बिना डॉक्टरी जांच रिपोर्ट के डॉक्टरों पर आपराधिक मुकदमा नहीं: पटना हाईकोर्ट ने 14 साल पुराना मामला किया रद्द

पटना हाईकोर्ट ने एक ऑर्थोपेडिक सर्जन के खिलाफ चल रहे 14 साल पुराने आपराधिक मामले को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी सक्षम मेडिकल एक्सपर्ट की राय और गंभीर लापरवाही के ठोस सबूतों के बिना डॉक्टरों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती।

21 जुलाई को सुनाए गए इस फैसले में जस्टिस चंद्र शेखर झा ने पटना के एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के 12 दिसंबर 2017 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें डॉक्टर की डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि प्रारंभिक स्तर पर विशेषज्ञ डॉक्टरी साक्ष्य के बिना आपराधिक मुकदमा जारी रखना अन्याय होगा और इससे स्वास्थ्य सेवाओं में डॉक्टरों के स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होगी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक निर्णयों को रेखांकित किया, जिनमें जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य, कुसुम शर्मा बनाम बत्रा अस्पताल, हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल और राजीव थापर बनाम मदन लाल कपूर शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में लापरवाही का पैमाना नागरिक दायित्व (सिविल लायबिलिटी) की तुलना में काफी अधिक सख्त होता है। आपराधिक लापरवाही तभी मानी जा सकती है जब डॉक्टर का आचरण अत्यधिक गैर-जिम्मेदाराना और मरीज की सुरक्षा के प्रति पूरी तरह उपेक्षापूर्ण हो।

संविधान का अनुच्छेद 21 देता है सुरक्षा

READ ALSO  जीवन की कीमत पर समृद्ध नही हो सकते अस्पताल: सुप्रीम कोर्ट

हाईकोर्ट के अनुसार, संविधान का अनुच्छेद 21 केवल मरीज के जीवन के अधिकार की रक्षा ही नहीं करता, बल्कि डॉक्टरों को भी सम्मान, निष्पक्षता और मनमाने मुकदमों से सुरक्षा के साथ अपना पेशा अपनाने का अधिकार प्रदान करता है। अदालत ने कहा कि किसी निजी शिकायत के आधार पर कार्यवाही आगे बढ़ाने से पहले किसी अन्य सक्षम चिकित्सक की लिखित राय होना आवश्यक है।

इलाज और कानूनी प्रक्रिया का घटनाक्रम

यह मामला 6 सितंबर 2012 को शुरू हुआ था, जब सतीश यादव नामक व्यक्ति ने अपने पिता बिंदेश्वर यादव की मृत्यु के बाद पटना के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दर्ज कराई थी। 5 अगस्त 2012 को हाथ में फ्रैक्चर होने के बाद बिंदेश्वर यादव को समस्तीपुर के एक डॉक्टर की सलाह पर पटना स्थित आरोपी सर्जन के निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि इलाज का खर्च 10,000 रुपये तय होने के बावजूद डॉक्टर ने 18,000 रुपये वसूले। साथ ही, ऑपरेशन के दौरान अत्यधिक एनेस्थीसिया और जहरीला इंजेक्शन देने का आरोप लगाया गया, जिससे मरीज बेहोश हो गया।

READ ALSO  महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित होगा SCBA सचिव पद: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव के लिए 20 मई तय की तारीख

दूसरी ओर, पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (PMCH) के पूर्व लेक्चरर रहे आरोपी सर्जन ने सभी आरोपों का खंडन किया। बचाव पक्ष के अनुसार, मरीज को 7 अगस्त 2012 को भर्ती किया गया था और जरूरी जांचों के बाद ही सर्जरी प्रक्रिया शुरू की गई थी। हालांकि, मरीज की स्थिति बिगड़ने पर ऑपरेशन रोक दिया गया और परिजनों के अनुरोध पर 8 अगस्त को डिस्चार्ज कर दिया गया। इसके बाद मरीज को दूसरे निजी अस्पताल और फिर PMCH ले जाया गया, जहां 10 अगस्त 2012 को उसकी मृत्यु हो गई।

प्रारंभिक जांच के बाद निचली अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 304A (लापरवाही से मौत) और 504 (अपमान) के तहत संज्ञान लिया था। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने लापरवाही साबित करने के लिए कोई विशेषज्ञ डॉक्टरी रिपोर्ट पेश नहीं की है, इसलिए इस आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना कानून का दुरुपयोग है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles