कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि पति अपनी पत्नी को घरेलू कामकाज करने या अपने माता-पिता की देखभाल करने के लिए आदेश नहीं दे सकता और न ही इसके लिए मजबूर कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि शादी असमान लोगों के बीच का रिश्ता नहीं है। जस्टिस डॉ. चिल्लाकुर सुमलता की एकल पीठ ने पति की उस पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया, जिसमें उसने पारिवारिक अदालत द्वारा पत्नी और नाबालिग बेटी को दिए गए भरण-पोषण भत्ते को चुनौती दी थी।
मामले का पृष्ठभाग
यह मामला पत्नी और उसकी नाबालिग बेटी द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 144 के तहत 30,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण की मांग को लेकर दायर याचिका से शुरू हुआ था। 5 नवंबर 2025 को प्रथम अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, तुमकुरु ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पति को अपनी पत्नी को 5,000 रुपये और नाबालिग बेटी को 4,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया था।
पारिवारिक अदालत के इस आदेश से असंतुष्ट होकर पति ने फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 19(4) के तहत हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की और दावा किया कि तय की गई राशि अत्यधिक है।
दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता पति ने दलील दी कि उसकी पत्नी अपनी मर्जी से नाबालिग बच्चे को लेकर ससुराल छोड़कर चली गई थी और उसने कभी भी उनका अनादर या भरण-पोषण करने से इनकार नहीं किया। उसने कहा कि वह कुली का काम करके अपना जीवन यापन करता है और उसे अपने माता-पिता का भी ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए वह 9,000 रुपये प्रति माह देने में असमर्थ है।
पति ने निकला अदालत में दर्ज अपने जवाब में कहा कि शादी के शुरुआती छह महीनों के बाद पत्नी का रवैया उसके माता-पिता के प्रति बदल गया, उसने घर का काम करना बंद कर दिया और सास-ससुर की देखभाल नहीं की। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी उसके या उसके माता-पिता की अनुमति के बिना कई बार मायके चली गई।
दूसरी ओर, पत्नी का कहना था कि शादी के शुरुआती दो साल वे खुशी-खुशी रहे, लेकिन बाद में पति और उसके परिवार ने उसे मौखिक प्रताड़ना, शारीरिक हिंसा और अतिरिक्त पैसे लाने के लिए परेशान करना शुरू कर दिया। उसने आरोप लगाया कि पति जुए और शराब की लत में डूबा रहता था और अक्सर मारपीट करके उसे चोट पहुंचाता था। उसने यह भी बताया कि पति ने तलाक की याचिका दायर की है, लेकिन तमाम प्रताड़ना के बावजूद वह उसके साथ रहने और वैवाहिक दायित्व निभाने को तैयार है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
पति द्वारा अनुमति बिना मायके जाने और घरेलू काम न करने की दलीलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि पति का यह रुख पत्नी पर हुक्म चलाने और नियंत्रण रखने की इच्छा को दर्शाता है। मायके जाने के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा:
“यह कोर्ट नहीं समझता कि किसी भारतीय महिला को अपने मायके जाने की अपनी बुनियादी इच्छा पूरी करने के लिए ससुराल में मौजूद सभी लोगों से अनुमति लेने की आवश्यकता क्यों है, जब भी वह जाना चाहे।”
घरेलू काम करने और सास-ससुर की सेवा करने के दबाव पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने माना:
“पति सहित कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी या किसी भी महिला को घर के काम करने और अपने माता-पिता की देखभाल करने का आदेश या मांग नहीं कर सकता। घरेलू गतिविधियों को पुरुषों और महिलाओं द्वारा समान रूप से साझा किया जाना चाहिए। यदि माता-पिता की देखभाल करने की आवश्यकता है, तो इसका प्राथमिक कर्तव्य बेटे या बेटी का है, न कि दामाद या बहू का। सास-ससुर की देखभाल करना बहू या दामाद का स्वेच्छा से किया गया कार्य होना चाहिए, न कि जबरदस्ती।”
शादी के मूल स्वरूप और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को रेखांकित करते हुए कोर्ट ने कहा:
“शादी दूसरी पार्टी की व्यक्तिगत पहचान, स्वतंत्रता और इच्छा को नियंत्रित करने, आदेश देने, हावी होने या उस पर कब्जा करने का लाइसेंस नहीं है।”
“परिवार के प्रति पत्नी के समर्पण को कभी भी आज्ञाकारिता और अधीनता से नहीं मापा जा सकता। शादी असमान लोगों के बीच का रिश्ता नहीं है। केवल लिंग के आधार पर महिला की स्वायत्तता को छीनने या उसकी स्वतंत्रता को सीमित करने का कोई भी प्रयास समानता के सिद्धांतों के विपरीत है और मानव गरिमा तथा सामाजिक न्याय की संवैधानिक भावना के खिलाफ है।”
इन परिस्थितियों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि पत्नी के पास पति से अलग रहने का पर्याप्त और उचित कारण था।
भरण-पोषण की राशि पर विचार करते हुए कोर्ट ने गणना की कि कुल 9,000 रुपये प्रति माह की राशि दो लोगों के लिए 300 रुपये रोजाना या 150 रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन बैठती है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि वर्तमान महंगाई और जीवन यापन के खर्च को देखते हुए 150 रुपये प्रतिदिन प्रति व्यक्ति न्यूनतम जीवन स्तर बनाए रखने के लिए भी पर्याप्त नहीं है, इसलिए इसमें कटौती का कोई आधार नहीं बनता।
हाईकोर्ट का अंतिम फैसला
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिका में कोई मेरिट नहीं है, इसलिए पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के भरण-पोषण आदेश को बरकरार रखा।
वाद संख्या: आरपीएफसी संख्या 9/2026 (सीएनआर: केएएचसी010028852026)

