आंध्र प्रदेश के एक जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने स्टेशन प्लेटफॉर्म पर मम्मत कार्य के दौरान सुरक्षा मानकों की अनदेखी करने के मामले में ईस्ट कोस्ट रेलवे को सख्त निर्देश दिया है। आयोग ने 21 वर्षीय बीटेक पास युवती को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश सुनाया है। पीड़िता प्लेटफॉर्म पर ट्रेन का इंतजार कर रही थी, तभी लावारिस छोड़ी गई एक इलेक्ट्रिक ड्रिलिंग मशीन की चपेट में आने से उसका पैर गंभीर रूप से जख्मी हो गया था।
आयोग के अध्यक्ष आर. चिरंजीवी और सदस्य सी. षणमुख राव तथा जी. राधा रानी की तीन सदस्यीय पीठ ने रेलवे प्रशासन को सेवा में कमी (डेफिशिएंसी इन सर्विस) का दोषी ठहराया। पीठ ने स्पष्ट किया कि यात्रियों को सुरक्षित प्लेटफॉर्म और सुरक्षित यात्रा वातावरण मुहैया कराना रेलवे का प्राथमिक दायित्व है। इस जिम्मेदारी से तीसरे पक्ष के ठेकेदारों का हवाला देकर बचा नहीं जा सकता।
बिजली आते ही अचानक चालू हो गई थी ड्रिलिंग मशीन
यह हादसा आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम रोड रेलवे स्टेशन पर उस समय हुआ, जब पीड़िता अपने माता-पिता और बहन के साथ श्रीशैलम तीर्थयात्रा पर जाने के लिए अमरावती एक्सप्रेस पकड़ने का इंतजार कर रही थी। शिकायत के अनुसार, प्लेटफॉर्म पर मरम्मत कार्य में लगे कर्मचारियों ने बिजली कटने के बाद ड्रिलिंग मशीन को बिना किसी की देखरेख के वहीं छोड़ दिया। जैसे ही बिजली बहाल हुई, मशीन अपने आप चालू हो गई और सीधे युवती के बाएं पैर से टकरा गई, जिससे उसकी हड्डी टूट गई।
हादसे के बाद पीड़िता के पैर में सर्जरी के जरिए टाइटेनियम की कीलें और लॉकिंग स्क्रू लगाए गए। पीड़िता ने बताया कि इन इंप्लांट्स को निकालने के लिए उसे एक और सर्जरी से गुजरना होगा। इस गंभीर चोट के कारण उसकी गतिशीलता प्रभावित हुई है और उसके करियर तथा निजी जीवन पर भी इसका बुरा असर पड़ा है।
ठेकेदार का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश खारिज
मामले की सुनवाई के दौरान ईस्ट कोस्ट रेलवे ने अपने अनुबंध की सामान्य शर्तों (जनरल कंडीशंस ऑफ कॉन्ट्रैक्ट) का हवाला देते हुए खुद को जिम्मेदार मानने से इनकार कर दिया। रेलवे का तर्क था कि काम के दौरान सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने का दायित्व पूरी तरह से स्वतंत्र ठेकेदार का था। इसके अलावा रेलवे ने यह भी दावा किया कि पीड़िता को ठेकेदार के प्रतिनिधियों से पहले ही 2.6 लाख रुपये का मुआवजा मिल चुका था, जिसे उसने शिकायत दर्ज कराते समय छिपाया।
हालांकि, उपभोक्ता आयोग ने रेलवे के इन तर्कों को खारिज कर दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि वैध ट्रेन टिकट खरीदने के साथ ही यात्री और रेलवे के बीच एक संविदात्मक सेवा संबंध स्थापित हो जाता है। ऐसे में यात्री को सुरक्षित माहौल देना रेलवे की बाध्यता है। आयोग ने पाया कि रेलवे यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि काम वाली जगह पर कोई बैरिकेड्स, चेतावनी बोर्ड या सुरक्षा घेरा लगाया गया था।
आयोग ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि प्लेटफॉर्म सुरक्षा बनाए रखना एक ऐसा दायित्व है जिसे किसी अन्य एजेंसी को नहीं सौंपा जा सकता (नॉन-डेलीगेबल ड्यूटी)। रेलवे केवल किसी स्वतंत्र ठेकेदार को काम सौंपकर यात्रियों की सुरक्षा के प्रति अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकता।
भविष्य और व्यक्तिगत जीवन पर असर को ध्यान में रखकर तय हुआ मुआवजा
मुआवजे की राशि तय करते हुए आयोग ने एक युवा महिला के जीवन पर स्थायी शारीरिक अक्षमता के दीर्घकालिक प्रभावों पर चिंता जताई। पीठ ने कहा कि किसी अविवाहित युवती को पहुंची शारीरिक क्षति का उसके सामाजिक, व्यक्तिगत और वैवाहिक जीवन पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हालांकि इन बातों का गणितीय सटीकता से आकलन नहीं किया जा सकता, लेकिन न्यायसंगत मुआवजा तय करते समय पीड़िता के दर्द, पीड़ा और भविष्य के अवसरों के नुकसान को ध्यान में रखना आवश्यक है।
इन सभी पहलुओं पर विचार करते हुए आयोग ने ईस्ट कोस्ट रेलवे को मानसिक उत्पीड़न, आय के नुकसान, शारीरिक अक्षमता और सेवा में कमी के एवज में पीड़िता को 10 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया। आयोग के फैसले ने यह साफ कर दिया है कि सार्वजनिक प्राधिकरणों को अपने परिसरों में हादसों को रोकने के लिए ठोस और सक्रिय सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने होंगे।

