एक बच्चे की कस्टडी से जुड़े विवाद में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे. बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए अपने ‘पैरेन्स पेट्रिए’ (अभिभावकीय) क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया। अदालत ने नाबालिग बच्चे की कस्टडी वापस उसके नाना-नानी को सौंपने का निर्देश दिया और माना कि बच्चे का कल्याण और हित उनके पास ही सबसे बेहतर तरीके से सुरक्षित रहेगा।
मामले का पृष्ठभूमि
यह अवमानना याचिका नाना-नानी द्वारा पूर्व के अदालती फैसले का पालन न होने का आरोप लगाते हुए दायर की गई थी। याचिकाकर्ता की बेटी यानी बच्चे की मां का निधन हो चुका था, जिसके बाद से नाना-नानी ही बच्चे की देखरेख कर रहे थे।
पूर्व की कार्यवाही में सुप्रीम कोर्ट ने प्राकृतिक अभिभावक यानी पिता द्वारा दायर याचिका पर ध्यान दिया था, जिसमें कस्टडी पिता को सौंपने की मांग की गई थी। उस समय अदालत ने पिता को कस्टडी सौंपने का आदेश दिया था। अदालत ने नोट किया था कि दादाजी ने बच्चे के नाम 10 लाख रुपये जमा कराए थे और 25 लाख रुपये की जीवन बीमा पॉलिसी ली थी, जिसमें नाबालिग को लाभार्थी बनाया गया था। इसके अलावा, पिता राज्य प्रशासनिक सेवा में एक जिम्मेदार पद पर कार्यरत थे और उन्होंने नाबालिग की उचित देखभाल सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पुनर्विवाह किया था।
चूंकि बच्चा 2021 से पिता से अलग रह रहा था, इसलिए अदालत ने शैक्षणिक सत्र समाप्त होने तक 30 अप्रैल 2025 तक कस्टडी नाना-नानी के पास ही बनाए रखने का निर्देश दिया था। इस दौरान पिता को हर दूसरे सप्ताहांत पर बच्चे से मिलने और महीने के दूसरे शनिवार को बच्चे को अपने पैतृक घर ले जाने की अनुमति दी गई थी। इसके बाद 1 मई 2025 को क्षेत्राधिकार वाले थाना प्रभारी की मौजूदगी में बच्चे को पिता को सौंपा जाना तय हुआ था, जबकि जून 2025 से हर दूसरे शनिवार को नाना-नानी को मुलाकात का अधिकार दिया गया था।
पक्षों की दलीलें
नाना-नानी ने अवमानना याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि कस्टडी हस्तांतरित होने के बाद बच्चे को एक बार भी उनके पास नहीं भेजा गया।
इसके जवाब में पिता का तर्क था कि नाना-नानी खुद ही तय दूसरे शनिवार को बच्चे को लेने नहीं आए। इसके अलावा, पिता ने यह भी कहा कि उनका आधिकारिक तबादला एक दूर के स्थान पर हो गया है, जो नाना-नानी के घर से काफी दूर है।
अदालत का विश्लेषण और निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे को अपने समक्ष पेश करने का निर्देश दिया और पीठ ने कमेटी रूम में नाबालिग से सीधे बातचीत की। इस बातचीत के बाद अदालत ने कहा:
“बच्चे से बातचीत करने के बाद हमारी यह राय है कि यदि उसे उसके नाना-नानी की देखरेख में रहने दिया जाए तो बच्चे का हित और कल्याण सबसे बेहतर तरीके से होगा।”
अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि बच्चे के तीन मामा अपने माता-पिता (नाना-नानी) के साथ ही रहते हैं। अदालत में मौजूद एक मामा ने बताया कि जब पिता को कस्टडी सौंपने का पुराना आदेश आया था, उससे पहले ही बच्चे का दाखिला एक प्रतिष्ठित संस्थान में करा दिया गया था और फीस भी जमा कर दी गई थी।
अवमानना मामले की सुनवाई के दौरान कस्टडी व्यवस्था में संशोधन की वजह स्पष्ट करते हुए पीठ ने बच्चे के प्रति अपनी संरक्षक भूमिका पर जोर दिया और टिप्पणी की:
“हम इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि हम अवमानना मामले पर सुनवाई कर रहे थे, लेकिन बच्चे से बातचीत के बाद हमारी यह राय बनी कि पैरेन्स पेट्रिए क्षेत्राधिकार का उपयोग करना उचित होगा, जिसके तहत हमने उपरोक्त आदेश पारित किया है।”
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामा को अदालत परिसर से ही बच्चे को अपने साथ ले जाने की अनुमति दे दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि नाना-नानी कानून के अनुसार भरण-पोषण के दावे के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं।
पिता के मुलाकात के अधिकारों के संबंध में अदालत ने निर्देश दिया कि पिता को सबसे पहले बच्चे में विश्वास पैदा करना होगा। यदि बच्चा स्वयं इच्छा जताता है, तो पिता को हर तीन महीने में एक बार बच्चे से मिलने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन यह मुलाकात नाना-नानी या मामा की सख्त देखरेख में ही होगी।
इन निर्देशों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिका को समाप्त कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अशोक कुमार तिवारी बनाम विवेक कुमार चतुर्वेदी एवं अन्य
वाद संख्या: अवमानना याचिका सिविल संख्या 251/2026 क्रिमिनल अपील संख्या 623/2025 में
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारडीवाला, जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 07 अगस्त 2026

