वैवाहिक विवादों में पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग पर केरल हाईकोर्ट की चिंता, सौतेले पिता को किया बरी

केरल हाईकोर्ट ने पारिवारिक विवादों के दौरान पॉक्सो (POCSO) कानून के गलत इस्तेमाल पर गहरी चिंता जताते हुए यौन उत्पीड़न के एक मामले में आरोपी सौतेले पिता को बरी कर दिया है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा दी गई 60 साल की जेल की सजा और 2 लाख रुपये के जुर्माने के आदेश को रद्द करते हुए आरोपी को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया। जस्टिस ए बदरुद्दीन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ बिना किसी संदेह के दोष साबित करने में नाकाम रहा है।

पति पर दबाव और कस्टडी से रोकने के लिए झूठे आरोप

हाईकोर्ट ने 14 अगस्त को अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आपसी रंजिश निकालने, बदला लेने और अवैध फायदा हासिल करने के लिए कुछ लोगों द्वारा पॉक्सो कानून के प्रावधानों का दुरुपयोग किया जा रहा है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में निर्दोष लोगों को फंसाने की सबसे ज्यादा आशंका पति-पत्नी के बीच जारी वैवाहिक विवादों में देखने को मिलती है।

पीठ ने टिप्पणी की कि जब पत्नी का पति के साथ विवाद चल रहा होता है, तो वह न केवल फैमिली कोर्ट और मजिस्ट्रेट कोर्ट का रुख करती है, बल्कि पति को दबाव व डर में रखने तथा बच्चे की कस्टडी से उसे वंचित करने के लिए अपने ही बच्चों या दूसरे पति के बच्चों के यौन उत्पीड़न के झूठे आरोप भी लगा देती है। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों की यह जिम्मेदारी है कि वे साक्ष्यों की गहराई से जांच करें, खासकर तब जब आरोपी पक्ष की ओर से झूठे मामले में फंसाए जाने की बात कही जा रही हो।

ट्रायल कोर्ट की 60 साल की सजा रद्द

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यह फैसला 18 अक्टूबर 2023 को निचली अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले के खिलाफ दायर अपील पर आया है। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी सौतेले पिता को पॉक्सो एक्ट की धारा 6 सहपठित धारा 5(n) (घरेलू संबंध में बार-बार गंभीर यौन हमला) के तहत 40 साल की सश्रम कैद और 1 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके अलावा, धारा 6 सहपठित धारा 5(l) के तहत लगातार यौन शोषण के लिए 20 साल की अतिरिक्त कैद और 1 लाख रुपये के दूसरे जुर्माने की सजा दी गई थी।

घटनाक्रम और बयानों में भारी विरोधाभास

मामले के अनुसार, पीड़िता ने आरोप लगाया था कि देर 2014 से 2018 के बीच उसके साथ घर पर यौन उत्पीड़न हुआ। हालांकि, पीड़िता ने 18 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद 13 जनवरी 2020 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।

साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता और अभियोजन के दावों में गंभीर विरोधाभास हैं। पीड़िता ने अदालत में कहा कि घटनाएं 2014 से 2018 के बीच हुईं, जबकि मेडिकल जांच करने वाले डॉक्टर के अनुसार पीड़िता ने 2015 से जनवरी 2019 के दौरान उत्पीड़न की बात कही थी। इसके अलावा, न तो कथित घटनाओं की कोई निश्चित तारीख बताई गई और न ही मजिस्ट्रेट के समक्ष बयानों में किसी विशिष्ट घटना का स्पष्ट उल्लेख किया गया।

कुवैत यात्रा और चैट से जुड़ा घटनाक्रम

अदालत ने उन परिस्थितियों पर भी ध्यान दिया जो आरोपों पर संदेह पैदा करती हैं। वर्ष 2019 में पीड़िता अपनी मां के साथ एक महीने के लिए कुवैत गई थी। इस दौरान आरोपी वहां मौजूद नहीं था, लेकिन पीड़िता ने अपनी मां से उत्पीड़न की कोई शिकायत नहीं की। एक अन्य गवाह ने भी गवाही दी कि पीड़िता ने उससे कभी ऐसी किसी घटना का जिक्र नहीं किया।

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इसके साथ ही, आरोपी पक्ष ने तर्क दिया कि पीड़िता के किसी अन्य व्यक्ति के साथ निजी संदेश (चैट) को आरोपी ने देख लिया था और उसकी मां को बता दिया था, जिससे पीड़िता का वह संबंध टूट गया था। अदालत ने इस पहलू को भी ध्यान में रखा कि पीड़िता इस वजह से भी आरोपी से नाराज हो सकती थी। वहीं, पीड़िता की मां ने माना कि जून-जुलाई 2019 से उसने आरोपी से बातचीत बंद कर दी थी और दिसंबर 2019 में भारत लौट आई थी, जिसके बाद दोनों पक्षों में कानूनी विवाद शुरू हुए।

सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर सजा संभव नहीं

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मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता के साथ अतीत में यौन उत्पीड़न के संकेत मिलने की बात कही गई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि केवल मेडिकल निष्कर्ष ही यह साबित करने के लिए काफी नहीं हैं कि आरोपी ही उन कृत्यों के लिए जिम्मेदार था। अन्य साक्ष्यों के अभाव में मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष का पूरा मामला गंभीर संदेहों से घिरा हुआ है और संदेह का लाभ हर हाल में आरोपी को मिलना चाहिए। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को त्रुटिपूर्ण मानते हुए रद्द कर दिया और आरोपी को बरी करने का आदेश जारी किया।

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