कस्टोडियल डेथ मामले में छत्तीसगढ़ सरकार को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, सीबीआई जांच के आदेश और 25 लाख रुपये अंतरिम मुआवजे का निर्देश

कस्टोडियल डेथ (हिरासत में मौत) के एक मामले में छत्तीसगढ़ प्रशासन की निष्क्रियता पर कड़ा रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मृतक श्रवण सूर्यवंशी उर्फ सरवन ताम्रे की मौत की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने न्यायिक जांच में हिरासत के दौरान लगी चोटों से मौत की पुष्टि होने के बावजूद एफआईआर दर्ज न करने पर गहरी चिंता व्यक्त की। शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा दिए गए 1 लाख रुपये के मुआवजे को पूरी तरह से अपर्याप्त बताते हुए रद्द कर दिया और राज्य सरकार को मृतक की पत्नी को तुरंत 25 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा देने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

मृतक श्रवण सूर्यवंशी को 18 जनवरी 2024 को बिलासपुर जिले के सीपत पुलिस स्टेशन के हेड कांस्टेबल उमा शंकर राठौर ने छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम, 1915 की धारा 34(2) के तहत गिरफ्तार किया था। आरोप था कि उनके पास से 1,200 रुपये मूल्य की 6 लीटर कच्ची महुआ शराब (2-2 लीटर की तीन बोतलें) बरामद हुई थी। गिरफ्तारी और रिमांड के बाद उन्हें केंद्रीय जेल बिलासपुर में रखा गया। 21 जनवरी 2024 को तबीयत बिगड़ने पर उन्हें सिम्स अस्पताल बिलासपुर रेफर किया गया, जहां 22 जनवरी 2024 को सुबह लगभग 6:00 बजे इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

जेल की शुरुआती मेडिकल रिपोर्ट में मौत का कारण अत्यधिक शराब छोड़ने के लक्षणों (अल्कोहलिक विड्रॉल) और डेलिरियम ट्रेमेंस के कारण कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट बताया गया था, जिसमें किसी भी शारीरिक चोट का कोई जिक्र नहीं था। हालांकि, बाद में गठित मेडिकल बोर्ड द्वारा किए गए पोस्टमार्टम में शरीर पर छह गंभीर चोटें पाई गईं:

  1. लिंग के शीर्ष भाग से खून बहना।
  2. सिर के पिछले हिस्से (ऑक्सीपिटल स्कैल्प) पर 4 x 2 x 0.5 सेमी का घाव, जिसमें सूजन और खून बह रहा था।
  3. दाहिनी कलाई के ठीक ऊपर सूजन और लालिमा।
  4. दोनों पैरों पर सूजन।
  5. दाहिनी जांघ के बाहरी हिस्से पर 4 x 2 सेमी का नीला-हरा/गहरा चोट का निशान।
  6. गर्दन के पीछे (नेप ऑफ द नेक) पर 4 x 3 सेमी का नीला-हरा/गहरा चोट का निशान।
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पोस्टमार्टम बोर्ड ने निष्कर्ष निकाला कि मौत का कारण किसी कठोर व भौंटे (ब्लंट) वस्तु से सिर में लगी चोट से उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुआ कार्डियो-रेस्पिरेटरी अरेस्ट था। सिर की चोट एक दिन पुरानी और अन्य चोटें 2 से 6 दिन पुरानी बताई गईं।

घटना के बाद जेल अधीक्षक के अनुरोध पर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 176 के तहत न्यायिक जांच के आदेश दिए गए। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, बिलासपुर ने 22 जुलाई 2024 को अपनी जांच रिपोर्ट सौंपी, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि मृत्यु सिर की चोट के कारण हुई जटिलताओं से हुई प्रतीत होती है।

हाईकोर्ट की कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट में अपील

न्यायिक जांच रिपोर्ट में हिरासत में हिंसा की पुष्टि के बावजूद न तो कोई एफआईआर दर्ज की गई और न ही दोषी पुलिसकर्मियों पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई। इसके खिलाफ मृतक के विधिक वारिसों—पत्नी लहरा बाई ताम्रे और उनकी नाबालिग बेटियों—ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर दर्ज करने और 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग की।

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 3 अक्टूबर 2024 के अपने फैसले में यह स्वीकार किया कि मृतक की मौत हिरासत में हुई हिंसा के कारण हुई थी और मूलभूत अधिकारों के हनन पर मिलने वाला मुआवजा उदाहरणात्मक हर्जाना (एग्जम्पलरी डैमेजेस) होता है। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने केवल 1 लाख रुपये का मुआवजा मंजूर किया और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का कोई निर्देश नहीं दिया। इस अपर्याप्त मुआवजे और जांच न कराए जाने से व्यथित होकर याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की।

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सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 4 अगस्त 2026 को छत्तीसगढ़ के मुख्य पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), पुलिस महानिदेशक (जेल) और प्रमुख सचिव (गृह) वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में पेश हुए। एफआईआर दर्ज न करने पर सवाल पूछे जाने पर डीजीपी ने तर्क दिया कि चूंकि पुलिस को धारा 176 की न्यायिक जांच रिपोर्ट औपचारिक रूप से प्राप्त नहीं हुई थी, इसलिए आपराधिक मामला दर्ज करने का कोई अवसर नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि राज्य सरकार ने खुद हाईकोर्ट में दाखिल अपने जवाब में माना था कि न्यायिक जांच चल रही है और रिपोर्ट का इंतजार है। अदालत ने कहा कि जेल में तैयार की गई मेडिकल रिपोर्ट जांच को गुमराह करने का एक प्रयास थी, क्योंकि उसमें उन गंभीर चोटों का कोई उल्लेख नहीं था जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आईं।

राज्य अधिकारियों के रवैये की आलोचना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि उच्च अधिकारियों का यह रुख अपवित्र है और कस्टोडियल डेथ से जुड़ी वैधानिक प्रक्रिया के प्रति चिंताजनक उपेक्षा को दर्शाता है।

राज्य की दलीलों को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि दिया गया स्पष्टीकरण एक ढकोसला है और अदालत की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास है। कोर्ट ने आगे कहा कि डीजीपी का यह दावा कि रिपोर्ट नहीं मिली थी, पूरी तरह से झूठा और अत्यंत निंदनीय है।

अदालत ने कहा कि चोटों के समय को देखते हुए हिरासत के दौरान मृतक के साथ बार-बार मारपीट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, इसलिए तुरंत एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष जांच किया जाना कानूनी रूप से आवश्यक था।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश

न्याय के हित में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की स्वतंत्र जांच कराने के लिए निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. सीबीआई जांच: सीबीआई के निदेशक को निर्देश दिया गया कि वे इस कस्टोडियल डेथ मामले में तुरंत नियमित आपराधिक मामला (एफआईआर) दर्ज करें और जांच किसी वरिष्ठ अधिकारी को सौंपकर त्वरित कार्रवाई करें। जांच रिपोर्ट अगली सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश की जाएगी।
  2. अधिकारियों के आचरण की जांच: सीबीआई अपनी जांच में यह भी शामिल करेगी कि न्यायिक जांच रिपोर्ट मिलने के बाद भी कार्रवाई न करने के लिए कौन-कौन से राज्य अधिकारी जिम्मेदार थे।
  3. रिकॉर्ड सौंपना: छत्तीसगढ़ के डीजीपी को एक सप्ताह के भीतर विशेष संदेशवाहक (स्पेशल मैसेंजर) के माध्यम से मामले के पूरे रिकॉर्ड सीबीआई निदेशक को भेजने का निर्देश दिया गया।
  4. अंतरिम मुआवजा: छत्तीसगढ़ सरकार को चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता संख्या 1, लहरा बाई ताम्रे के बैंक खाते में 25 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा जमा करने का आदेश दिया गया। अंतिम मुआवजे की राशि का निर्धारण बाद में किया जाएगा।
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मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: लहरा बाई ताम्रे व अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य

वाद संख्या: स्पेशल लीव पिटीशन (क्रिमिनल) नंबर 728/2026

पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता

निर्णय की तिथि: 12 अगस्त 2026

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