सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) और रेलवे सुरक्षा विशेष बल (आरपीएसएफ) में कांस्टेबल भर्ती प्रक्रिया के दौरान अभ्यर्थी द्वारा अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों की जानकारी जानबूझकर छुपाना सेवा से डिस्चार्ज करने का एक वैध और न्यायसंगत आधार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि महत्वपूर्ण जानकारी दबाने वाला कोई भी व्यक्ति सेवा में बने रहने का निर्बाध अधिकार नहीं जता सकता। जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के उस फैसले को सही ठहराते हुए आरपीएफ एवं आरपीएसएफ के कांस्टेबलों द्वारा दायर सिविल अपीलों के समूह को खारिज कर दिया, जिसमें उन्हें सेवा से डिस्चार्ज किए जाने के आदेश पर मुहर लगाई गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
आरपीएफ के मुख्य सुरक्षा आयुक्त ने 23 फरवरी 2011 को आरपीएफ और आरपीएसएफ में कांस्टेबल के पदों पर भर्ती के लिए एक रोजगार अधिसूचना जारी की थी। अपीलकर्ताओं ने 16 जून 2013 को आयोजित लिखित परीक्षा उत्तीर्ण की, शारीरिक दक्षता परीक्षा पास की और 17 सितंबर 2014 को प्रकाशित अंतिम चयन सूची में स्थान प्राप्त किया। इसके बाद, मई से जून 2014 के बीच दस्तावेज़ सत्यापन और मेडिकल जांच के दौरान अभ्यर्थियों से अटेस्टेशन (सत्यापन) फॉर्म भरवाए गए।
अटेस्टेशन फॉर्म के कॉलम 12 में अभ्यर्थियों से स्पष्ट पूछा गया था कि क्या वे कभी गिरफ्तार या अभियुक्त बनाए गए हैं अथवा उन पर कोई मुकदमा चला है। अपीलकर्ताओं ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले लंबित होने के बावजूद इस कॉलम में “नहीं” अंकित कर दिया। इसके पश्चात उन्हें आबंटन पत्र जारी कर प्रशिक्षण के लिए भेज दिया गया। प्रशिक्षण के दौरान ही प्राधिकारियों को उनके खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों की जानकारी मिली और यह स्पष्ट हुआ कि सत्यापन के समय इस तथ्य को छुपाया गया था। इसके बाद अधिकारियों ने आरपीएफ नियम 1987 के नियम 52 व 67, रोजगार अधिसूचना की धारा 9(एफ) और अटेस्टेशन फॉर्म के पैरा 3 का पालन करते हुए जून से अक्टूबर 2015 के बीच डिस्चार्ज आदेश जारी कर दिए।
अपीलकर्ताओं ने इन डिस्चार्ज आदेशों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने शुरुआत में डिस्चार्ज आदेश रद्द करते हुए प्राधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह बनाम भारत संघ मामले में तय सिद्धांतों के आलोक में पुनः विचार करने का निर्देश दिया। प्राधिकारियों ने मामले पर पुनर्विचार किया और मार्च, मई तथा दिसंबर 2017 में विस्तृत एवं तर्कसंगत आदेश पारित कर जानकारी छुपाने के आधार पर अभ्यर्थियों को पुनः डिस्चार्ज कर दिया। इसके बाद दायर नई रिट याचिकाओं को एकल पीठ ने खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ दायर विशेष अपीलों को 22 सितंबर 2021 को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने भी खारिज कर दिया।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन और आनंद संजय एम. नूली ने बहस करते हुए कहा कि बिना किसी स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के केवल जानकारी छुपाने के आधार पर किसी कर्मचारी को सेवा से हटाना मनमाना कदम है। उन्होंने अवतार सिंह बनाम भारत संघ, पवन कुमार बनाम भारत संघ और एसपीओ/कांस्टेबल आईआरबी सतपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य के निर्णयों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि केवल लंबित आपराधिक मामले के आधार पर डिस्चार्ज आदेश पारित नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि सभी अपीलकर्ता सभी आरोपों से बरी हो चुके हैं (जिनमें से 17 में से 14 डिस्चार्ज आदेश से पहले ही बरी हो गए थे) और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 26 अन्य समान अभ्यर्थियों को बहाल किया जा चुका है, इसलिए अपीलकर्ताओं को बहाल न करना भेदभावपूर्ण है।
वहीं, केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) विक्रमजीत बनर्जी ने दलील दी कि हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में मामलों की गहन समीक्षा की गई थी और 2017 में विस्तृत तर्कसंगत आदेश जारी कर अभ्यर्थियों को अनुपयुक्त पाया गया। उन्होंने कहा कि आपराधिक इतिहास के बारे में झूठा बयान देना सीधे तौर पर कर्मचारी के चरित्र और आचरण को प्रभावित करता है। पवन कुमार मामले से भिन्नता दर्शाते हुए एएसजी ने स्पष्ट किया कि उस मामले में सत्यापन फॉर्म भरने से पहले ही बरी किया जा चुका था, जबकि वर्तमान मामले में फॉर्म भरते समय आपराधिक मामले लंबित थे। समानता के दावे पर उन्होंने कहा कि बहाल किए गए अभ्यर्थी या तो सत्यापन फॉर्म भरने से पहले बरी हो चुके थे या फिर अदालती निर्देशों और आरोपों की प्रकृति के व्यक्तिगत मूल्यांकन के आधार पर बहाल हुए थे।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने आरपीएफ नियम 1987 के नियम 52 (सत्यापन) और नियम 67 (अनुशासनात्मक नियंत्रण) के साथ-साथ रोजगार अधिसूचना की शर्त 9(एफ) और अटेस्टेशन फॉर्म के कॉलम 12 की समीक्षा की। अदालत ने पाया कि ये नियम स्पष्ट रूप से औपचारिक नियुक्ति से पहले आपराधिक मामलों के पूर्ण प्रकटीकरण को अनिवार्य बनाते हैं और ऐसा न करने पर डिस्चार्ज या सेवा समाप्ति का प्रावधान करते हैं।
पीठ ने ध्यान दिलाया कि स्पष्ट चेतावनियों के बावजूद अपीलकर्ताओं ने लंबित मुकदमों के प्रश्न पर “नहीं” का विकल्प चुना। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के निष्कर्षों से सहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि अपीलकर्ता “सत्य को दबाने या असत्य को प्रस्तुत करने (suppressio veri या suggestio falsi) के दोषी थे, यानी उन्हें अटेस्टेशन/सत्यापन फॉर्म में मांगी गई विशिष्ट जानकारी को छुपाने का ज्ञान था, जिसे उन्होंने जानबूझकर छोड़ दिया था।”
अवतार सिंह बनाम भारत संघ मामले के सिद्धांतों को लागू करते हुए अदालत ने उस फैसले के पैराग्राफ 38.7 को रेखांकित किया:
“अनेक लंबित मामलों के संबंध में तथ्यों को जानबूझकर छुपाने के मामले में, ऐसी झूठी जानकारी अपने आप में महत्वपूर्ण हो जाएगी और नियोक्ता उम्मीदवारी रद्द करने या सेवाएं समाप्त करने का उपयुक्त आदेश पारित कर सकता है क्योंकि जिस व्यक्ति के खिलाफ कई आपराधिक मामले लंबित हैं, उसकी नियुक्ति उचित नहीं हो सकती है।”
सुप्रीम कोर्ट ने पवन कुमार बनाम भारत संघ मामले को इस आधार पर अलग बताया कि उस मामले में फॉर्म भरने से पहले ही बरी किए जाने का फैसला आ चुका था। इसी तरह सतपाल सिंह मामले को भी अलग करते हुए अदालत ने नोट किया कि उसमें कर्मचारी 12 वर्षों तक सेवा दे चुका था और मामला दीवानी मुकदमे से उत्पन्न हुआ था।
समानता और भेदभाव के तर्क पर अदालत ने एएसजी के इस स्पष्टीकरण को स्वीकार किया कि बहाल किए गए अभ्यर्थियों की स्थिति भिन्न थी, क्योंकि वे या तो फॉर्म भरने से पहले बरी हुए थे या उनके मामलों में आरोपों के मामूली होने का अलग से मूल्यांकन किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट की एकल पीठ या डिवीजन बेंच के निष्कर्षों में कोई त्रुटि नहीं है और 2017 के डिस्चार्ज आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा अवतार सिंह मामले के दिशानिर्देशों के पूर्ण अनुरूप थे। हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप का कोई कारण न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी सिविल अपीलों को बिना किसी लागत के खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: बप्पा बारई बनाम भारत संघ व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (एसएलपी (सी) संख्या 12389/2022 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 18 अगस्त 2026

