सीआरपीसी में मेंटेनेंस रिकवरी का मामला कलेक्टर को सौंपने के बाद मजिस्ट्रेट उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी नहीं कर सकते: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट की श्रीनगर पीठ में जस्टिस राहुल भारती की एकल पीठ ने शोपियां के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा जिला कलेक्टर (डिप्टी कमिश्नर) को जारी कारण बताओ नोटिस को रद्द कर दिया है। यह नोटिस भरण-पोषण (मेंटेनेंस) आदेश के निष्पादन (एग्जीक्यूशन) की कार्यवाही के दौरान जारी किया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) के तहत जब मजिस्ट्रेट किसी मामले में वसूली की प्रक्रिया कलेक्टर को सौंप देते हैं, तो उसके बाद वे अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर कलेक्टर के खिलाफ ऐसी दंडात्मक कार्यवाही नहीं कर सकते।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत दायर एक मेंटेनेंस याचिका से शुरू हुआ था। 20 अप्रैल 2023 को पत्नी और उसकी नाबालिग बेटी ने पति द्वारा भरण-पोषण न देने और उपेक्षा करने पर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, शोपियां की अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

अदालत ने 4 दिसंबर 2025 को याचिका का निपटारा करते हुए पत्नी और बेटी के हक में कुल 18,000 रुपये प्रति माह (पत्नी के लिए 10,000 रुपये और बेटी के लिए 8,000 रुपये) का मेंटेनेंस तय किया। यह राशि याचिका दायर करने की तिथि से देय थी। हालांकि, पति द्वारा बकाए और मासिक भरण-पोषण राशि का भुगतान न करने पर, पत्नी और बेटी ने 9 दिसंबर 2025 को आदेश के निष्पादन के लिए अर्जी दाखिल की।

निष्पादन कार्यवाही के दौरान पति अदालत से अनुपस्थित रहा। अदालत द्वारा भेजे गए नोटिसों की तामील नहीं हो सकी। इस पर न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 20 फरवरी 2026 को सीआरपीसी की धारा 421(1)(बी) के तहत जिला कलेक्टर, शोपियां को वसूली के लिए लेवी वारंट जारी कर दिया। इसके बाद 30 अप्रैल 2026 को मजिस्ट्रेट ने कलेक्टर से शोपियां जिले में स्थित पति की चल और अचल संपत्तियों का ब्योरा मांगते हुए एक रिपोर्ट तलब की।

4 जून 2026 को जिला कलेक्टर कार्यालय की ओर से असिस्टेंट कमिश्नर रेवेन्यू (एसीआर), शोपियां ने अदालत में विस्तृत रिपोर्ट दाखिल कर पति की अचल संपत्ति की जानकारी दे दी। हालांकि, मजिस्ट्रेट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि रिपोर्ट व्यक्तिगत रूप से कलेक्टर द्वारा पेश नहीं की गई और उसमें चल संपत्तियों का ब्योरा शामिल नहीं था। नतीजतन, मजिस्ट्रेट ने 10 जुलाई 2026 को जिला कलेक्टर शोपियां के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। इस नोटिस से व्यथित होकर शोपियां के तात्कालिक जिला कलेक्टर शिशिर गुप्ता (आईएएस) ने संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता जिला कलेक्टर शोपियां की ओर से वरिष्ठ अतिरिक्त अधिवक्ता जनरल (एएजी) मोहसिन एस कादरी और अधिवक्ता राहिला खान पेश हुए। उन्होंने न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, शोपियां द्वारा 10 जुलाई 2026 को जारी कारण बताओ नोटिस की वैधानिकता और क्षेत्राधिकार को चुनौती दी।

वहीं, प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता बिलाल अहमद मल्ला ने पक्ष रखा।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के रिकॉर्ड का गहन परीक्षण किया और धारा 125 सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण आदेशों के प्रवर्तन की कानूनी रूपरेखा स्पष्ट की। कोर्ट ने कहा कि धारा 125(3) और धारा 431 सीआरपीसी के प्रावधान जुर्माना वसूलने के उद्देश्य से धारा 421 की प्रक्रिया अपनाने का निर्देश देते हैं।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब धारा 421(1)(बी) के तहत वसूली का लेवी वारंट कलेक्टर को जारी कर दिया जाता है, तो वसूली की पूरी कार्यवाही भू-राजस्व के बकाए की तरह वसूलने के लिए कलेक्टर के पास स्थानांतरित हो जाती है। इस चरण के बाद वारंट जारी करने वाली अदालत या मजिस्ट्रेट की भूमिका रुक (पॉज पर) जाती है।

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अदालत ने मजिस्ट्रेट द्वारा शुरुआत में ही अपनाई गई गलत प्रक्रियात्मक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा:

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत जमानती या गैर-जमानती वारंट जारी करने के विकल्प का उपयोग न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, शोपियां द्वारा नहीं किया गया, जिससे प्रतिवादी संख्या 3 का पता लगाने और उसे अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने में मदद मिल सकती थी।

कलेक्टर कार्यालय से प्राप्त रिपोर्ट और मजिस्ट्रेट के रुख पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

यह अदालत यह समझने में असमर्थ है कि जब 20.02.2026 का लेवी वारंट प्रतिवादी संख्या 3 से बकाए और आवर्ती भरण-पोषण की वसूली के लिए पहले ही जिला कलेक्टर, शोपियां को सौंपा जा चुका था, तो न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, शोपियां के लिए ऐसी रिपोर्ट मांगने का क्या औचित्य था।

इसके अलावा, हाईकोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने कानूनी गलती करते हुए 4 जुलाई 2026 को शोपियां के थाना प्रभारी (एसएचओ) को भी एक दूसरा लेवी वारंट जारी कर दिया, जबकि कलेक्टर को भेजा गया वारंट पहले से प्रभावी था। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की:

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, शोपियां कानून की अनदेखी करते हुए काम करते पाए गए, क्योंकि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 421(1)(बी) के तहत पहले जिला कलेक्टर को लेवी वारंट जारी करने के बाद, 04.07.2026 के आदेश द्वारा प्रतिवादी संख्या 3 के खिलाफ एसएचओ, पुलिस स्टेशन शोपियां के माध्यम से तामील के लिए दूसरा लेवी वारंट जारी कर दिया गया। इसके लिए दंड प्रक्रिया संहिता में कोई गुंजाइश नहीं है, जिसका अर्थ है कि न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, शोपियां ने खुद ही कलेक्टर को जारी पहले लेवी वारंट को विफल कर दिया।

मामले के सभी तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने निष्कर्ष दिया:

इस अदालत का यह स्पष्ट मानना है कि न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, शोपियां ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत अपने क्षेत्राधिकार की सीमाओं का उल्लंघन किया है, जिससे 10.07.2026 का विवादित कारण बताओ नोटिस गैर-कानूनी हो जाता है।

अदालत का फैसला

हाईकोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, शोपियां द्वारा जिला कलेक्टर को जारी 10 जुलाई 2026 के कारण बताओ नोटिस को रद्द कर दिया।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वे जम्मू-कश्मीर भू-राजस्व अधिनियम, संवत 1996 की धारा 91 के प्रावधानों के तहत भू-राजस्व के बकाए की तर्ज पर वसूली के लिए कलेक्टर शोपियां को नया लेवी वारंट भेजें। कलेक्टर को निर्देशित किया गया है कि वे चिन्हित संपत्ति को कुर्क व नीलाम करके बकाए की वसूली करें और प्राप्त राशि मजिस्ट्रेट की अदालत में जमा कराएं ताकि पीड़ित पत्नी और बेटी को भुगतान किया जा सके।

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हाईकोर्ट ने इन्हीं निर्देशों के साथ याचिका को निस्तारित कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: शिशिर गुप्ता आईएएस बनाम उफैरा गुलजार व अन्य

वाद संख्या: डब्ल्यूपी(सी) 1781/2026 सीएम(4750/2026)

पीठ: जस्टिस राहुल भारती

निर्णय की तिथि: 07.08.2026

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