ज कराई गई थीं। पिता का पक्ष रख रहे वकील निरंजन मुंदारगी ने अदालत के समक्ष मेडिकल दस्तावेज और सुरक्षा कैमरों की फुटेज पेश की। उन्होंने दलील दी कि फुटेज में याचिकाकर्ता अपने बुजुर्ग पिता पर हमला करता हुआ साफ दिखाई दे रहा है।
संपत्ति विवाद और झूठे आरोपों का दावा खारिज
याचिकाकर्ता बेटे की ओर से पेश वकील सोनल परब, ईशा राणे और सुधांशु सावंत ने दलीलों में कहा कि उनके मुवक्किल को घर से बेदखल करने के लिए 2007 के कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है। बेटे ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया कि उसके भाई और भाभी ने संपत्ति हड़पने के मकसद से ये झूठे आरोप गढ़े हैं, क्योंकि उस संपत्ति के एकमात्र मालिक पिता नहीं हैं। उसने यह भी कहा कि वह अपने माता-पिता के इलाज और बीमा खर्च का भुगतान करता रहा है।
बचाव पक्ष ने यह तर्क भी दिया कि 13 वर्षों के दौरान केवल दो बार ही पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई थी। हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि माता-पिता आमतौर पर अपनी संतानों के खिलाफ पुलिस या कानूनी एजेंसियों के पास नहीं जाते। जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तब अंतिम विकल्प के रूप में ही पुलिस में शिकायत की जाती है।
निचली अदालतों के फैसले पर हस्तक्षेप से इनकार
इससे पहले मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल ने 11 सितंबर 2024 को बेटे को मकान खाली करने का निर्देश दिया था। इस फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए अपीलीय ट्रिब्यूनल ने भी 12 दिसंबर 2024 को बेदखली का आदेश बरकरार रखा था।
हाईकोर्ट ने माना कि दोनों ट्रिब्यूनल का यह निष्कर्ष पूरी तरह उचित था कि बुजुर्ग को शांतिपूर्ण जीवन देने के लिए बेटे को परिसर से हटाना जरूरी था। अदालत ने यह दर्ज करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया कि बेदखली की कार्रवाई पहले ही पूरी हो चुकी है, जिससे बुजुर्ग पिता के जीवन में शांति और सामान्य स्थिति बहाल हो गई है।

