दिल्ली हाईकोर्ट ने अपनी पत्नी को जबरन बेगॉन कीटनाशक (स्प्रे) पिलाकर जान से मारने की कोशिश करने के आरोपी व्यक्ति को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने मामले में किसी भी तरह के चिकित्सकीय साक्ष्य के न होने और अभियोजन पक्ष के कमजोर बयानों को आधार बनाते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई तीन साल की कैद की सजा को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
चिकित्सकीय साक्ष्यों और लक्षणों का अभाव
जस्टिस विमल कुमार यादव ने 24 अगस्त को सुनाए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष ऐसी कोई मेडिकल रिपोर्ट पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि महिला के शरीर में कीटनाशक के अंश मौजूद थे। अदालत ने कहा कि यदि महिला को जबरन जहरीला पदार्थ पिलाया गया होता, तो उसमें सांस लेने में तकलीफ, खांसी, बेहोशी या शरीर में कंपन जैसे लक्षण जरूर दिखाई देते। हाईकोर्ट ने माना कि यद्यपि दंपत्ति के बीच घरेलू विवाद मौजूद था, लेकिन केवल आपसी अनबन के आधार पर हत्या के प्रयास का अपराध सिद्ध नहीं माना जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि और निचली अदालत का फैसला
यह पूरा विवाद 20 अप्रैल 2001 की घटना से जुड़ा है। इस जोड़े का विवाह 5 मार्च 2000 को हुआ था। घटना के बाद दर्ज कराई गई प्राथमिकी के अनुसार, पत्नी ने आरोप लगाया था कि विवाद के दौरान पति ने पहले एक गिलास के जरिए और फिर सीधे कंटेनर से उसके मुंह में कीटनाशक उंडेलने की कोशिश की थी।
शिकायत के आधार पर पुलिस ने पति और उसकी मां के खिलाफ प्रताड़ना तथा हत्या के प्रयास की धाराओं में मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया था। 5 अप्रैल 2004 को निचली अदालत ने दोनों को प्रताड़ना के आरोपों से बरी कर दिया था, हालांकि पति को हत्या के प्रयास का दोषी मानते हुए तीन साल के सश्रम कारावास और 5,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।
बचाव पक्ष और अभियोजन की दलीलें
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे बचाव पक्ष के वकील संजय सूरी, विन्नी शांगलू और ऋषभ रतन ने दलील दी कि यह मामला पूरी तरह मनगढ़ंत है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि महिला अपनी सास से अलग रहना चाहती थी और पति के नाम दर्ज संपत्ति में हिस्सा मांग रही थी। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि महिला के पिता पुलिस अधिकारी थे और उन्हीं के प्रभाव में आकर पति को झूठे मामले में फंसाने की साजिश रची गई थी।
दूसरी तरफ, राज्य सरकार की ओर से पेश वकील सत्येंद्र सिंह बावा ने निचली अदालत के निर्णय को न्यायसंगत बताते हुए कहा कि पीड़ित पत्नी का बयान पूरी तरह विश्वसनीय है।
वैवाहिक संबंधों पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने वैवाहिक जीवन के विरोधाभासों पर भी गहरा ध्यान आकर्षित किया। अदालत ने टिप्पणी की कि पति-पत्नी का रिश्ता आपसी विश्वास और सहचर्य पर टिका होता है, लेकिन समय रहते आपसी मतभेदों को न सुलझाया जाए तो सुंदर रिश्ता भी कड़वाहट में बदल जाता है। कोर्ट ने कहा कि दंपत्ति के बीच का तनाव केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज को प्रभावित करता है।
अदालत ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य अत्यंत संदेहास्पद हैं और ऐसे अधूरे सबूतों के आधार पर दोषसिद्धि को बनाए रखना न्यायसंगत नहीं होगा, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाता है।

