अंतरराज्यीय बाल तस्करी मामले में आरोपी की ज़मानत याचिका झारखंड हाईकोर्ट से खारिज, 52 बच्चे हुए थे बरामद

झारखंड हाईकोर्ट ने बच्चों की तस्करी करने वाले एक अंतरराज्यीय गिरोह से जुड़े मामले में मुख्य आरोपी की ज़मानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने पाया कि यह गिरोह छोटे बच्चों का अपहरण कर उनसे भीख मंगवाने और चोरी कराने के धंधे में शामिल था।

जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने 3 अगस्त को दिए अपने आदेश में निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी को राहत देने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि मामले की जांच से कई राज्यों में फैले एक बड़े आपराधिक नेटवर्क की बात सामने आई है। इस गिरोह के चंगुल से छुड़ाए गए 52 बच्चों में से कई की उम्र महज दो, तीन, चार और छह साल है।

52 बच्चों की बरामदगी और अंतरराज्यीय गिरोह का खुलासा

पुलिस की यह पूरी कार्रवाई तकनीकी शाखा और एक अन्य मामले के जांच अधिकारी से मिली गुप्त सूचना के आधार पर शुरू हुई थी। पुलिस को खबर मिली थी कि आरोपी अपने तीन अन्य साथियों के साथ एक गाड़ी में बच्चों को लादकर रांची से लातेहार की ओर ले जा रहा है, ताकि उन्हें तस्करी के लिए आगे भेजा जा सके।

सिठियो में वाहन रोककर की गई थी कार्रवाई

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सूचना मिलते ही पुलिस ने सिठियो के पास घेराबंदी करके वाहन को रोक लिया। पूछताछ के दौरान आरोपी ने खुलासा किया कि कई बच्चों को रामगढ़ जिले के कोठार और लातेहार जिले के बालूमाथ में छिपाकर रखा गया है।

इस खुलासे के बाद पुलिस की दो अलग-अलग टीमें गठित की गईं और चिन्हित ठिकानों पर एक साथ छापे मारे गए। इस संयुक्त अभियान में कुल 52 बच्चों को सुरक्षित छुड़ाया गया, जिसके बाद याचिकाकर्ता और उसके अन्य साथियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई।

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बचाव पक्ष का दावा: बच्चे परिवार के ही सदस्य

सुनवाई के दौरान आरोपी के वरिष्ठ अधिवक्ता ए. के. कश्यप ने तर्क दिया कि उनका मुवक्किल 18 जनवरी 2026 से हिरासत में है। बचाव पक्ष का कहना था कि याचिकाकर्ता के पास सिल्ली और रामगढ़ में दो मकान हैं, लेकिन पुलिस को दोनों में से किसी भी स्थान से तस्करी का शिकार हुआ कोई बच्चा नहीं मिला।

वरिष्ठ वकील ने यह भी दावा किया कि उनके मुवक्किल की दो पत्नियां हैं और दोनों से उनके पांच-पांच बच्चे हैं। इसलिए जिन बच्चों को आरोपी से जोड़ा जा रहा है, वे उनके अपने जैविक बच्चे हैं, न कि अपहृत किए गए नाबालिग। इसके अलावा, आरोपी के पिता के घर से मिले बच्चे भी परिवार के ही निकट संबंधी हैं।

अदालत का रुख और पुराना आपराधिक रिकॉर्ड

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केस डायरी का बारीकी से अध्ययन करने के बाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यह गिरोह विशेष रूप से 10 साल से कम उम्र के बच्चों का अपहरण करता था और उनसे सड़कों पर भीख मंगवाने तथा चोरी कराने जैसे अपराध करवाता था।

अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि आरोपी ने स्वीकारोक्ति बयान में सिल्ली में भी बच्चों को रखे जाने की बात स्वीकार की थी, जिसके आधार पर पुलिस ने कई बच्चों को बरामद किया। याचिकाकर्ता की सक्रिय संलिप्तता, अन्य राज्यों से जुड़े तार, गंभीर आरोपों और उसके पुराने आपराधिक इतिहास को देखते हुए हाईकोर्ट ने रांची के अतिरिक्त न्यायिक आयुक्त सह विशेष न्यायाधीश (पोक्सो एक्ट) के 8 जून के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और अपील खारिज कर दी।

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