नाबालिग के अवैध गर्भपात मामले में डॉक्टर को राहत देने से दिल्ली हाईकोर्ट का इनकार, आपराधिक मामला चलेगा

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक 16 वर्षीय नाबालिग लड़की का अवैध रूप से गर्भपात करने और इस मामले की जानकारी पुलिस को न देने के आरोपी डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि डॉक्टरों को उम्र से जुड़े मामलों में केवल जुबानी बयानों पर भरोसा करने के बजाय किसी दस्तावेज के जरिए मरीज की वास्तविक उम्र दर्ज करनी होगी।

जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने 5 अगस्त को दिए अपने फैसले में कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड के आधार पर आरोपी डॉक्टर के खिलाफ मुकदमा चलाने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं। पीठ ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें डॉक्टर को समन जारी किया गया था और मामले की जांच आगे बढ़ाने के आदेश दिए गए थे।

मौखिक बयान के आधार पर उम्र तय करना कानूनन गलत

मामला जुलाई 2019 का है, जब एक 16 साल की लड़की का छह हफ्ते का गर्भपात कराया गया था। उस दौरान लड़की के साथ आई एक महिला ने खुद को उसकी चाची बताते हुए अस्पताल के कर्मचारियों से कहा कि यह बच्चा लड़की के प्रेमी का है और उसकी उम्र 20 साल है। अस्पताल के कर्मचारियों ने बिना किसी पहचान पत्र या पते के सबूत के लड़की की उम्र 20 साल दर्ज कर ली।

बाद में पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि साथ आई महिला का पीड़िता से कोई रिश्ता नहीं था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, गर्भपात की प्रक्रिया के दौरान डॉक्टर को लड़की के नाबालिग होने की जानकारी मिल गई थी, लेकिन उन्होंने पुलिस को सूचित नहीं किया। इस लापरवाही के कारण प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज होने में 70 दिनों की देरी हुई।

READ ALSO  जिन अपराधों की जांच चल रही है और जिनके लिए आरोप पत्र दायर नहीं किया गया है, उन पर आरोपी के खिलाफ निर्वासन आदेश पारित करने पर विचार नहीं किया जा सकता है: बॉम्बे हाईकोर्ट

अभिभावक की लिखित सहमति के बिना नहीं हो सकता गर्भपात

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (एमटीपी) कानून का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि नाबालिग लड़की स्वतंत्र रूप से गर्भपात की सहमति देने के योग्य नहीं होती। कानून के तहत प्रक्रिया शुरू करने से पहले अभिभावक की लिखित सहमति लेना अनिवार्य है।

जस्टिस कौरव ने टिप्पणी की कि एमटीपी कानून मांग पर गर्भपात कराने का असीमित अधिकार नहीं देता। किसी मरीज की उम्र की पुष्टि करना डॉक्टर की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि कोई डॉक्टर किसी दस्तावेज के बिना सिर्फ जुबानी बयान पर गर्भपात करता है, तो यह केवल एक प्रक्रियात्मक चूक नहीं है, बल्कि कानून की मूल भावना को कमजोर करना है।

ट्रायल कोर्ट के आदेशों को हाईकोर्ट ने रखा बरकरार

READ ALSO  सबको अपनी पसंद का साथी चुनने का अधिकार: हाई कोर्ट

सितंबर 2020 में निचली अदालत ने यह जांचने का आदेश दिया था कि क्या डॉक्टर ने जानबूझकर लड़की की उम्र छिपाई और पॉक्सो कानून की धारा 19 का उल्लंघन करते हुए पुलिस को इसकी सूचना नहीं दी। इसके बाद दाखिल पूरक आरोप पत्र में डॉक्टर को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 313 (महिला की सहमति के बिना गर्भपात कराना) के तहत एकमात्र आरोपी बनाया गया।

ट्रायल कोर्ट ने पॉक्सो कानून की धारा 21 के तहत संज्ञान लेते हुए जुलाई 2021 में डॉक्टर को समन जारी किया था। पॉक्सो कानून की धारा 19 के तहत डॉक्टरों के लिए किसी नाबालिग के गर्भवती होने की सूचना पुलिस को देना अनिवार्य है, जबकि धारा 21 ऐसा न करने पर सजा का प्रावधान करती है।

READ ALSO  केंद्रीय मंत्री बंडी संजय के बेटे पहुंचे तेलंगाना हाई कोर्ट; POCSO मामले में अग्रिम जमानत और FIR रद्द करने की मांग

हाईकोर्ट ने डॉक्टर द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि निचली अदालत के जांच और समन के आदेशों में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। अदालत ने निर्देश दिया कि डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक मुकदमा तय प्रक्रिया के तहत चलता रहेगा।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles