अवैध हिरासत पर आधारित रिमांड आदेश वैध नहीं; शुरुआती गिरफ्तारी गैर-कानूनी हो तो बाद की न्यायिक रिमांड भी उसे वैध नहीं बनाती: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि गैर-कानूनी या असंवैधानिक हिरासत के आधार पर दिया गया रिमांड आदेश कानून की नजर में बना नहीं रह सकता। अदालत ने माना कि बाद में दी गई न्यायिक रिमांड शुरुआती गिरफ्तारी के गैर-कानूनी स्वरूप को खत्म नहीं करती है। याचिकाकर्ता जितेश आनंद उर्फ जीतू के खिलाफ पारित हिरासत और रिमांड आदेशों को रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने 28 जून 2026 से 30 जून 2026 तक की उसकी हिरासत को संविधान के अनुच्छेद 21, 22 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) का उल्लंघन करार दिया और उसे तत्काल जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।

यह फैसला चीफ जस्टिस जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अंबिकापुर के साइबर पुलिस स्टेशन (सरगुजा रेंज) में 22 जुलाई 2025 को दर्ज अपराध संख्या 3/2025 से जुड़ा है। यह प्राथमिकी भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 318(4), 3(5) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66D के तहत दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता रवि मोहन गोस्वामी ने आरोप लगाया था कि अज्ञात लोगों ने उन्हें “मनी ट्रेड 365” और “स्काईट्रेड” नामक मोबाइल ऐप के जरिए शेयर बाजार में निवेश का झांसा देकर 84 किस्तों में कुल 21,11,500 रुपये की ठगी की।

याचिकाकर्ता के अनुसार, 28 जून 2026 की शाम छत्तीसगढ़ पुलिस ने उसे रोहतक (हरियाणा) स्थित उसके घर से बिना किसी कारण या गिरफ्तारी का आधार बताए उठा लिया। उसे रोहतक के सिटी थाना ले जाया गया और फिर रात में दिल्ली के न्यू छत्तीसगढ़ भवन में रखा गया। याचिकाकर्ता के परिवार द्वारा नियुक्त वकील 29 जून 2026 को द्वारका कोर्ट में उसकी पेशी का इंतजार करते रहे, लेकिन उसे दिल्ली की किसी अदालत में पेश नहीं किया गया।

इसके बजाय, पुलिस ने 29 जून 2026 को BNSS की धारा 35(3) के तहत एक नोटिस जारी कर उसे 5 जुलाई 2026 को पेश होने का निर्देश दिया। हालांकि, बिना ट्रांजिट रिमांड प्राप्त किए पुलिस उसे सड़क मार्ग से दिल्ली, उत्तर प्रदेश होते हुए छत्तीसगढ़ ले आई। 30 जून 2026 को सुबह 10:55 बजे अंबिकापुर के साइबर पुलिस स्टेशन में उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दिखाई गई। उसी दिन शाम 4:50 बजे उसे न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), अंबिकापुर के समक्ष पेश किया गया, जिन्होंने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया और बाद में 3 जुलाई को दो दिन की पुलिस कस्टडी मंजूर कर ली। याचिकाकर्ता ने इन रिमांड आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अमित चड्ढा ने तर्क दिया कि 28 जून 2026 की शाम से ही उनके मुवक्किल की स्वतंत्रता को अवैध रूप से छीन लिया गया था। बिना ट्रांजिट रिमांड के 48 घंटे से अधिक समय तक कई राज्यों की सीमाएं पार कराकर ले जाना BNSS की धारा 187 और संविधान के अनुच्छेद 22(2) का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि गिरफ्तारी के समय कोई लिखित कारण नहीं बताए गए थे और धारा 35(3) का नोटिस केवल अवैध हिरासत को छिपाने के लिए जारी किया गया था।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त अधिवक्ता सामान्य प्रवीन दास ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को 28 जून को गिरफ्तार नहीं किया गया था, बल्कि 1000 करोड़ रुपये से अधिक के अंतरराज्यीय साइबर फ्रॉड और मनी लॉन्ड्रिंग सिंडिकेट की जांच के सिलसिले में फील्ड-ट्रैकिंग प्रक्रिया अपनाई गई थी। राज्य ने दावा किया कि याचिकाकर्ता वित्तीय और लॉजिस्टिक तंगी के कारण अपनी मर्जी से पुलिस टीम के साथ दिल्ली से छत्तीसगढ़ आया था और उसने धारा 35(3) के नोटिस पर खुद हाथ से लिखकर अपनी सहमति दी थी। राज्य के अनुसार, अंबिकापुर पहुंचने पर पर्याप्त सबूत मिलने के बाद 30 जून को सुबह 10:55 बजे उसकी औपचारिक गिरफ्तारी की गई, इसलिए उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और नजीरें

हाईकोर्ट ने मामले का विश्लेषण करते हुए माना कि मुख्य प्रश्न यह है कि क्या याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत स्वतंत्रता 28 जून 2026 को ही छीन ली गई थी या वह 30 जून तक स्वेच्छा से पुलिस के साथ यात्रा कर रहा था।

राज्य के ‘स्वेच्छा से यात्रा’ करने के तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि किसी गंभीर अपराध की जांच कर रही पुलिस के सामने एक आम नागरिक असमान स्थिति में होता है। पुलिस नियंत्रण में रहते हुए किसी नोटिस पर लिखा गया हस्तलिखित बयान सच्ची स्वेच्छा को साबित नहीं कर सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जैसे ही किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर वास्तविक रोक लगाई जाती है, अनुच्छेद 22(2) के तहत संवैधानिक सुरक्षा लागू हो जाती है, भले ही औपचारिक गिरफ्तारी मेमो बाद में तैयार किया गया हो।

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बिना ट्रांजिट रिमांड के आरोपी को एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाने को अवैध ठहराते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“अनुच्छेद 22(2) में निहित संवैधानिक गारंटी को औपचारिक गिरफ्तारी मेमो तैयार करने में देरी करके विफल नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 22(2) में प्रयुक्त ‘गिरफ्तारी’ शब्द का संकीर्ण या तकनीकी अर्थ नहीं निकाला जा सकता। संवैधानिक संरक्षण उस क्षण से प्रभावी हो जाता है जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में काफी कटौती की जाती है और उसे पुलिस के नियंत्रण में रखा जाता है।”

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूर्व में दिए गए प्रमुख फैसलों पर भी विचार किया:

  1. विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य: सुप्रीम कोर्ट के प्रबीर पुरकायस्थ बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के आधार बताना अनिवार्य है: “गिरफ्तारी के कारणों के बारे में सूचित किए जाने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) से निकलता है और इस मौलिक अधिकार का कोई भी उल्लंघन गिरफ्तारी और रिमांड की प्रक्रिया को दूषित कर देगा। केवल यह तथ्य कि मामले में आरोप पत्र दाखिल कर दिया गया है, आरोपी को गिरफ्तार करने और उसे शुरुआती पुलिस हिरासत रिमांड देने के समय की गई अवैधता और असंवैधानिकता को वैध नहीं ठहराएगा।”
  2. मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य: कोर्ट ने माना कि जब कोई आरोपी धारा 35(3) BNSS (पुराना धारा 41A CrPC) के नोटिस के बाद पुलिस की निगरानी में हो, तो गिरफ्तारी के समय लिखित में कारण देना अनिवार्य है: “उपरोक्त का पालन न करने की स्थिति में, गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड अवैध हो जाएगी और व्यक्ति आजाद होने का हकदार होगा।”
  3. मनुभाई रतिलाल पटेल बनाम गुजरात राज्य व अन्य: रिमांड को एक न्यायिक कार्य बताते हुए कोर्ट ने कहा: “किसी आरोपी की रिमांड का आदेश देना मूलभूत रूप से एक न्यायिक कार्य है। किसी आरोपी को हिरासत में भेजने का आदेश देते समय मजिस्ट्रेट कार्यकारी क्षमता में कार्य नहीं करता है। इस न्यायिक कार्य को करते समय, मजिस्ट्रेट के लिए यह संतुष्ट होना अनिवार्य है कि उसके समक्ष रखी गई सामग्री ऐसी रिमांड का औचित्य साबित करती है या नहीं।”

शुरुआती अवैध गिरफ्तारी के बाद दिए गए रिमांड आदेशों पर हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की:

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“न्यायिक रिमांड गैर-कानूनी गिरफ्तारी को ठीक नहीं कर सकती और न ही किसी असंवैधानिक हिरासत को वैध ठहरा सकती है। एक बार जब शुरुआती हिरासत को अवैध पाया जाता है, तो उस पर आधारित हर अगला आदेश कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं रहता।”

साइबर अपराध के गंभीर आरोपों के आधार पर प्रक्रियात्मक नियमों की अनदेखी करने की दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:

“आरोपों की गंभीरता पूरी जांच का औचित्य साबित कर सकती है, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनाए गए अनिवार्य प्रावधानों से हटने का औचित्य नहीं दे सकती। संवैधानिक अधिकार आरोपों की प्रकृति पर निर्भर नहीं होते हैं।”

हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, अंबिकापुर द्वारा पारित 30 जून 2026 और 3 जुलाई 2026 के रिमांड आदेशों को रद्द कर दिया।

अदालत ने घोषित किया कि याचिकाकर्ता की 28 जून से 30 जून 2026 तक की हिरासत पूरी तरह से गैर-कानूनी थी और संविधान के अनुच्छेद 21 व 22 तथा BNSS का उल्लंघन थी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को 5,00,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की दो स्थानीय व पारिवारिक जमानतों पर रिहा किया जाए। साथ ही, याचिकाकर्ता को अपना पासपोर्ट जमा करने और जांच में सहयोग करने के निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट ने साफ किया कि ये टिप्पणियां केवल गिरफ्तारी और हिरासत की वैधता तक सीमित हैं और इसका असर प्राथमिकी के मुख्य आरोपों के गुण-दोष पर नहीं पड़ेगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: जितेश आनंद उर्फ जीतू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपीसीआर संख्या 388/2026
पीठ: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल
निर्णय की तिथि: 03 अगस्त 2026

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