हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि सरोगेसी के जरिए मां बनने वाली राज्य सरकार की महिला कर्मचारी 180 दिनों के मातृत्व अवकाश की हकदार हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा केंद्र के नए नियमों को औपचारिक रूप से न अपनाने का बहाना बनाकर किसी महिला को इस संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। इस आदेश के साथ ही अदालत ने एक महिला सरकारी डॉक्टर की याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें दोनों बच्चों के जन्म पर मातृत्व अवकाश और रोका गया वेतन जारी करने का निर्देश दिया है।
जस्टिस अजय मोहन गोयल की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार के उन विभागीय आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके तहत डॉक्टर को मातृत्व अवकाश देने से इनकार किया गया था। स्वास्थ्य विभाग ने 22 अगस्त 2023 और 31 जुलाई 2025 के पत्रों के जरिए उनके आवेदन को खारिज कर दिया था। राज्य सरकार का तर्क था कि हिमाचल प्रदेश ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) की 18 जून 2024 की उस अधिसूचना को औपचारिक रूप से लागू नहीं किया है, जो सरोगेट और कमिशनिंग माताओं को केंद्रीय सिविल सेवा (छुट्टी) नियम 1972 के तहत मातृत्व अवकाश का लाभ देती है।
प्राकृतिक और सरोगेसी से बनी मां के अधिकार समान
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस गोयल ने कहा कि चाहे बच्चा प्राकृतिक रूप से जन्मा हो या सरोगेसी के जरिए, मां का दर्जा और अधिकार दोनों स्थितियों में एक समान रहता है। मातृत्व अवकाश का मुख्य उद्देश्य नवजात शिशु की देखभाल और उसका कल्याण सुनिश्चित करना है।
कोर्ट ने कहा कि DoPT की अधिसूचना लागू न होने का बहाना पूरी तरह पोषणीय नहीं है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 2021 के सुषमा देवी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले में पहले ही यह सिद्धांत तय कर दिया था कि कमिशनिंग माताओं को भी मातृत्व अवकाश का पूरा अधिकार है और उनके साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने दोहराया कि यह कानूनी स्थिति पहले से ही राज्य सरकार पर बाध्यकारी थी।
वेतन रोकने और विभागीय कार्रवाई पर कोर्ट का रुख
यह कानूनी विवाद एक महिला चिकित्सा अधिकारी की याचिका पर सामने आया, जिन्होंने सरोगेसी से पहले बच्चे के जन्म के बाद 17 सितंबर 2020 से 180 दिनों का अवकाश लिया था। इसके बाद, 27 सितंबर 2022 को दूसरे बच्चे के जन्म पर उन्होंने दोबारा 180 दिनों के मातृत्व अवकाश का आवेदन किया। हालांकि, विभाग ने इसे मातृत्व अवकाश मानने से इनकार कर दिया और जुलाई 2021, अगस्त 2021 तथा सितंबर 2021 के आठ दिनों का उनका वेतन रोक लिया।
विभाग ने अनधिकृत अनुपस्थिति का हवाला देकर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी शुरू की थी। 3 अगस्त को अदालत के समक्ष सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता अजय शर्मा ने बताया कि सक्षम प्राधिकारी ने 2 जुलाई 2024 को ही डॉक्टर को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया था। वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि सीसीएस (छुट्टी) नियमों के नियम 43 के तहत दो से कम जीवित बच्चों वाली महिला कर्मचारी 180 दिनों के मातृत्व अवकाश की हकदार हैं।
दत्तक ग्रहण नियम और अन्य हाईकोर्ट्स के उदाहरण
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की नीति में विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश ने 2022 में नियम 43-बी शामिल किया था, जिसके तहत एक साल से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने पर 180 दिनों का दत्तक ग्रहण अवकाश दिया जाता है। जब सरकार बच्चा गोद लेने पर अवकाश दे रही है, तो सरोगेसी के जरिए मां बनने वाली महिलाओं को मातृत्व अवकाश देने से इनकार करना पूरी तरह अनुचित है।
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने दिल्ली, बॉम्बे और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें कमिशनिंग माताओं के अधिकारों को मान्यता दी गई है और उन्हें मातृत्व अवकाश न देने को भेदभावपूर्ण माना गया है।
दो महीने के भीतर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश
अदालत ने याचिकाकर्ता डॉक्टर के दोनों बच्चों के जन्म के बाद ली गई 180-180 दिनों की अवधि को मातृत्व अवकाश के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया। इसके तुरंत बाद ली गई अतिरिक्त छुट्टियों को सीसीएस नियमों के नियम 43(4)(a) और 43(4)(b) के तहत स्वीकार्य अवकाश और अर्जित अवकाश में समायोजित करने का निर्देश दिया गया। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को रोका गया वेतन जारी करने और छुट्टियों का समायोजन करने की पूरी प्रक्रिया दो महीने के भीतर पूरी करने का आदेश दिया है।

