गर्भवती पत्नी से मारपीट और भ्रूण लिंग परीक्षण के आरोपी पति को हाईकोर्ट से मिली जमानत, सुधार की सलाह

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने अपनी तीन महीने की गर्भवती पत्नी के साथ मारपीट करने और उस पर अवैध भ्रूण लिंग परीक्षण कराने का दबाव बनाने के आरोपी पति को नियमित जमानत दे दी है। 3 अगस्त को जारी अपने आदेश में जस्टिस संजय वशिष्ठ की पीठ ने याचिकाकर्ता को अपनी शराब पीने की आदत छोड़ने का प्रयास करने और अपने परिवार तथा बुजुर्ग मां के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की सलाह भी दी।

सुरक्षा और मायके में रहने की छूट

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पीड़िता यदि चाहे तो अपने बच्चे के जन्म और पूरी तरह से शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ होने तक अपने मायके में रह सकती है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस संवेदनशील समय के दौरान महिला की सुरक्षा, आराम और सहूलियत सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया गया है। इसके साथ ही, अदालत ने आरोपी पति को निर्देश दिया कि वह अभियोजन पक्ष के गवाहों को डराने या संपर्क करने की कोशिश न करे।

शराब के नशे में अत्याचार का आरोप

यह मामला 14 और 15 अप्रैल को हुई घरेलू हिंसा की घटना से जुड़ा है, जिसकी पुलिस शिकायत 20 अप्रैल को दर्ज कराई गई थी। दंपति का विवाह 5 मई 2019 को हुआ था और उनकी साढ़े पांच साल तथा दो साल की दो बेटियां हैं।

READ ALSO  राजस्थान हाईकोर्ट में आज से ग्रीष्मकालीन अवकाश प्रारंभ, केवल आवश्यक मामलों की होगी सुबह 8 से दोपहर 1 बजे तक सुनवाई

पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी शराब के नशे में लगातार अपनी पत्नी से झगड़ा करता था। वह तीसरी बेटी नहीं चाहता था, इसलिए उसने पत्नी पर अल्ट्रासाउंड कराकर भ्रूण का लिंग जांच कराने का दबाव बनाया। जब महिला ने इस गैरकानूनी मांग को खारिज कर दिया, तो आरोपी ने उसके साथ कथित तौर पर बर्बरतापूर्वक मारपीट की। उसने पत्नी के बाल खींचे, उसे दीवार से टकराया, लात-घूंसों से पीटा और रसोई के धारदार हथियार से उसकी बांह पर वार किया। मेडिकल जांच में महिला के शरीर पर 11 चोटों की पुष्टि हुई, जिन्हें डॉक्टरों ने साधारण प्रकृति का बताया।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

जमानत याचिका का कड़ा विरोध करते हुए राज्य के वकील ने तर्क दिया कि आरोपी का इरादा बच्चे को जीवित पैदा होने से रोकना था, जो भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 91 के तहत अपराध की श्रेणी में आता है। अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि आरोपों की गंभीरता और हमले की क्रूरता को देखते हुए आरोपी को हिरासत में ही रखा जाना चाहिए।

दूसरी ओर, आरोपी के वकील इंपिंदर सिंह धलीवाल ने अदालत में कहा कि घटना और एफआईआर दर्ज कराने के बीच पांच दिनों की बिना किसी स्पष्ट कारण की देरी हुई है। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि पीड़िता की चोटें जानलेवा नहीं थीं और आरोपी 21 अप्रैल से हिरासत में है, इसलिए उसे bail प्रदान की जाए।

READ ALSO  'जजों को बनाया जा रहा है निशाना': पर्यावरण पर कड़े आदेशों के खिलाफ प्रतिक्रिया पर बोले पूर्व जस्टिस अभय एस ओका

जमानत देने का आधार

मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि यह विवाद वैवाहिक मतभेद से उपजा है। अदालत ने माना कि यद्यपि आरोप साबित होने पर गंभीर हैं, लेकिन पुलिस जांच पूरी हो चुकी है और मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में काफी समय लगेगा। याचिकाकर्ता के पहले ही जेल में तीन महीने बिताने के कारण उसे आगे हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं बनता। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस जमानत आदेश में की गई प्रारंभिक टिप्पणियों का मुख्य मुकदमे के अंतिम फैसले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

READ ALSO  उन्नाव रेप केस: सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता को सेंगर की सजा निलंबन के खिलाफ CBI याचिका में पक्षकार बनने की अनुमति दी
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles