सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ, जिसमें जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे शामिल थे, ने निर्णय दिया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 60(1)(ccc) के तहत मुख्य आवासीय संपत्ति को कुर्की और बिक्री से मिलने वाला वैधानिक संरक्षण केवल मूल देनदार (जजमेंट-डेबटर) तक व्यक्तिगत रूप से सीमित है और इसे उनके कानूनी प्रतिनिधियों तक नहीं बढ़ाया जा सकता। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ के फैसले को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण (DRAT) इलाहाबाद के उस आदेश को बहाल कर दिया, जिसमें दिल्ली स्थित एक आवासीय संपत्ति की नीलामी बिक्री को सही ठहराया गया था। यह नीलामी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के बकाए ऋण की वसूली अधिनियम, 1993 (अब ऋण और दिवालियापन वसूली अधिनियम, 1993) के तहत की गई थी। इसके साथ ही अदालत ने नीलामी खरीदार शीला गहलोत और पंजाब एंड सिंध बैंक की अपीलों को स्वीकार कर लिया, जबकि मृत देनदार के बेटे की अपील खारिज कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद पंजाब एंड सिंध बैंक द्वारा मैसर्स स्टर्लिंग माल्ट एंड फूड्स प्राइवेट लिमिटेड को दी गई क्रेडिट सुविधाओं से शुरू हुआ था। इस कंपनी के प्रबंध निदेशक हरदयाल सिंह (मूल देनदार) और एन. एस. एस. राव थे। कंपनी मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के बामौर स्थित अपने कारखाने में माल्ट का निर्माण करती थी। कंपनी ने अपनी फ़ैक्टरी भूमि, भवन, संयंत्र और मशीनरी को बैंक के पास गिरवी रखा था और दोनों निदेशकों ने व्यक्तिगत गारंटी भी दी थी। एस-246, पंचशील पार्क, नई दिल्ली स्थित आवासीय मकान (दिल्ली संपत्ति), जो हरदयाल सिंह के स्वामित्व में था, बैंक के पास बंधक नहीं रखा गया था।
वर्ष 1983 में परिचालन बंद होने के बाद ऋण चुकाने में अनियमितता हुई, जिसके बाद बैंक ने मुरैना के जिला न्यायालय के समक्ष सिविल सूट नंबर 1-बी/1987 दायर किया। इसके बाद, एल. के. ट्रस्ट और उसके ट्रस्टियों ने कंपनी के अधिकांश शेयर हासिल कर लिए और इसे पुनर्जीवित करने की योजना पेश की, जिसे बैंक ने स्वीकार कर लिया। 15 अक्टूबर 1991 को मुरैना अदालत ने एक समझौता डिक्री पारित की, जिसके तहत ट्रस्ट को सात वर्षों में 1.80 करोड़ रुपये का भुगतान करना था। समझौते की धारा 2(e) में यह प्रावधान था कि संपार्श्विक सुरक्षा (कोलेटरल सिक्योरिटी) के रूप में जमा दिल्ली संपत्ति के स्वामित्व दस्तावेज जारी कर दिए जाएंगे, लेकिन इससे हरदयाल सिंह की व्यक्तिगत देनदारी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
17 नवंबर 1994 को हरदयाल सिंह का निधन हो गया। लगभग 82 लाख रुपये चुकाने के बाद ट्रस्ट ने भुगतान में चूक की। 1995 में बैंक ने मुरैना अदालत में निष्पादन (एग्जीक्यूशन) याचिका दायर की, जिसमें हरदयाल सिंह की विधवा मोहिनी हरदयाल सिंह और उनके बच्चों को देनदार के रूप में पक्षकार बनाया गया। 1995 से 1997 के बीच नोटिस तामील कराने के प्रयास विफल रहे।
जबलपुर में ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) की स्थापना के बाद, 1993 के अधिनियम की धारा 31 के तहत मामला DRT को स्थानांतरित कर दिया गया। 20 सितंबर 2004 को DRT के रिकवरी अधिकारी ने दिल्ली संपत्ति की नीलामी का आदेश दिया। मोहिनी हरदयाल सिंह ने नोटिस न मिलने और धारा 60(1)(ccc) के तहत छूट का दावा करते हुए आवेदन दायर किए। 27 नवंबर 2006 को संपत्ति की नीलामी हुई, जिसमें अपीलकर्ता शीला गहलोत सफल बोलीदाता बनीं और 1 मार्च 2007 को बिक्री प्रमाणपत्र जारी किया गया।
DRAT ने 19 अप्रैल 2007 को मोहिनी हरदयाल सिंह की अपील खारिज कर दी। हालांकि, DRT ने बाद में 29 मई 2007 को नीलामी आदेशों को रद्द कर दिया। अपील पर DRAT ने 1 फरवरी 2008 को DRT के आदेश को पलट दिया। इसके बाद मोहिनी हरदयाल सिंह ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का रुख किया। 15 मई 2009 को हाईकोर्ट ने DRAT के आदेश को रद्द कर दिया और DRT को निर्देश दिया कि वह नोटिस तामील न होने और धारा 60(1)(ccc) के तहत छूट के दावे की जांच करे। इससे व्यथित होकर नीलामी खरीदार, बैंक और देनदार के बेटे ने सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग अपीलें दायर कीं।
पक्षों के तर्क
नीलामी खरीदार शीला गहलोत की ओर से पेश वरिष्ठ वकील डॉ. ए. एम. सिंघवी ने तर्क दिया कि CPC की धारा 60(1)(ccc) का लाभ केवल देनदार के लिए व्यक्तिगत है और यह कानूनी वारिसों तक नहीं विस्तारित होता। उन्होंने कहा कि मोहिनी हरदयाल सिंह को निष्पादन कार्यवाही की पूरी जानकारी थी और उन्होंने 2004 में विस्तृत आपत्तियां दायर की थीं, इसलिए औपचारिक नोटिस न मिलने से उन्हें कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा।
पंजाब एंड सिंध बैंक के वरिष्ठ वकील डी. एन. गोबर्धन ने कहा कि 1993 के अधिनियम के तहत की गई नीलामी बिक्री को आयकर अधिनियम, 1961 की दूसरी अनुसूची के नियम 60 या 61 के तहत आवेदन किए बिना और गंभीर अनियमितता से भारी क्षति साबित किए बिना रद्द नहीं किया जा सकता।
देनदार के बेटे जगमिंदर सिंह के वरिष्ठ वकील राजीव शकधर ने तर्क दिया कि कानूनी प्रतिनिधियों पर निष्पादन का कोई नोटिस तामील नहीं किया गया था, जिससे नीलामी अमान्य हो जाती है। उन्होंने जोर दिया कि दिल्ली संपत्ति उनका मुख्य आवासीय घर थी और धारा 60(1)(ccc) के तहत संरक्षित थी।
मोहिनी हरदयाल सिंह के वरिष्ठ वकील शेखर नाफडे ने तर्क दिया कि CPC के आदेश XXI नियम 22 और 1961 के अधिनियम की दूसरी अनुसूची के नियम 2 का पालन अनिवार्य था, और नोटिस न देने से पूरी निष्पादन प्रक्रिया और नीलामी बिक्री शून्य हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने तीन मुख्य कानूनी प्रश्नों का परीक्षण किया:
1. नीलामी बिक्री पर CPC के आदेश XXI नियम 22 का प्रभाव
अदालत ने कहा कि निष्पादन कार्यवाही मुरैना अदालत से 1993 के अधिनियम की धारा 31 के तहत DRT में स्थानांतरित की गई थी। पीठ ने स्पष्ट किया:
“1993 के अधिनियम की धारा 31 के तहत मुरैना अदालत से डीआरटी में निष्पादन कार्यवाही का स्थानांतरण केवल निष्पादन के मंच को बदलने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने रिकवरी अधिकारी को 1961 के अधिनियम की दूसरी अनुसूची के साथ पठित 1993 के अधिनियम की धारा 29 के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार राशि वसूलने की शक्ति प्रदान की, जो कि मुरैना अदालत के समक्ष संहिता के तहत प्रक्रिया का स्थान लेती है।”
दिल्ली पर लागू आदेश XXI नियम 22(2) के स्थानीय संशोधन का हवाला देते हुए, जिसमें प्रावधान है कि “ऐसी वजह दर्ज न करने को एक अनियमितता माना जाएगा न कि अधिकार क्षेत्र में कोई त्रुटि,” पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि CPC के आदेश XXI नियम 22 का नीलामी बिक्री की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ा।
2. 1961 के अधिनियम की दूसरी अनुसूची के नियम 2 के तहत नोटिस न देने का प्रभाव
यह स्वीकार करते हुए कि कानूनी प्रतिनिधियों पर नियम 2 के तहत कोई नोटिस तामील नहीं हुआ था, पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि वे निष्पादन कार्यवाही में पहले से ही पक्षकार थे और नीलामी से पूरी तरह अवगत थे। अदालत ने टिप्पणी की:
“इसलिए, 1961 के अधिनियम की दूसरी अनुसूची के नियम 2 के तहत नोटिस न दिए जाने के कारण प्रतिवादी संख्या 1 और उनके बच्चों को भारी क्षति होने का प्रश्न ही नहीं उठता।”
“अतः मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, 1961 के अधिनियम की दूसरी अनुसूची के नियम 2 के तहत नोटिस का न होना न तो निष्पादन को और न ही नीलामी बिक्री को अमान्य ठहराता है।”
3. CPC की धारा 60(1)(ccc) के तहत छूट का दायरा
पंजाब रिलीफ ऑफ इंडेक्टेडनेस एक्ट, 1934 के माध्यम से दिल्ली में लागू धारा 60(1)(ccc) का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सुरक्षा पूरी तरह से व्यक्तिगत है। पीठ ने कहा:
“…यह संरक्षण इसके अपने पाठ के अनुसार मूल देनदार के लिए व्यक्तिगत है क्योंकि यह देनदार के मालिकाना हक वाले और उसके कब्जे वाले घर तक सीमित है तथा यह संरक्षण देनदार के कानूनी प्रतिनिधियों तक विस्तारित नहीं होता है।”
“इस प्रकार, संहिता की धारा 60(1)(ccc) के तहत छूट की याचिका मूल देनदार के लिए व्यक्तिगत है और उसके कानूनी प्रतिनिधियों द्वारा उठाए जाने के लिए उपलब्ध नहीं है।”
अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले योगेश शर्मा बनाम देवी दयाल व अन्य और पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के निर्णयों के. एल. बावा बनाम बसंत टेक्सटाइल्स तथा परगट सिंह व अन्य बनाम गुरमेल कौर व अन्य में दिए गए कानूनी सिद्धांतों की पुष्टि की।
इसके अतिरिक्त, ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी व अन्य बनाम मंजू जैन व अन्य का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि तथ्य और कानून का मिश्रित प्रश्न पहली बार रिट याचिका में नहीं उठाया जा सकता:
“इस प्रकार, कानून और तथ्य का एक मिश्रित प्रश्न पहली बार रिट याचिका में नहीं उठाया जा सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने 15 मई 2009 के हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। नीलामी खरीदार द्वारा दायर सिविल अपील नंबर 182/2016 और बैंक द्वारा दायर सिविल अपील नंबर 190/2016 को स्वीकार कर लिया गया, जबकि देनदार के बेटे की सिविल अपील नंबर 191/2016 को खारिज कर दिया गया। अदालत ने आदेश दिया कि सभी पक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: शीला गहलोत बनाम मोहिनी हरदयाल सिंह व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील नंबर 182/2016 (साथ में सी.ए. नंबर 190/2016 और सी.ए. नंबर 191/2016)
पीठ: जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा, जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 14 अगस्त 2026

