हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अमेरिकी नागरिक की अपनी ऑटिस्टिक नाबालिग बेटी की कस्टडी मांगने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जैविक मां के पास बच्ची की कस्टडी को पूरी तरह कानूनी माना जाएगा और किसी विदेशी अदालत के आदेश के मुकाबले बच्चे का कल्याण और उसकी अपनी इच्छा प्राथमिक होगी।
विदेशी अदालती आदेश से ऊपर बच्ची का कल्याण
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने 30 जुलाई को दिए अपने फैसले में कहा कि भारतीय अदालतें विदेशी अदालतों के आदेशों को केवल एक कारक के रूप में देखती हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि विदेशी अदालत के कस्टडी आदेश से प्रभावित हुए बिना भारतीय अदालतें नाबालिग के समग्र हितों को सर्वोपरि रखकर निर्णय ले सकती हैं।
पालमपुर फैमिली कोर्ट में बच्ची ने जताई थी इच्छा
अदालत ने ध्यान दिलाया कि पालमपुर की फैमिली कोर्ट में सुनवाई के दौरान बच्ची ने खुद अपनी मां के साथ रहने की स्पष्ट इच्छा जताई थी। यह कानूनी विवाद दिल्ली में 2008 में शादी करने वाले एक दंपत्ति से जुड़ा है, जो बाद में अमेरिका चले गए थे। वर्ष 2023 में दोनों का तलाक हो गया, जिसके बाद सितंबर 2023 में मां अपनी बेटी को लेकर हिमाचल प्रदेश के पालमपुर आ गई।
इसके बाद पिता ने अमेरिकी फैमिली कोर्ट से अवमानना का आदेश प्राप्त कर लिया, जिसमें उन्हें बच्ची की एकल कस्टडी दी गई और बच्ची को लेने के लिए भारत जाने की अनुमति दी गई। अमेरिकी अदालत ने भारतीय अदालत से ‘मिरर जजमेंट’ प्राप्त किए बिना बच्ची को ले जाने पर मां को अवमानना का दोषी ठहराया था।
दोनों पक्षों की कानूनी दलीलें
पिता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता विहान कुमार और मुकेश शर्मा ने तर्क दिया था कि मां का बिना ‘मिरर आदेश’ प्राप्त किए बच्ची को भारत लाना अवैध कस्टडी के समान है। उन्होंने कहा कि चूंकि बच्ची अमेरिकी नागरिक है, इसलिए इस विवाद पर अमेरिकी अदालत का क्षेत्राधिकार बनता है और पालमपुर फैमिली कोर्ट को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है।
दूसरी ओर, मां का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रजनीश मानिकतला और अधिवक्ता दिनकर भास्कर ने बताया कि मां ने भारत आने से पहले पिता को सूचित किया था और भारत में मिरर जजमेंट प्राप्त करने की दिशा में कदम भी उठाए थे। बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि बच्ची सितंबर 2023 से भारत में रह रही है और स्कूल जा रही है। इसके अलावा, पालमपुर कोर्ट में संरक्षकता की कार्यवाही लंबित है, इसलिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पोषणीय नहीं है।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
तमाम तथ्यों और तर्कों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि जब बात किसी नाबालिग के कल्याण की हो, तो विदेशी अदालत के आदेश भारतीय अदालतों को बाध्य नहीं करते। अदालत ने याचिका को निरस्त करते हुए पिता के आवेदन को खारिज कर दिया।

