स्वीकृत पद और अनिवार्य योग्यता के बिना हुई नियुक्ति शुरुआत से ही अवैध, लंबी सेवा के आधार पर नहीं मिल सकता नियमितीकरण: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस पंकज भाटिया ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि बिना स्वीकृत पद और बिना अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता के की गई नियुक्ति शुरुआत से ही अवैध (illegal ab initio) होती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल लंबे अध्यापन अनुभव के आधार पर कोई समता (equity) का दावा नहीं कर सकता और न ही सरकारी खजाने से वेतन या नियमितीकरण का हकदार हो सकता है। कोर्ट ने नियमितीकरण और सरकारी खजाने से वेतन की मांग करने वाले एक शिक्षक की दो रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया, हालांकि यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता अपने वेतन का दावा सीधे स्कूल की प्रबंध समिति से करने के लिए स्वतंत्र है।

मामले का पूरा घटनाक्रम

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता विनोद कुमार सिंह को 23 नवंबर 1999 को स्कूल की प्रबंध समिति (उत्तरदायी संख्या 5) द्वारा नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के समय याचिकाकर्ता के पास बी.एससी. (गणित) और राष्ट्रीय पत्राचार संस्थान, कानपुर द्वारा जारी ‘शिक्षा अलंकार’ की डिग्री थी। जब राज्य सरकार ने वेतन का भुगतान नहीं किया, तो याचिकाकर्ता ने वर्ष 2000 में हाईकोर्ट में याचिका (रिट याचिका संख्या 708 (एसएस)/2000) दाखिल की, जिस पर 19 अप्रैल 2000 को अंतरिम आदेश पारित हुआ। इस अंतरिम आदेश के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा दायर विशेष अपील (संख्या 319/2001) को 27 अक्टूबर 2009 को खारिज कर दिया गया था।

विशेष अपील खारिज होने के बाद, जून 2010 में शिक्षा निदेशक से मार्गदर्शन मांगा गया। इसके बाद जुलाई 2010 में एक आदेश जारी कर याचिकाकर्ता को तब तक वेतन भुगतान का निर्देश दिया गया, जब तक कि प्रबंध समिति द्वारा भेजी गई अधियाचन (requisition) के आधार पर हिंदी विषय में नियमित शिक्षक का चयन नहीं हो जाता। इसके तहत याचिकाकर्ता को जुलाई 2010 से 14 अगस्त 2013 तक वेतन दिया गया, लेकिन उसके बाद भुगतान रोक दिया गया।

इसके बाद 22 अक्टूबर 2020 को सक्षम प्राधिकारी ने याचिकाकर्ता के वेतन और नियमितीकरण के दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। इस अस्वीकृति के दो मुख्य आधार थे: पहला, उत्तर प्रदेश हाईस्कूल एवं इण्टरमीडिएट कॉलेज (अध्यापकों एवं अन्य कर्मचारियों के वेतन का भुगतान) अधिनियम, 1971 के नियम 9 के तहत वह पद स्वीकृत ही नहीं था; और दूसरा, याचिकाकर्ता के पास यूपी शिक्षा नियमावली के अध्याय-2, परिशिष्ट-ए के तहत निर्धारित ‘प्रशिक्षित’ (trained) योग्यता नहीं थी। राष्ट्रीय पत्राचार संस्थान, कानपुर से प्राप्त ‘शिक्षा अलंकार’ की डिग्री अमान्य थी और वह बी.एड. (B.Ed.) के समकक्ष नहीं मानी गई। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को रिट ए संख्या 14526/2021 के माध्यम से चुनौती दी। इसके अलावा, उसने एक और याचिका (रिट ए संख्या 7109/2026) दाखिल कर मांग की कि जब तक उसके नियमितीकरण पर फैसला न हो जाए, तब तक सहायक अध्यापक (एल.टी. ग्रेड गणित) के पद पर नई भर्ती या अधियाचन पर रोक लगाई जाए।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जब राज्य सरकार ने स्कूलों में विज्ञान और गणित विषय शुरू किए, तब स्वीकृत पद उपलब्ध न होने के कारण प्रबंध समिति ने याचिकाकर्ता को बी.एससी. गणित और ‘शिक्षा अलंकार’ योग्यता के आधार पर नियुक्त किया था। समाज कल्याण विभाग द्वारा जारी 6 सितंबर 2000 और 25 जून 2002 के पत्रों का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने दावा किया कि राज्य सरकार ने ‘शिक्षा अलंकार’ को बी.एड. के समकक्ष माना था। यह भी दलील दी गई कि याचिकाकर्ता 1999 से लगातार सेवा दे रहा है, इसलिए उसके लंबे अनुभव को देखते हुए उसे नियमित किया जाना चाहिए और वेतन का भुगतान होना चाहिए।

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अपनी दलीलों के समर्थन में याचिकाकर्ता ने राम चंद्र द्विवेदी बनाम शिक्षा निदेशक और सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्पेशल लीव टू अपील (सी) संख्या 14907/2009 में दिए गए आदेशों का हवाला दिया, जिनमें लंबी सेवा के बाद नियुक्तियों को रद्द न करने का उल्लेख किया गया था।

दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने इन मांगों का कड़ा विरोध किया। राज्य पक्ष ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास शुरुआत से ही वैधानिक योग्यता नहीं थी और न ही पद स्वीकृत था, जो वेतन भुगतान अधिनियम, 1971 की धारा 9 का सीधा उल्लंघन है। राज्य ने गुलाम रसूल वारसी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2011 के एक अन्य फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट रूप से माना गया था कि ‘शिक्षा अलंकार’ डिग्री अमान्य है और यह बी.एड. के समकक्ष नहीं है। इसके अलावा, राज्य ने यूपी माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड अधिनियम, 1982 की संशोधित धारा 33-जी का उल्लेख किया, जिसके तहत नियमितीकरण के लिए इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम, 1921 के तहत निर्धारित योग्यताएं पूरी होना अनिवार्य है। राज्य ने एक पूर्ण पीठ (Full Bench) के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि बिना स्वीकृत पद के कोई भी नियुक्ति वैध नहीं हो सकती।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम 1921, यूपी माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड अधिनियम 1982 और वेतन भुगतान अधिनियम 1971 के कानूनी प्रावधानों का गहन परीक्षण करने के बाद, हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि वैधानिक योग्यताएं और पद के सृजन की पूर्व स्वीकृति ऐसी शर्तें हैं जिनसे कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने ‘शिक्षा अलंकार’ को बी.एड. के समकक्ष बताने के याचिकाकर्ता के दावे को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि 6 सितंबर 2000 और 25 जून 2002 के जिन पत्रों का हवाला दिया गया है, उनमें से कोई भी ‘शिक्षा अलंकार’ को परिशिष्ट-ए के तहत आवश्यक बी.एड. डिग्री के समकक्ष घोषित नहीं करता। इसलिए, कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति बिना स्वीकृत पद और बिना अनिवार्य व्यावसायिक प्रशिक्षण के की गई थी।

लंबी सेवा और अनुभव के आधार पर समता के दावे को खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अवैध रूप से नियुक्त व्यक्ति के पक्ष में लंबे समय तक काम करने से कोई कानूनी अधिकार या समता उत्पन्न नहीं होती। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले शेष मणि शुक्ला बनाम जिला विद्यालय निरीक्षक, देवरिया व अन्य [(2009) 15 SCC 436] का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने उसके मुख्य अंश को उद्धृत किया:

“यह सच है कि अपीलकर्ता ने लंबे समय तक काम किया है। हालांकि, उनकी नियुक्ति वैधानिक प्रावधान के उल्लंघन में होने के कारण अवैध थी, और इसलिए शुरुआत से ही शून्य (void ab initio) थी। यदि उनकी नियुक्ति को वैधानिक प्राधिकरण द्वारा मंजूरी नहीं दी गई है, तो केवल इसलिए कोई अपवाद नहीं बनाया जा सकता क्योंकि अपीलकर्ता ने लंबे समय तक काम किया था। हमारी राय में, केवल यह तथ्य परमादेश (mandamus) की रिट प्राप्त करने का आधार नहीं बन सकता; क्योंकि यह सर्वविदित है कि इस उद्देश्य के लिए, रिट याचिकाकर्ता को स्वयं में एक कानूनी अधिकार और राज्य में एक समान कानूनी कर्तव्य स्थापित करना होगा। केवल सहानुभूति या भावनाएं परमादेश की रिट जारी करने का आधार नहीं बन सकतीं।”

हाईकोर्ट का निर्णय

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि स्वीकृत पद और वैध योग्यता के अभाव में 22 अक्टूबर 2020 के निरस्तीकरण आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं है।

तदनुसार, कोर्ट ने रिट याचिका संख्या 14526/2021 को खारिज कर दिया, हालांकि यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता अपने वेतन का दावा सीधे स्कूल की प्रबंध समिति से करने का हकदार बना रहेगा।

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इसके अलावा, चूंकि याचिकाकर्ता प्रथम दिन से ही पद के लिए अयोग्य पाया गया, इसलिए कोर्ट ने माना कि वह नई भर्ती या अधियाचन को रोकने की मांग करने का अधिकारी नहीं है। कोर्ट ने रिट याचिका संख्या 7109/2026 को भी खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: विनोद कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: रिट ए संख्या 7109/2026 (साथ में रिट ए संख्या 14526/2021)
पीठ: जस्टिस पंकज भाटिया
निर्णय की तिथि: 6 अगस्त 2026

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