सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि भारत में राउंड-ट्रिप क्रूज़ जहाजों का संचालन करना और यात्रियों को जहाज पर आतिथ्य सेवाएं (hospitality) देना, आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 44B के तहत ‘यात्रियों के परिवहन’ (carriage of passengers) के दायरे में आता है। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने डायरेक्टर ऑफ इनकम टैक्स (इंटरनेशनल टैक्ससेशन) द्वारा दायर सिविल अपीलों को खारिज करते हुए माना कि भारत में क्रूज़ संचालित करने वाली विदेशी शिपिंग कंपनियां धारा 195 के तहत टैक्स कटौती के लिए धारा 44B के अंतर्गत 7.5% की रियायती अनुमानित दर से टैक्स आकलन की हकदार हैं। कोर्ट ने टैक्स विभाग (राजस्व) द्वारा 25% की दर से टैक्स लगाने के फैसले को खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
मेसर्स स्टार क्रूज़ेस (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड (करदाता) विदेशी संस्था मेसर्स सुपरस्टार लिब्रा लिमिटेड (एसएलएल) के एजेंट के रूप में काम कर रही थी। एसएलएल भारत में “सुपरस्टार लिब्रा” नाम से क्रूज़ जहाज का संचालन करती थी। एजेंट के तौर पर करदाता ने आकलन वर्ष 2006-07, 2007-08 और 2008-09 के लिए भारत में क्रूज़ पैकेज और तटीय पर्यटन (shore excursions) की बिक्री से राजस्व एकत्र किया था।
धारा 195 के तहत टैक्स कटौती (टीडीएस) प्रमाण पत्र की मांग करते समय, करदाता ने दावा किया कि एसएलएल की आय की गणना धारा 44B के तहत की जानी चाहिए। यह धारा जहाजों का संचालन करने वाले अनिवासियों (non-residents) के लिए एक अनुमानित कर तंत्र प्रदान करती है। इस प्रावधान के तहत, एकत्रित क्रूज़ किराए का 7.5% हिस्सा ही अनुमानित आय माना जाता है।
हालांकि, असेसिंग ऑफिसर ने 30 मार्च 2007 के अपने आदेश में इस दावे को खारिज कर दिया। असेसिंग ऑफिसर का मानना था कि ‘कैरिज’ (परिवहन) शब्द का दायरा केवल यात्रियों या सामान को एक बंदरगाह से दूसरे बंदरगाह तक ले जाने तक ही सीमित है। चूंकि एसएलएल द्वारा संचालित क्रूज़ मुंबई पोर्ट से शुरू होकर वापस मुंबई पोर्ट पर ही समाप्त होता था और इस दौरान यात्रियों को मनोरंजन व आतिथ्य सेवाएं दी जाती थीं, इसलिए असेसिंग ऑफिसर ने इसे परिवहन के बजाय आतिथ्य और मनोरंजन की श्रेणी में रखा। नतीजतन, असेसिंग ऑफिसर ने एसएलएल की अनुमानित आय को 7.5% के बजाय 25% तय कर दिया।
अपीलीय कार्यवाही का इतिहास
करदाता ने असेसिंग ऑफिसर के इस आदेश को कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स (अपील) [सीआईटी(ए)], मुंबई के समक्ष चुनौती दी। 15 जून 2007 को सीआईटी(ए) ने करदाता की अपील स्वीकार करते हुए आकलन आदेश को रद्द कर दिया और माना कि धारा 44B के तहत अनुमानित आय 7.5% ही होनी चाहिए।
इसके बाद टैक्स विभाग ने इस फैसले को इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (आईटीएटी) में चुनौती दी। 1 जुलाई 2009 को आईटीएटी ने टैक्स विभाग की अपील को खारिज करते हुए कुछ महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज किए:
- एक राउंड-ट्रिप यात्रा को परिवहन के दो अलग-अलग कृत्यों (स्टेशन ‘ए’ से स्टेशन ‘बी’ और पुनः स्टेशन ‘ए’ तक) के रूप में माना जाता है, और राउंड-ट्रिप बुक करने वाले यात्रियों को बीच के बंदरगाहों पर उतरने की अनुमति थी।
- बुकिंग पर्चियों से यह सिद्ध हुआ कि यात्रियों से मुख्य रूप से केबिन और परिवहन किराए का शुल्क लिया गया था, जबकि जहाज पर दिया जाने वाला मनोरंजन केवल मुख्य व्यवसाय के साथ जुड़ा एक आनुषंगिक (incidental) हिस्सा था।
- केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के परिपत्र (सर्कुलर) संख्या 763 (दिनांक 18 फरवरी 1996) और संख्या 169 (दिनांक 23 जून 1975) यह स्पष्ट करते हैं कि परिवहन भुगतानों में हैंडलिंग प्रभार शामिल हैं और धारा 44B को विदेशी शिपिंग उद्यमों के लिए कर योग्य लाभ की गणना को सरल बनाने के उद्देश्य से बनाया गया था।
इसके बाद टैक्स विभाग ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हाईकोर्ट ने भी 1 जुलाई 2011 को टैक्स विभाग की अपीलों को खारिज कर दिया। इसके बाद विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में सिविल अपीलें दायर कीं।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष टैक्स विभाग ने तर्क दिया कि सुविधाओं से युक्त राउंड-ट्रिप यात्रा को धारा 44B के तहत केवल यात्रियों का साधारण परिवहन नहीं माना जा सकता। विभाग का कहना था कि एसएलएल की गतिविधियों का मुख्य उद्देश्य पर्यटकों के लिए भ्रमण पैकेज और मनोरंजन प्रदान करना था, न कि उन्हें केवल एक बंदरगाह से दूसरे बंदरगाह तक पहुंचाना। इसलिए अनुमानित आय का निर्धारण 25% की दर से ही होना चाहिए।
दूसरी ओर, करदाता की ओर से तर्क दिया गया कि एसएलएल धारा 44B के तहत शिपिंग ऑपरेटर के रूप में दोनों वैधानिक शर्तों को पूरा करता है। करदाता ने कहा कि असेसिंग ऑफिसर ने ‘परिवहन’ की बहुत ही संकीर्ण व्याख्या की थी, जिसमें पोर्ट ‘ए’ से पोर्ट ‘बी’ तक सीधी आवाजाही की शर्त रखी गई थी। करदाता ने स्पष्ट किया कि जहाज पर दी जाने वाली सहायक आतिथ्य सेवाओं से मूल परिवहन व्यवसाय का स्वरूप नहीं बदलता।
कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
निर्णय सुनाते हुए जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी ने असेसिंग ऑफिसर द्वारा एसएलएल की गतिविधियों पर लगाए गए संकीर्ण अर्थ पर असहमति व्यक्त की। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“हम असेसिंग ऑफिसर द्वारा ‘कैरिज’ (परिवहन) शब्द का जो अर्थ लगाया गया है, उससे सहमत होना कठिन पाते हैं।”
कोर्ट ने सीआईटी(ए) और ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों की पुष्टि की और इस बात पर बल दिया कि यात्रा के दौरान सहायक सेवाएं देने से मूल परिवहन कार्य की प्रकृति कम नहीं होती। पीठ ने कहा:
“किसी यात्रा के दौरान आनुषंगिक सेवाएं (ancillary services) प्रदान करने से अधिनियम की धारा 44B के तहत ‘कैरिज’ (परिवहन) का अर्थ समाप्त नहीं हो जाता।”
निचली अपीलीय अथॉरिटीज के फैसलों को सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि संबंधित आकलन वर्षों के लिए एसएलएल की अनुमानित आय पर धारा 44B ही लागू होती है।
तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने टैक्स विभाग की सभी सिविल अपीलों के साथ-साथ एसएलएल से जुड़ी एक अन्य संबंधित याचिका को भी खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: द डायरेक्टर ऑफ इनकम टैक्स (इंटरनेशनल टैक्ससेशन) बनाम मेसर्स स्टार क्रूज़ेस (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 3334-3336 / 2012
पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
निर्णय की तिथि: 30 जुलाई 2026

