इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्पष्टीकरण: रिट याचिका दायर करने के लिए अदालत में व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रिट याचिकाएं दाखिल करने के लिए याचिकाकर्ताओं और वकीलों का फोटो सत्यापन हेतु व्यक्तिगत रूप से अदालत परिसर आना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि देश में कहीं से भी नोटरी द्वारा सत्यापित (नोटराइज्ड) हलफनामे याचिका दाखिल करने के लिए कानूनी रूप से पूरी तरह मान्य हैं।

याचिका खारिज, फोटो सत्यापन की अनिवार्यता नहीं

जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की लखनऊ पीठ ने मंगलवार को यह निर्णय सुनाया। हाईकोर्ट में लागू ‘फोटो एफिडेविट आइडेंटिफिकेशन’ प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट का स्टाम्प रिपोर्टिंग सेक्शन सभी वैध हलफनामों को स्वीकार करता है, चाहे वे आंतरिक फोटो पहचान प्रक्रिया से तैयार किए गए हों या किसी सार्वजनिक नोटरी द्वारा सत्यापित कराए गए हों।

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अनुच्छेद 14 के उल्लंघन का दावा

यह फैसला बिस्वजीत चौधरी द्वारा दायर एक याचिका पर आया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि मौजूदा नियम आम नागरिकों और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच अनुचित अंतर पैदा करते हैं। याचिकाकर्ता का तर्क था कि आम मुकदमैबाजों को फोटो सत्यापन के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ता है, जबकि केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों को इससे छूट दी गई है। उन्होंने इसे मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन बताया था।

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ई-फाइलिंग सुविधा निरंतर जारी

याचिकाकर्ता के तर्कों को अस्वीकार करते हुए पीठ ने रेखांकित किया कि कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू की गई डिजिटल ई-फाइलिंग प्रणाली अब भी पूरी तरह से क्रियाशील है। इस व्यवस्था के माध्यम से देश भर के याचिकाकर्ता अपने स्थानीय अधिकार क्षेत्र में नोटरीकृत हलफनामों के साथ रिट याचिकाएं और संबंधित आवेदन ऑनलाइन जमा कर सकते हैं।

सूचना के अधिकार से मिली स्पष्टता

पीठ ने हाईकोर्ट द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत दिए गए एक आधिकारिक जवाब का भी हवाला दिया, जिसमें पुष्टि की गई थी कि फाइलिंग के शुरुआती चरण में विधिवत नोटरीकृत हलफनामे स्वीकार किए जाते हैं। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि याचिका दाखिल करने के लिए फोटो पहचान कभी भी अनिवार्य शर्त नहीं थी, इसलिए यह कानूनी चुनौती पूरी तरह अनावश्यक थी।

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