सीतापुर में नजूल जमीन विवाद: कांग्रेस को हाईकोर्ट से झटका, अंतरिम राहत देने से इनकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में सरकारी नजूल जमीन पर कथित अवैध कब्जे के मामले में कांग्रेस कमेटी की अंतरिम राहत की अर्जी खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी जमीन पर केवल लंबे समय तक कब्जा बने रहने से उसे वैध नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसके समर्थन में कोई आवंटन पत्र या आधिकारिक दस्तावेज न हो।

जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की पीठ ने सीतापुर जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा दायर रिट याचिका पर यह आदेश दिया। इसके साथ ही पीठ ने राज्य सरकार और संबंधित प्रतिवादियों को तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाब (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ता को रिजॉइंडर पेश करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया जाएगा। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर 2026 को तय की है।

बेदखली आदेश और कांग्रेस के दावे

यह कानूनी विवाद सीतापुर के तामसेन गंज इलाके में स्थित प्लॉट नंबर 244/1 से जुड़ा है, जो स्थानीय घंटा घर का ऊपरी हिस्सा है। सीतापुर नगर पालिका परिषद के प्रभारी अधिशासी अधिकारी ने एक आदेश जारी कर सरकारी राजस्व रिकॉर्ड से कांग्रेस पार्टी का नाम हटाने और संपत्ति को खाली कराने का निर्देश दिया था। कांग्रेस कमेटी ने इसी प्रशासनिक बेदखली आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

अदालती सुनवाई के दौरान कांग्रेस के प्रतिनिधियों ने तर्क दिया कि पार्टी 1971 से इस परिसर का उपयोग कर रही है। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने वर्ष 1971 में जमा किए गए 320 रुपये के किराया भुगतान की एक रसीद प्रस्तुत की।

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हाईकोर्ट की टिप्पणी और सुनवाई की अगली तारीख

राज्य सरकार के वकीलों ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह संपत्ति सरकारी नजूल भूमि है और इस पर राजनीतिक दल का कब्जा पूरी तरह गैर-कानूनी है।

मामले की सुनवाई करते हुए पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता 1971 के बाद पिछले 55 वर्षों से किसी भी तरह के किराए के भुगतान का प्रमाण देने में असमर्थ रहे। इसके अलावा पार्टी ऐसा कोई आधिकारिक आवंटन पत्र, लीज समझौता या अन्य दस्तावेज पेश नहीं कर सकी, जिससे इस जमीन पर उनका वैध अधिकार सिद्ध हो सके।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि किसी भी सरकारी संपत्ति पर चाहे कितने ही दशकों से कब्जा क्यों न हो, वह तब तक कानूनी रूप से मान्य नहीं हो सकता जब तक कि शुरुआत में उसके वैध आवंटन से जुड़ा कोई आधिकारिक दस्तावेज मौजूद न हो।

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