नाबालिग बेटी से यौन शोषण मामले में पिता की जमानत खारिज, केरल हाईकोर्ट बोला- माता-पिता को समझौते का अधिकार नहीं

केरल हाईकोर्ट ने अपनी 17 वर्षीय नाबालिग बेटी के साथ बार-बार यौन उत्पीड़न करने के आरोपी 50 वर्षीय पिता की दूसरी जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने साफ किया कि नाबालिग बच्चों के खिलाफ हुए यौन अपराधों के मामलों में माता-पिता को आपस में समझौता करने या कानूनी कार्रवाई रोकने का कोई अधिकार नहीं है।

राज्य का कर्तव्य सर्वोपरि

जस्टिस कौसर एडप्पागथ ने 3 अगस्त को दिए अपने आदेश में कहा कि अगर माता-पिता आपराधिक मुकदमे को रोकने के उद्देश्य से कोर्ट से बाहर कोई समझौता करते हैं, तो उसकी कोई कानूनी मान्यता नहीं होगी। अदालत ने जोर देकर कहा कि ऐसे निजी समझौते बच्चों के खिलाफ हुए अपराधों में मुकदमा चलाने की राज्य की जिम्मेदारी से ऊपर नहीं हो सकते। पोक्सो (POCSO) कानून के तहत नाबालिगों से यौन शोषण के मामले गैर-समझौतायोग्य होते हैं।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अपने ‘पेरेंट्स पैट्री’ (parens patriae) क्षेत्राधिकार का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि जब माता-पिता ही अपनी नाबालिग बच्ची के अधिकारों की रक्षा करने में नाकाम रहते हैं, तब अदालतों का यह नैतिक और कानूनी दाय दायित्व बनता है कि वे पीड़िता के हितों की रक्षा करें।

मां के रुख पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

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मामले में पीड़िता की मां के रवैये पर भी अदालत ने चिंता जताई। शुरुआत में मां ने ही पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी, लेकिन बाद में उन्होंने कोर्ट में हलफनामा देकर समझौता होने की बात कही और आरोपी को जमानत देने पर सहमति जताई। इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि यह मामला ऐसा है जहां “बाड़ ही खेत को खाने लगी” (the fence itself devouring the crop)।

अदालत ने गौर किया कि मां ने अपने हलफनामे में कहीं भी यह नहीं कहा कि यौन शोषण की घटना नहीं हुई थी। उन्होंने केवल यह तर्क दिया था कि दोनों पक्षों में अब समझौता हो चुका है।

मामले की पृष्ठभूमि और दलीलें

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी पिता ने अपनी नाबालिग बेटी का तीन महीने की अवधि में कई बार यौन शोषण किया। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ पोक्सो एक्ट की विभिन्न गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर उसे हिरासत में लिया था। पहली जमानत याचिका खारिज होने के बाद से वह लगातार जेल में है।

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दूसरी जमानत याचिका में आरोपी के वकील जेरी मैथ्यू ने दावा किया कि उनके मुवक्किल को झूठा फंसाया गया है और उनके खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं। उन्होंने मां के समझौते वाले हलफनामे का हवाला देते हुए जमानत की मांग की। दूसरी तरफ, सीनियर पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह एक सुनियोजित और गंभीर अपराध है, इसलिए आरोपी को जमानत नहीं दी जानी चाहिए।

अदालत ने अभियोजन की दलीलों और अपराध की गंभीरता को देखते हुए आरोपी की जमानत अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया।

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