विवादित तथ्यों वाले मामलों में बिजली से मौत पर मुआवजे के लिए रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं, बिजली कंपनियों पर सख्त जवाबदेही का सिद्धांत लागू: सुप्रीम कोर्ट

बिजली से करंट लगने के मामलों में रिट क्षेत्राधिकार और टॉर्टियस दायित्व (अपकृत्य जवाबदेही) से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जहाँ विवादित तथ्य शामिल होते हैं, वहाँ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मुआवजे की मांग करने वाली रिट याचिकाएं सुनवाई योग्य नहीं हैं। अदालत ने यह भी माना कि बिजली वितरण संस्थाओं पर पूर्ण जवाबदेही (Absolute Liability) के बजाय सख्त जवाबदेही (Strict Liability) का सिद्धांत लागू होता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेईकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (केपीटीसीएल) द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें रिट याचिका स्वीकार कर मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के ढांचे का उपयोग करके पीड़ितों को मुआवजा दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कर्नाटक में बिजली से करंट लगने की दो अलग-अलग घटनाओं से उत्पन्न हुआ था। पहले मामले में, 22 फरवरी 2018 को एन. सुब्रमण्य की करंट लगने से मृत्यु हो गई थी। उनकी पत्नी रेखा (प्रतिवादी संख्या 1) ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। हाईकोर्ट के सिंगल जज ने इसे राज्य के एक अपकृत्य कार्य (Tortious Act) का निवारण मानते हुए स्वीकार किया और केपीटीसीएल की उन आपत्तियों को खारिज कर दिया जिनमें याचिका की स्वीकार्यता और विवादित तथ्यों का हवाला दिया गया था। सिंगल जज ने मोटर वाहन अधिनियम के प्रावधानों के आधार पर 6 प्रतिशत ब्याज के साथ 25,52,500 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसे बाद में डिवीजन बेंच ने भी बरकरार रखा।

दूसरे संबंधित मामले में, मुइज्ज़ अहमद शरीफ नामक व्यक्ति एक पड़ोसी इमारत की छत पर गिरी क्रिकेट की गेंद उठाने की कोशिश में 66 केवी की उच्च तनाव बिजली लाइन के संपर्क में आकर गंभीर रूप से झुलस गए थे। इस मामले में भी सिंगल जज ने 44,32,050 रुपये के मुआवजे का आदेश दिया, जिसे डिवीजन बेंच ने कायम रखा। केपीटीसीएल ने दोनों फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

पक्षों के तर्क और विवादित तथ्य

केपीटीसीएल ने रिट याचिकाओं की स्वीकार्यता, अपनी ओर से लापरवाही न होने और मामले में गहन विवादित तथ्यों की मौजूदगी के आधार पर याचिकाओं का विरोध किया। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों मामलों में निम्नलिखित प्रमुख विवादित तथ्यों को रेखांकित किया:

पहले मामले में विवादित बिंदु:

  1. क्या कॉफी बागान में काम करते समय एल्युमिनियम की सीढ़ी का इस तरह उपयोग करना कि वह 11 केवी लाइन से टकरा जाए, खुद मृतक की लापरवाही थी?
  2. क्या एल्युमिनियम की सीढ़ी प्रदान करने के लिए कॉफी बागान का मालिक खुद लापरवाह था?
  3. क्या बैकअप रिले संतोषजनक स्थिति में थे, जैसा कि सहायक कार्यकारी अभियंता की रिपोर्ट में कहा गया था?
  4. क्या केपीटीसीएल दायित्व से मुक्त हो जाता है क्योंकि वह केवल एक निश्चित वोल्टेज से ऊपर की बिजली लाइनों के रखरखाव के लिए जिम्मेदार था?
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दूसरे मामले में विवादित बिंदु:

  1. क्या इमारत और बिजली लाइन के बीच कानून द्वारा निर्धारित 4 मीटर की न्यूनतम दूरी का पालन किया गया था?
  2. क्या 19 अप्रैल 2000 के एक वचनपत्र के अनुसार इमारत का मालिक मुआवजे के भुगतान के लिए पूरी तरह जिम्मेदार था?
  3. क्या बिजली कनेक्शन प्रदान करने के लिए केपीटीसीएल पर लापरवाही का आरोप लगाया जा सकता है, यदि वैधानिक दूरी का अनुपालन किया गया था?

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

रिट याचिका की स्वीकार्यता

अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार के प्रयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने राधा कृष्ण इंडस्ट्रीज बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और टी.एन. सीमेंट्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम यूनिकॉन इंजीनियर्स के फैसलों का संदर्भ दिया। कोर्ट ने दोहराया कि जब वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध हों, तो रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग अदालती विवेक पर निर्भर करता है।

करंट लगने से जुड़े मामलों में विवादित तथ्यों की उपस्थिति पर पीठ ने चेयरमैन, ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ उड़ीसा लिमिटेड (ग्रिडको) बनाम सुकमनी दास मामले का विशेष उल्लेख करते हुए कहा:

“जहाँ तथ्यों के विवादित प्रश्न शामिल हों, वहाँ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका एक उचित उपाय नहीं है।”

सख्त जवाबदेही बनाम पूर्ण जवाबदेही

हाईकोर्ट ने विवादित तथ्यों को दरकिनार करने के लिए पूर्ण जवाबदेही (Absolute Liability) का सिद्धांत लागू किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को खारिज कर दिया और सख्त जवाबदेही (Strict Liability) तथा पूर्ण जवाबदेही के बीच अंतर स्पष्ट किया।

एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (श्रीराम – ओलियम गैस) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि पूर्ण जवाबदेही में किसी भी अपवाद की गुंजाइश नहीं होती और यह केवल उन औद्योगिक उद्यमों पर लागू होती है जो अत्यधिक खतरनाक या जोखिम भरी गतिविधियों में लगे होते हैं। कोर्ट ने एम.सी. मेहता फैसले से उद्धृत किया:

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“जहाँ कोई उद्यम किसी खतरनाक या स्वाभाविक रूप से जोखिम भरे उद्योग में लगा हुआ है और ऐसे उद्योग के संचालन में दुर्घटना के कारण किसी को नुकसान पहुँचता है… तो वह उद्यम उन सभी लोगों को मुआवजा देने के लिए पूरी तरह और सख्त रूप से जवाबदेह है और यह जवाबदेही ‘रायलैंड्स बनाम फ्लेचर’ के नियम के तहत लागू होने वाली सख्त जवाबदेही के किसी भी अपवाद के अधीन नहीं है।”

इसके विपरीत, सुप्रीम कोर्ट ने रायलैंड्स बनाम फ्लेचर, राजकोट म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन बनाम मंजुलबेन जयंतीलाल नाकुम, क्वेबेक रेलवे, लाइट, हीट एंड पावर कंपनी लिमिटेड बनाम वांड्री, यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रभाकरन विजया कुमार, और एम.पी. बिजली बोर्ड बनाम शैल कुमारी मामलों का पुनरावलोकन किया। इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने कौशनुमा बेगम बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड का हवाला देते हुए सख्त जवाबदेही के मान्य अपवादों को रेखांकित किया, जिनमें पीड़ित की सहमति (volenti non fit injuria), सामान्य लाभ, किसी अजनबी का कृत्य, वैधानिक प्राधिकरण का प्रयोग, ईश्वर का कृत्य (vis major), पीड़ित की अपनी चूक, और परिणामी दूरस्थता शामिल हैं।

बिजली कंपनियों पर लागू होने वाले कानूनी मानक को स्पष्ट करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“सख्त जवाबदेही (Strict Liability) को लागू करना अधिक उचित होगा, क्योंकि सभी मामलों में यह नहीं कहा जा सकता कि बिजली बोर्ड ही जवाबदेह हैं।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि बिजली का संचरण स्वाभाविक रूप से खतरनाक है और ऐसी संस्थाएं नुकसान-वितरण तंत्र पर काम करती हैं, फिर भी उनकी देनदारी सख्त जवाबदेही के तहत आती है, बशर्ते इस नियम का कोई अपवाद लागू न होता हो।

मुआवजा तय करने का पैमाना

मुआवजे की राशि की गणना पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट द्वारा मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के गुणक (Multiplier) तरीके को लागू करना गलत था। रमन बनाम उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड और बलराम प्रसाद बनाम कुणाल साहा का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि यद्यपि बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 57 के तहत लाइसेंसधारी की मुआवजा देने की देनदारी को स्वीकार किया गया है, लेकिन इसमें गणना का कोई सूत्र नहीं दिया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुआवजे का निर्धारण मोटर दुर्घटना के फॉर्मूले के बजाय आय और संबंधित दावों के आधार पर “न्यायसंगत, उचित और निष्पक्ष” सिद्धांत के तहत होना चाहिए।

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि विवादित तथ्यों की उपस्थिति के कारण हाईकोर्ट के समक्ष दायर रिट याचिकाएं बनाए रखने योग्य नहीं थीं। इसके आधार पर कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. कर्नाटक हाईकोर्ट के सिंगल जज और डिवीजन बेंच के फैसलों को पूरी तरह से रद्द कर दिया गया।
  2. दोनों सिविल अपीलों को स्वीकार कर लिया गया।
  3. उत्तरदाताओं/पीड़ितों को संबंधित फोरम या सिविल कोर्ट के समक्ष उचित वैकल्पिक कानूनी उपाय (जैसे सिविल सूट) अपनाने की छूट दी गई, जिसे बिना किसी पूर्वाग्रह के शीघ्रता से तय किया जाएगा।
  4. 18 दिसंबर 2025 के अंतरिम आदेश के तहत पीड़ितों को भुगतान किए गए 5 लाख रुपये के अंतरिम मुआवजे की वसूली न करने का निर्देश दिया गया, और यह भी स्पष्ट किया गया कि यह राशि भविष्य की किसी कार्यवाही को प्रभावित नहीं करेगी।
  5. सभी पक्षों को अपना-अपना मुकदमा खर्च स्वयं वहन करने का आदेश दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम रेखा व अन्य

वाद संख्या: 2026 की सिविल अपील संख्या, 2025 की एसएलपी सी संख्या 24849 से उत्पन्न, तथा 2026 की सिविल अपील संख्या, 2025 की एसएलपी सी संख्या 24854 से उत्पन्न

पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेईकापम कोटिश्वर सिंह

निर्णय की तिथि: 12 अगस्त 2026

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