लखनऊ के व्यस्त अमीनाबाद इलाके में बनी पुलिस चौकी को हटाने या ढहाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस चौकियां पुलिस अधिकारियों के व्यक्तिगत उपयोग के लिए नहीं, बल्कि आम जनता की सुरक्षा और सुविधा के लिए बनाई जाती हैं।
ज़मीन की कमी और घनी आबादी का हवाला
यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने गुरुवार को एम.एल. यादव द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। याचिकाकर्ता का तर्क था कि अमीनाबाद पुलिस चौकी का निर्माण अवैध रूप से किया गया है, इसलिए इसे हटाया जाना चाहिए और सरकार को किसी अन्य स्थान पर ज़मीन अधिग्रहीत करके नई चौकी बनानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अमीनाबाद एक बेहद घना और भीड़भाड़ वाला इलाका है, जहां खाली ज़मीन का मिलना लगभग नामुमकिन है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि वैकल्पिक ज़मीन अधिग्रहण का सुझाव देना आसान लग सकता है, लेकिन ऐसे घने क्षेत्र में इसे धरातल पर उतारना बेहद कठिन है। पीठ ने माना कि जब जनहित में चौकी पहले से काम कर रही है, तो उसे गिराने का आदेश देना तर्कसंगत नहीं होगा।
पुलिस कमिश्नर के समक्ष प्रत्यावेदन का विकल्प
इसके बावजूद, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को लखनऊ के पुलिस कमिश्नर के सामने अपनी बात रखने की छूट दी है। अदालत ने कहा कि यदि चौकी को किसी अन्य उपलब्ध स्थान पर स्थानांतरित करना व्यावहारिक रूप से संभव हो, तो पुलिस प्रशासन उस विकल्प पर विचार कर सकता है।
इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने शहर के अन्य हिस्सों में भी कथित रूप से अवैध रूप से बनी पुलिस चौकियों का मुद्दा उठाया था। इस पर पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता इन मामलों को भी प्रत्यावेदन के जरिए पुलिस कमिश्नर के समक्ष रख सकते हैं, जिसका निस्तारण कानून के मुताबिक किया जाएगा।

