सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के एक इंस्पेक्टर द्वारा मौलिक नियमों (फंडामेंटल रूल्स) के नियम 56(जे) के तहत दी गई अपनी अनिवार्य सेवानिवृत्ति को चुनौती देने वाली नागरिक अपील को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को सेवा में बनाए रखने की उपयुक्तता का आकलन करते समय ‘वाश्ड-ऑफ थ्योरी’ (पुराने प्रतिकूल रिकॉर्ड का समाप्त माना जाना) लागू नहीं होती। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए निर्णय दिया कि सक्षम प्राधिकरण कर्मचारी के पूरे सेवा रिकॉर्ड—जिसमें पदोन्नति से पहले की प्रतिकूल प्रविष्टियां भी शामिल हैं—पर विचार करने का हकदार है, साथ ही उसे तुरंत पूर्व के वर्षों में कार्यक्षमता में आई गिरावट को भी उचित वजन देना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
अपॉइंटमेंट और पदोन्नति के विवरण के अनुसार, अपीलकर्ता सुशील शर्मा 28 जून 1982 को सीआईएसएफ में सहायक सब-इंस्पेक्टर के रूप में शामिल हुए थे। सेवा के दौरान उन्हें दो पदोन्नतियां मिलीं—पहली 29 मार्च 1990 को सब-इंस्पेक्टर के पद पर और दूसरी 19 सितंबर 2003 को इंस्पेक्टर के पद पर। 50 वर्ष की आयु पूरी करने पर उनका मामला मौलिक नियमों के नियम 56(जे) के तहत समीक्षा के लिए आंतरिक स्क्रीनिंग कमेटी के समक्ष रखा गया।
आंतरिक स्क्रीनिंग कमेटी ने अपीलकर्ता को सेवा में बनाए रखने के लिए अयोग्य पाया। समीक्षा समिति ने 6 जून 2010 को इस निष्कर्ष की पुष्टि की, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया गया। इस आदेश के खिलाफ अपीलकर्ता द्वारा दिया गया अभ्यावेदन भी अभ्यावेदन समिति ने खारिज कर दिया।
इसके बाद अपीलकर्ता ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी। हाईकोर्ट ने वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों (एसीआर) की समीक्षा के बाद याचिका खारिज कर दी और माना कि समीक्षाधीन अवधि के अंतिम दो वर्षों में अपीलकर्ता की दक्षता में कमी आई थी तथा सेवानिवृत्ति का फैसला न तो मनमाना था और न ही अकारण। इस निर्णय से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
दलीलें और सेवा रिकॉर्ड की समीक्षा
अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि 2003 में इंस्पेक्टर पद पर हुई पदोन्नति से पहले के दंड और प्रतिकूल सामग्री पर सेवा में बनाए रखने का आकलन करते समय विचार नहीं किया जा सकता था।
अपीलकर्ता के सेवा रिकॉर्ड के अवलोकन से पता चला कि 1983 से 1999 के बीच उनकी एसीआर ग्रेडिंग “औसत”, “अच्छा” और “बहुत अच्छा” के बीच बदलती रही। उन्हें 1990 में बेहतर प्रदर्शन के दौरान पहली पदोन्नति मिली और 2000 से 2003 तक लगातार “बहुत अच्छा” ग्रेडिंग मिलने के बाद 2003 में दूसरी पदोन्नति मिली।
हालांकि, सेवानिवृत्ति मूल्यांकन से ठीक पहले 2004 से 2009 की अवधि के दौरान उनके प्रदर्शन में गिरावट देखी गई:
- 2004: “औसत”
- 2005: “बहुत अच्छा”
- 2006 और 2007: “अच्छा”
- 2008 की पहली तिमाही: “अच्छा”
- 2008 का शेष समय और 2009: “औसत”
अंतिम दो वर्षों में इस सुस्त प्रदर्शन के अलावा, 2003 की पदोन्नति के बाद अपीलकर्ता को छुट्टी प्राप्त करने के लिए झूठा कारण बताने पर ‘परिनिंदा’ (सेंसर) की एक छोटी शास्ती (दंड) दी गई थी। इसके अतिरिक्त, उन्हें कर्तव्यों में लापरवाही के लिए चार बार चेतावनी दी गई थी और सुस्त रवैये के लिए दो बार आगाह किया गया था।
अदालत का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का मूल उद्देश्य सार्वजनिक सेवा में दक्षता और सत्यनिष्ठा का उच्च स्तर बनाए रखने के लिए “अक्षम तत्वों” को बाहर करना है। कोर्ट ने दोहराया कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति दंडात्मक प्रकृति की नहीं होती, इससे कोई कलंक या दुर्व्यवहार का आक्षेप नहीं लगता, और यह नियोक्ता के व्यक्तिगत संतोष के आधार पर जनहित में जारी किया जाता है, जहां प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत लागू नहीं होते।
ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा के सीमित दायरे पर प्रकाश डालते हुए कोर्ट ने राम मूर्ति यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले का हवाला दिया:
“नियोक्ता के व्यक्तिगत संतोष पर आधारित अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश की न्यायिक समीक्षा का दायरा बेहद सीमित और संकुचित है। केवल तभी हस्तक्षेप की सीमित गुंजाइश हो सकती है जब यह पाया जाए कि आदेश मनमाने या पक्षपातपूर्ण आधारों पर आधारित है, दुर्भावना से ग्रसित है, या प्रासंगिक सामग्रियां नजरअंदाज की गई हैं। न्यायिक समीक्षा में अदालत अपीलीय प्राधिकरण के रूप में निर्णय नहीं ले सकती। अनिवार्य सेवानिवृत्ति के मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत लागू नहीं होते।”
पदोन्नति से पहले की प्रतिकूल प्रविष्टियों के संबंध में अपीलकर्ता के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने माना कि ‘वाश्ड-ऑफ थ्योरी’ अनिवार्य सेवानिवृत्ति की कार्यवाही में लागू नहीं होती। राजस्थान स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन व अन्य बनाम बाबू लाल जांगिड़ मामले का संदर्भ देते हुए, जिसमें प्यारे मोहन लाल बनाम झारखंड राज्य को उद्धृत किया गया था, कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“प्यारे मोहन लाल बनाम झारखंड राज्य में स्पष्ट और स्थापित कानून का सिद्धांत यह है कि किसी कर्मचारी की पदोन्नति के बाद उससे पहले की प्रतिकूल प्रविष्टियों का कोई औचित्य नहीं रह जाता और जब सरकारी कर्मचारी के मामले पर आगे की पदोन्नति के लिए विचार किया जा रहा हो तो उन्हें समाप्त माना जा सकता है। हालांकि, यह ‘वाश्ड-ऑफ थ्योरी’ तब लागू नहीं होगी जब किसी कर्मचारी के मामले का आकलन यह निर्धारित करने के लिए किया जा रहा हो कि वह सेवा में बनाए रखने के योग्य है या उसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति दिए जाने की आवश्यकता है। इसके पीछे तर्क यह है कि चूंकि ऐसा मूल्यांकन ‘पूरे सेवा रिकॉर्ड’ पर आधारित होता है, इसलिए पुरानी प्रतिकूल प्रविष्टियों या पुराने समय के रिकॉर्ड पर विचार न करने का प्रश्न ही नहीं उठता। हम यह भी स्पष्ट कर दें कि यद्यपि ऐसे रिकॉर्ड पर विचार किया जा सकता है, वहीं तत्काल बीते समय के सेवा रिकॉर्ड को भी उचित महत्व और वजन दिया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, कुछ बहुत पुरानी प्रतिकूल प्रविष्टियों के मुकाबले यदि तत्काल बीता रिकॉर्ड उत्कृष्ट प्रदर्शन दिखाता है, तो हाल के रिकॉर्ड की अनदेखी करके केवल पुरानी प्रतिकूल प्रविष्टियों के आधार पर किसी व्यक्ति को सेवानिवृत्त करना शक्ति के मनमाने इस्तेमाल का स्पष्ट उदाहरण होगा। हालांकि, यदि पुराना रिकॉर्ड किसी व्यक्ति की सत्यनिष्ठा से संबंधित है, तो वह सरकारी सेवक को समयपूर्व सेवानिवृत्त करने के आदेश को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त हो सकता है।”
अदालत ने बैकुंठ नाथ दास व अन्य बनाम चीफ डिस्ट्रिक्ट मेडिकल ऑफिसर, बारीपदा व अन्य का भी उल्लेख किया और कहा कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को केवल इसलिए अमान्य नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि बिना सूचित की गई प्रतिकूल टिप्पणियां प्राधिकारी द्वारा विचार की गई सामग्री का हिस्सा थीं।
समीक्षाधीन अंतिम वर्षों में प्रदर्शन में आई गिरावट पर चर्चा करते हुए कोर्ट ने पोस्ट्स एंड टेलीग्राफ्स बोर्ड व अन्य बनाम सी.एस.एन. मूर्ति मामले को उद्धृत किया:
“हम इससे सहमत होने में असमर्थ हैं। हमारी राय में, ऐसी सामग्री मौजूद थी जिससे पता चलता था कि समीक्षाधीन अवधि के अंतिम दो वर्षों में याचिकाकर्ता की दक्षता में गिरावट आई थी और इसलिए विभाग के निष्कर्ष को दुर्भावनापूर्ण, विकृत, मनमाना या अकारण मानना हमारे लिए संभव नहीं है। यह सच है कि प्रतिवादी का पिछला रिकॉर्ड अच्छा था, लेकिन यदि रिकॉर्ड से पता चलता है कि प्रतिवादी के काम का स्तर गिर गया था और संतोषजनक नहीं था, तो यह निश्चित रूप से ऐसी सामग्री थी जो विभाग को एफ.आर. 56(जे) के तहत निष्कर्ष पर पहुंचने में सक्षम बनाती थी।”
कोर्ट ने उल्लेख किया कि इस सिद्धांत की पुष्टि सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी Force बनाम एचसी (जीडी) ओम प्रकाश में भी की गई थी।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट को आंतरिक स्क्रीनिंग कमेटी या हाईकोर्ट के फैसले में कोई त्रुटि नहीं मिली। कोर्ट ने पाया कि कमेटी ने अपीलकर्ता के पूरे सेवा रिकॉर्ड का सही मूल्यांकन किया और तत्काल पूर्ववर्ती वर्षों में उनके गिरते प्रदर्शन को उचित महत्व दिया।
कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अपीलकर्ता सीआईएसएफ का हिस्सा थे, जो एक अनुशासित और वर्दीधारी बल है जिस पर महत्वपूर्ण सुरक्षा जिम्मेदारियां होती हैं। ऐसे बल के सदस्यों से निरंतर उच्च स्तर की दक्षता, सतर्कता और अनुशासन बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है। अपील को आधारहीन मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सुशील शर्मा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 8634/2012
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर
निर्णय की तिथि: 06 अगस्त 2026

