इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने संस्थानों में बैचलर ऑफ फार्मेसी (बी.फार्म) पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए राज्य सरकार से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) प्राप्त करने की अनिवार्यता पर कई सवाल खड़े किए हैं। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) को इस मुद्दे पर प्रासंगिक दस्तावेजों के साथ दो सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत पक्ष रखने का निर्देश दिया है।
यह निर्देश पीसीआई, उत्तर प्रदेश सरकार और विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों के बीच दायर याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई करते हुए जारी किया गया।
एनओसी के मानदंडों और प्रारूप पर सवाल
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान बैचलर ऑफ फार्मेसी कोर्स रेगुलेशंस, 2014 का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि नियमों के अनुसार मंजूरी चाहने वाले संस्थानों के पास आवश्यक भवन, प्रयोगशालाएं, उपकरण और पर्याप्त शैक्षणिक व गैर-शैक्षणिक कर्मचारी होना अनिवार्य है। ऐसे में पीठ ने सवाल उठाया कि जब बुनियादी ढांचा जांचने के नियम तय हैं, तो राज्य सरकार द्वारा एनओसी जारी करने के लिए कोई निश्चित प्रारूप या स्पष्ट मानदंड क्यों निर्धारित नहीं किए गए हैं।
इसके साथ ही अदालत ने इस अंतर पर भी सवाल उठाया कि बी.फार्म जैसे चार वर्षीय डिग्री कोर्स के लिए राज्य की एनओसी अनिवार्य की गई है, जबकि दो वर्षीय डिप्लोमा इन फार्मेसी (डी.फार्म) पाठ्यक्रम के लिए ऐसी कोई शर्त लागू नहीं है।
संबद्धता और एनओसी के बीच अंतर
अदालत ने पीसीआई को निर्देश दिया है कि वह रेगुलेशन 9 के तहत उल्लिखित योजना के अर्थ और दायरे को स्पष्ट करे। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया गया है कि वह अतीत में जारी की गई एक या दो एनओसी को उदाहरण के रूप में रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करे।
पीठ ने टिप्पणी की कि प्रथम दृष्टया किसी संस्थान को संबद्धता (अaffiliation) देना संबंधित विश्वविद्यालय या संबद्ध प्राधिकारी का विषय है। यह प्रक्रिया पीसीआई द्वारा शुरुआती मंजूरी दिए जाने के बाद अमल में आती है, क्योंकि पीसीआई के पास खुद का निरीक्षण ढांचा मौजूद है जिसके जरिए वह निर्धारित मानकों की पूर्ति का आकलन करती है।
शासनादेश और शून्य सत्र पर सुनवाई
हाईकोर्ट ने 31 अक्टूबर 2025 को जारी उत्तर प्रदेश सरकार के उस आदेश पर भी स्पष्टीकरण मांगा है, जिसके तहत बी.फार्म पाठ्यक्रमों के शुरुआती आवेदन स्तर पर एनओसी की शर्त को समाप्त कर दिया गया था। अदालत ने पीसीआई से पूछा है कि क्या वह इस सरकारी आदेश को चुनौती देने की कानूनी स्थिति में है।
इसके अलावा, खंडपीठ इस बात की भी कानूनी जांच करेगी कि क्या राज्य सरकार के पास बी.फार्म और डी.फार्म पाठ्यक्रमों या संस्थानों पर मोरैटोरियम (रोक) लगाने और शून्य सत्र (ज़ीरो सेशन) घोषित करने का अधिकार क्षेत्र है। अदालत इस पूरे मामले पर दो सप्ताह बाद पुनः सुनवाई करेगी।

