पुलिस के सामने दिया गया कबूलनामा साक्ष्य अधिनियम के तहत अमान्य, अधूरी परिस्थितिजन्य कड़ी पर आरोपी बरी: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

हत्या के आरोपी दो व्यक्तियों की सजा और आजीवन कारावास को रद्द करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिस अधिकारियों के समक्ष दिए गए कबूलनामे भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 25 के तहत अमान्य हैं। कोर्ट ने माना कि पुलिस हिरासत में दर्ज इकबालिया बयानों का इस्तेमाल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की टूटी हुई कड़ी को जोड़ने के लिए नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

घटना 26 जून 2019 की है, जब शिकायतकर्ता पीरित राम (PW-1) ने मर्ग सूचना (Ex.P/1) दर्ज कराई कि रानवाही नहर पुलिया के पास सिर पर गंभीर चोटों वाला एक अज्ञात शव पड़ा है। बाद में मृतक की पहचान पलेश्र्वर निर्मलकर के रूप में हुई।

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, भानुप्रतापपुर के डॉ. एस.एस. नाग (PW-10) ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट (Ex.P/19) में मृतक के सिर की हड्डी टूटने और शरीर पर कई चोटों का उल्लेख करते हुए मृत्यु का कारण गला घोंटना और हत्या बताया। पुलिस ने अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत एफआईआर (Ex.P/2) दर्ज की।

संदेह के आधार पर पुलिस ने मृतक के भाई कौशल उर्फ दीपक निर्मलकर और लोकेश शोरी उर्फ लोकू को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने उनके मेमोरेंडम बयान (Ex.P/9 और Ex.P/10) दर्ज किए और कौशल के पास से टी-शर्ट, मोटरसाइकिल, मिट्टी, धारदार पत्थर और एक लकड़ी का डंडा जब्त किया, जबकि लोकेश के पास से एक फुल शर्ट जब्त की। क्षेत्रीय फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL), जगदलपुर की रिपोर्ट (Ex.P/41) में जब्त की गई कुछ वस्तुओं पर मानव रक्त पाया गया। इसके अलावा, मामले में एक बाल अपचारी के शामिल होने के कारण उसके खिलाफ किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष अलग से कार्यवाही शुरू की गई।

4 सितंबर 2021 को अपर सत्र न्यायाधीश, भानुप्रतापपुर (उत्तर बस्तर कांकेर) ने दोनों आरोपियों को धारा 302/34 और धारा 201 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुश्री सविता तिवारी ने तर्क दिया कि अभियोजन का पूरा मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। मामले में कोई चश्मदीद गवाह नहीं है, न ही अंतिम बार साथ देखे जाने (लास्ट सीन) का कोई साक्ष्य मौजूद है। उन्होंने कहा कि शव खुले सार्वजनिक स्थान पर मिला था, जब्ती के गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास है, हत्या का कारण (मोतिव) साबित नहीं हुआ है और पुलिस द्वारा दर्ज मेमोरेंडम बयान कानूनी रूप से साक्ष्य में स्वीकार्य नहीं हैं। इसके अलावा, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 के तहत आरोपियों द्वारा स्पष्टीकरण न दिए जाने को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की अधूरी कड़ी भरने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

राज्य सरकार की ओर से पेश शासकीय अधिवक्ता श्री जितेंद्र श्रीवास्तव ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि अभियोजन ने अपना मामला संदेह से परे साबित किया है। उन्होंने दलील दी कि हत्या का कारण स्पष्ट था, क्योंकि मृतक शराब और गांजे का आदी था तथा अपनी मां और भाई कौशल से अक्सर झगड़ा करता था। उन्होंने कहा कि प्रकटीकरण बयान, हत्या में प्रयुक्त हथियार व वाहनों की बरामदगी और एफएसएल रिपोर्ट से परिस्थितियों की श्रृंखला पूरी होती है।

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कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष

परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से जुड़े मामलों के कानूनी सिद्धांतों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि मृतक को घटना से ठीक पहले अभियुक्तों के साथ देखे जाने का कोई साक्ष्य नहीं है।

परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने मधु बनाम केरल राज्य (2012) मामले का जिक्र किया और दोहराया:

परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामले में, अभियोजन पक्ष को घटनाओं की एक ऐसी पूर्ण और अटूट कड़ी स्थापित करनी चाहिए, जिससे केवल यही एक अपरिहार्य निष्कर्ष निकले कि अपराध आरोपी ने ही किया है। ठोस परिस्थितिजन्य साक्ष्य के अभाव में, आरोपी संदेह के लाभ का हकदार होगा।

हाईकोर्ट ने शरद बिरधीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य (1984) में प्रतिपादित पांच स्वर्ण सिद्धांतों (‘पंचशील’) का भी संदर्भ दिया, जिन्हें नागेंद्र शाह बनाम बिहार राज्य (2021), सुरेंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021), हनुमंत बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1952), शैलेंद्र राजदेव पासवान बनाम गुजरात राज्य, रवींद्र सिंह बनाम पंजाब राज्य (2022), भगत राम बनाम पंजाब राज्य (1954), और सी. चेंगा रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1996) में दोहराया गया है।

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गवाहों के बयानों का मूल्यांकन करते हुए हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण कमियों को रेखांकित किया:

  • शिकायतकर्ता (PW-1) ने स्वीकार किया कि उसने आरोपियों को पहली बार तब देखा जब पुलिस उन्हें लेकर आई थी।
  • पड़ोसी गवाह (PW-2) मुकर गया (हॉस्टाइल हो गया) और उसने माना कि उसकी गवाही केवल सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थी।
  • मृतक का बहनोई (PW-5) भी मुकर गया और उसने इस बात से इनकार किया कि घटना के दिन कौशल उसकी मोटरसाइकिल ले गया था।
  • मेमोरेंडम गवाह (PW-7) ने विरोधाभासी बयान दिए; उसने पहले कहा कि वह जब्ती के समय पुलिस वाहन में बैठा था और बाद में कहा कि लकड़ी का डंडा थाना में जब्त किया गया था।
  • गवाह PW-8 ने स्वीकार किया कि पुलिस ने उसका बयान दर्ज ही नहीं किया था, जबकि मेमोरेंडम में नामांकित गवाह चमन सलाम से पूछताछ ही नहीं की गई।

साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 और 27 के तहत बयानों की ग्राह्यता पर विचार करते हुए कोर्ट ने असार मोहम्मद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2018), पुलुकुरी कोटैया बनाम किंग एम्परर (1947), और अघनू नगेशिया बनाम बिहार राज्य (1966) के निर्णयों का उल्लेख किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 27 के तहत केवल वस्तु की बरामदगी और उसके छिपे होने की जानकारी ही साक्ष्य में स्वीकार्य है, जबकि पुलिस अधिकारी के समक्ष अपराध कबूल करने वाला हिस्सा धारा 25 के तहत पूरी तरह प्रतिबंधित है।

अघनू नगेशिया बनाम बिहार राज्य मामले को उद्धृत करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

किसी भी परिस्थिति में पुलिस अधिकारी के सामने किया गया कबूलनामा आरोपी के खिलाफ साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं है।

ये प्रावधान इस सिद्धांत पर आधारित हैं कि पुलिस अधिकारी को या पुलिस हिरासत के दौरान दिए गए कबूलनामे पर भरोसा नहीं किया जा सकता, और उनका इस्तेमाल साक्ष्य के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।

खून के धब्बों की बरामदगी और साबित करने के भार पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने दिगंबर वैष्णव बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2019), वर्की जोसेफ बनाम केरल राज्य (1993), और सुजीत बिस्वास बनाम असम राज्य (2013) का हवाला देते हुए कहा:

संदेह, चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, सबूत का स्थान नहीं ले सकता। ‘हो सकता है’ और ‘साबित होगा’ के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है।

यह भी एक स्थापित सिद्धांत है कि आपराधिक मामलों में यदि प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर दो विचार संभव हों—एक आरोपी के दोष की ओर और दूसरा उसकी निर्दोषता की ओर इशारा करता हो—तो वही दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए जो आरोपी के पक्ष में हो।

निचली अदालत द्वारा धारा 313 CrPC के बयानों में आरोपियों द्वारा स्पष्टीकरण न दिए जाने को आधार बनाए जाने पर हाईकोर्ट ने शिवाजी चिंताप्पा पाटिल बनाम महाराष्ट्र राज्य (2021) का हवाला दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि झूठा स्पष्टीकरण या स्पष्टीकरण का अभाव केवल तब एक अतिरिक्त परिस्थिति बन सकता है जब अभियोजन पहले ही एक पूरी श्रृंखला स्थापित कर चुका हो, लेकिन इसका उपयोग किसी अधूरी श्रृंखला की कमियों को भरने के लिए नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की एक पूर्ण और अटूट श्रृंखला स्थापित करने में विफल रहा। आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए कोर्ट ने क्रिमिनल अपील संख्या 1063/2021 और क्रिमिनल अपील संख्या 1066/2021 को स्वीकार कर लिया।

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अदालत ने 7 सितंबर 2021 के दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द करते हुए दोनों अभियुक्तों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि कौशल उर्फ दीपक निर्मलकर (जो 29 जून 2019 से जेल में बंद है) और लोकेश शोरी उर्फ लोकू (जो 7 सितंबर 2021 से जेल में बंद है) को किसी अन्य मामले में वांछित न होने पर तुरंत रिहा किया जाए। साथ ही, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 481 के तहत दोनों को 25,000 रुपये का व्यक्तिगत बंधपत्र और इतनी ही राशि का एक मुचलका प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: कौशल उर्फ दीपक निर्मलकर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (लोकेश शोरी उर्फ लोकू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य के साथ)

वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1063/2021

पीठ: चीफ़ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल

निर्णय की तिथि: 05/08/2026

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