सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा और सार्वजनिक स्थानों तक उनकी आसान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार तथा 11 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को चार सप्ताह का कड़ा अल्टीमेटम दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि कानून के तहत तय निगरानी पदों को भरने में किसी भी तरह की ढिलाई को बेहद गंभीरता से लिया जाएगा। इसके साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह दिव्यांगों के लिए अनिवार्य सुगम्यता नियम (एक्सेसिबिलिटी रूल्स) लागू करने से पहले तकनीकी विशेषज्ञों और याचिकाकर्ताओं के सभी सुझावों पर गहराई से विचार करे, ताकि अंतिम नियमों में कोई कानूनी या व्यावहारिक खामी न रहे।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने दिव्यांग अधिकार कार्यकर्ता राजीव रतूड़ी द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश जारी किए।
चार हफ्ते के भीतर मुख्य व राज्य आयुक्तों की नियुक्ति का आदेश
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (आरपीडब्ल्यूडी एक्ट) के प्रावधानों पर अमल न होने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए अदालत ने 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को धारा 79 के तहत तुरंत राज्य आयुक्त नियुक्त करने का हुक्म दिया। जिन क्षेत्रों में इन नियुक्तियों में देरी पाई गई, उनमें दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं। पीठ ने जोर देकर कहा कि राज्य प्रशासन इन संवैधानिक अधिकारियों के गठन में कोई ढिलाई न दिखाए।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार में स्थायी मुख्य दिव्यांग आयुक्त का पद खाली रहने पर भी कड़ा रुख अपनाया। पीठ ने केंद्र को चार सप्ताह के भीतर एक पूर्णकालिक मुख्य आयुक्त और उनकी सहायता के लिए कानून के अनुसार दो अन्य आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया। केंद्र और सभी संबंधित राज्यों को निर्धारित समय सीमा में अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया गया है।
त्रिमुक्तिहीन और प्रभावी सुगम्यता मानकों पर जोर
भौतिक और डिजिटल बुनियादी ढांचे में सुधार के मुद्दे पर पीठ ने केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहीं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी को निर्देश दिया कि वे विशेषज्ञों और वादियों द्वारा प्रस्तुत सभी सुझावों का व्यापक अध्ययन करें। अदालत ने टिप्पणी की कि सरकारी राजपत्र में अंतिम नियम अधिसूचित करने से पहले इन सुझावों की समीक्षा करना तकनीकी खामियों को खत्म करने और कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए जरूरी है।
आरपीडब्ल्यूडी एक्ट की धारा 40 के तहत केंद्र सरकार को शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में अनिवार्य सुगम्यता मानक तैयार करने होते हैं। इन मानकों के दायरे में सार्वजनिक इमारतें, परिवहन प्रणालियां, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी और अन्य आवश्यक नागरिक सुविधाएं आती हैं।
मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी संदर्भ
यह अदालती कार्रवाई 15 दिसंबर 2017 के ऐतिहासिक फैसले के बाद हुई धीमी प्रगति से जुड़ी है। इससे पहले 8 नवंबर 2024 को दिए गए एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर अनिवार्य सुगम्यता मानक लागू करने का निर्देश दिया था। तब अदालत ने इस बात की आलोचना की थी कि पुराने नियम केवल स्व-विनियमन और स्वैच्छिक दिशा-निर्देशों पर आधारित थे, जिनमें कानूनी अनिवार्यता का अभाव था।
अदालत ने दोहराया कि दिव्यांगों के लिए वास्तविक पहुंच सुनिश्चित करने हेतु दोहरे दृष्टिकोण की जरूरत है: मौजूदा सार्वजनिक इमारतों में बदलाव (रेट्रोफिटिंग) करना और सभी नए निर्माण कार्यों में समावेशी डिजाइन को शुरू से ही अनिवार्य बनाना। इन नियमों का कड़ाई से पालन कराने के लिए भवन निर्माण पूर्णता प्रमाण पत्र रोकने और उल्लंघनकर्ताओं पर जुर्माना लगाने जैसे दंडात्मक उपायों का प्रावधान शामिल है।
नियमों का मसौदा तैयार करने में सरकार की सहायता के लिए हैदराबाद स्थित नालसार (NALSAR) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के ‘सेंटर फॉर दिव्यांग स्टडीज’ को जिम्मेदारी सौंपी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई जनवरी में तय की है, जहां केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा पेश की जाने वाली अनुपालन रिपोर्ट की समीक्षा की जाएगी।

