छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की बिलासपुर पीठ ने नगर निगम कर्मचारी द्वारा अपने मूल निकाय में वापसी या मनपसंद स्थान पर ट्रांसफर की मांग वाली रिट याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस विभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि कोई भी कर्मचारी अपनी पसंद के स्थान पर पदस्थापन का दावा नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने माना कि सरप्लस (अधिशेष) कर्मचारियों का समायोजन पूरी तरह से प्रशासनिक मामला है और यह नियोक्ता पर निर्भर करता है कि वह संगठन की आवश्यकतानुसार कर्मचारी को कहां तैनात करे।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता अंकित यादव की प्रारंभिक नियुक्ति नगर निगम रायपुर में सहायक ग्रेड-3 के पद पर हुई थी। 30 सितंबर 2021 को उनका ट्रांसफर नगर निगम रिसाली कर दिया गया, जहां उन्हें स्वीकृत संख्या से अधिक यानी सरप्लस पाया गया। इसके बाद 18 सितंबर 2025 को उन्हें नगर निगम भिलाई चरोदा भेजा गया, लेकिन वहां भी वे सरप्लस पाए गए।
अपने मूल निकाय रायपुर वापस भेजे जाने के लिए याचिकाकर्ता ने अधिकारियों को अभ्यावेदन दिया। जब उस पर कोई निर्णय नहीं हुआ, तो उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका (डब्ल्यूपीएस संख्या 349/2026) दायर की। हाईकोर्ट ने 20 जनवरी 2026 को याचिका का निपटारा करते हुए सक्षम प्राधिकारी को दो महीने के भीतर अभ्यावेदन पर निर्णय लेने का निर्देश दिया था।
निर्धारित अवधि में आदेश का पालन न होने पर याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका (अवमानना मामला संख्या 841/2026) दायर की। अवमानना कार्रवाई के दौरान, प्राधिकारियों ने 28 जुलाई 2026 को याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया और 31 जुलाई 2026 को आदेश जारी कर उनका ट्रांसफर चरोदा से नगर निगम राजनांदगांव कर दिया।
रायपुर की बजाय राजनांदगांव ट्रांसफर किए जाने से व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने 31 जुलाई 2026 के ट्रांसफर आदेश को रद्द करने और नगर निगम रायपुर में पदस्थापन देने की मांग करते हुए नई रिट याचिका दायर की।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को कम समय में बार-बार ट्रांसफर का सामना करना पड़ा है—पहले रायपुर से रिसाली, फिर चरोदा और अब राजनांदगांव। यह दलील दी गई कि जब याचिकाकर्ता को बार-बार सरप्लस पाया जा रहा था, तो अधिकारियों को सहमति लेकर प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) पर भेजने या उन्हें मूल निकाय रायपुर में वापस भेजने पर विचार करना चाहिए था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि ट्रांसफर आदेश में उनकी वापसी की मांग को खारिज करने का कोई कारण नहीं दिया गया, जो अधिकारियों की मनमानी और अकर्मण्यता को दर्शाता है।
दूसरी ओर, राज्य और प्रतिवादी प्राधिकारियों के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि राजनांदगांव ट्रांसफर याचिकाकर्ता के उस आवेदन पर ही किया गया है, जिसमें उन्होंने चरोदा में सरप्लस होने के आधार पर खुद ट्रांसफर की मांग की थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने पाया कि यह तथ्य निर्विवाद है कि याचिकाकर्ता चरोदा में सरप्लस थे और उन्होंने खुद दूसरे निगम में स्थानांतरण के लिए आवेदन किया था। कोर्ट ने माना कि जब कर्मचारी ने सरप्लस होने के कारण खुद ट्रांसफर का अनुरोध किया था, तो वह केवल इस आधार पर रायपुर में पदस्थापन का दावा नहीं कर सकता कि वह उसकी पसंद की जगह है या वहां उसने पहले सेवाएं दी हैं।
बार-बार ट्रांसफर और प्रतिनियुक्ति के तर्क पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि एक से अधिक बार ट्रांसफर होने मात्र से आदेश अवैध नहीं हो जाता और न ही प्राधिकारी कर्मचारी को प्रतिनियुक्ति पर भेजने के लिए बाध्य थे।
अदालत ने रेखांकित किया कि सरप्लस कर्मचारी को कहां तैनात किया जाए, इसका फैसला केवल प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आता है। हाईकोर्ट ने कहा:
“सरप्लस कर्मचारी को कहां समायोजित किया जाना है, यह निर्णय मुख्य रूप से एक प्रशासनिक मामला है। केवल इसलिए कि कर्मचारी के दृष्टिकोण से कोई अन्य व्यवस्था अधिक बेहतर हो सकती है, कोर्ट सक्षम प्राधिकारी द्वारा चुने गए पदस्थापन के स्थान पर अपनी पसंद प्रतिस्थापित नहीं कर सकता।”
कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय नम्रता वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (2021 SCC OnLine SC 3337) का उल्लेख किया और दोहराया:
“यह स्थापित कानून है कि कोई कर्मचारी किसी विशेष स्थान पर अपना ट्रांसफर करने या न करने की जिद नहीं कर सकता। आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कर्मचारी का ट्रांसफर करना नियोक्ता का काम है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
मामले के तथ्यों में 31 जुलाई 2026 के ट्रांसफर आदेश में हस्तक्षेप का कोई कानूनी आधार न पाते हुए हाईकोर्ट ने याचिका को सारहीन माना और खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अंकित यादव बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपीएस संख्या 6125/2026
पीठ: जस्टिस विभु दत्त गुरु
निर्णय की तिथि: 18/08/2026

