ईएमआई पूरी होने के बावजूद जबरन ट्रक जब्त करने पर फाइनेंस कंपनी पर 17.17 लाख का जुर्माना

पश्चिम बंगाल राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड को एक महिला उपभोक्ता को 17.17 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने पाया कि लोन खाते में कोई बकाया न होने के बावजूद फाइनेंस कंपनी ने महिला के ट्रक को हाईवे पर रोककर गैरकानूनी तरीके से जब्त कर लिया था।

न्यायिक सदस्य राजेश गुहा राय और सदस्य शांतनु साहा की पीठ ने संपा बसाक नामक महिला की शिकायत पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। पीठ ने फाइनेंस कंपनी के रवैये को खराब नीयत और सेवाओं में गंभीर कमी करार दिया।

बिना नोटिस हाईवे पर जब्त किया गया वाहन

यह मामला 10 नवंबर 2018 का है, जब खाद्य सामग्री ले जा रहे संपा बसाक के व्यावसायिक ट्रक को फाइनेंस कंपनी के एजेंटों ने हाईवे पर बीच रास्ते में रोककर जब्त कर लिया था। बसाक ने 31 अगस्त 2017 के समझौते के तहत 21,46,248 रुपये का ऋण लेकर यह वाहन खरीदा था। इसकी अदायगी के लिए 28 सितंबर 2017 से 64,641 रुपये की 46 मासिक किस्तें (ईएमआई) तय की गई थीं।

शिकायतकर्ता के अनुसार, वह लगातार किस्तों का भुगतान कर रही थीं और जब्ती के समय उनका कोई बकाया नहीं था। अचानक हुई इस कार्रवाई के बाद जब पुलिस ने उनकी शिकायत दर्ज करने से मना कर दिया, तब उन्होंने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया था।

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मामले की जांच में आयोग ने पाया कि फाइनेंस कंपनी ने वाहन जब्त करने से पहले अनिवार्य 7 दिनों का पूर्व नोटिस भी जारी नहीं किया था। कंपनी ने 13 नवंबर 2018 की तिथि वाला नोटिस जारी किया था, जबकि वाहन 10 नवंबर को ही जब्त किया जा चुका था।

फाइनेंस कंपनी के तर्कों को आयोग ने किया खारिज

अपनी सफाई में चोलामंडलम फाइनेंस ने तर्क दिया कि यह सौदा एक हायर-पर्चेज समझौते के तहत हुआ था, जिसमें पूरा भुगतान होने तक मालिकाना हक फाइनेंसर के पास ही रहता है। कंपनी ने दावा किया कि महिला ने ईएमआई चुकाने में चूक की थी और चूंकि वाहन का इस्तेमाल व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए हो रहा था, इसलिए वह उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं आती हैं। इसके समर्थन में कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों का भी हवाला दिया।

हालांकि, आयोग ने इन सभी तर्कों को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि शिकायतकर्ता बड़े पैमाने पर परिवहन व्यवसाय चलाती हैं, इसलिए वह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत एक ‘उपभोक्ता’ मानी जाएंगी।

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आयोग ने स्पष्ट किया कि जब किसी विशिष्ट संपत्ति पर लोन खाता नियमित है, तब अन्य खातों में कथित बकाया का हवाला देकर वाहन जब्त नहीं किया जा सकता। पीठ ने टिप्पणी की कि जब कोई उधारकर्ता नियमित भुगतान कर रहा हो, तब चालू स्थिति में वाहन को जब्त करना दुर्भावनापूर्ण और सेवा में बड़ी लापरवाही है।

मुआवजे की रकम और भुगतान के कड़े निर्देश

आयोग ने अपने फैसले में कहा कि लगभग छह साल बाद अब इस वाहन को भौतिक रूप से लौटाना एक अर्थहीन कदम होगा, क्योंकि अब यह चलने लायक नहीं रहा और इसे ठीक कराने में भारी खर्च आएगा।

इसके एवज में आयोग ने पीड़िता को कुल 17,16,974 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। इसमें संपत्ति के नुकसान के लिए 8,76,974 रुपये, आजीविका के नुकसान व कारोबार में बाधा के लिए 5 लाख रुपये, मानसिक प्रताड़ना के लिए 3 लाख रुपये और कानूनी लड़ाई के खर्च के रूप में 40,000 रुपये शामिल हैं।

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इसके साथ ही आयोग ने संबंधित लोन खाते को पूरी तरह चुकता घोषित कर दिया और फाइनेंसर को भविष्य में कोई भी नया दावा करने से रोक दिया। आदेश के मुताबिक, फाइनेंस कंपनी को 45 दिनों के भीतर पूरी राशि का भुगतान करना होगा। तय समय पर भुगतान न करने की स्थिति में बकाया राशि पर चूक की तारीख से अंतिम भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज देना होगा।

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