मकान मालिक की वास्तविक आवश्यकता के सहवर्ती निष्कर्षों को उलटने के लिए हाईकोर्ट रिवीज़नल ज्यूरिसडिक्शन में साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नागरिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसी), 1908 की धारा 115 के तहत अपने पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार (रिवीज़नल ज्यूरिसडिक्शन) का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट निचली अदालतों द्वारा दर्ज किए गए तथ्यों के सहवर्ती निष्कर्षों (कनकरेंट फाइंडिंग्स) को उलटने के लिए साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकते। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए किरायेदार के खिलाफ पारित बेदखली के आदेश को बहाल कर दिया और विवादित परिसर का खाली व शांतिपूर्ण कब्जा दो महीने के भीतर सौंपने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब मकान मालिक कमला देवी ने ईस्ट पंजाब अर्बन रेंट रिस्ट्रिक्शन एक्ट, 1949 की धारा 13 के तहत किरायेदार ठाकर दास के खिलाफ दुकान खाली कराने के लिए याचिका दायर की। बेदखली के लिए दो मुख्य आधार दिए गए थे: किराए का भुगतान न करना और कमला देवी तथा उनके बेटे मदन मोहन की ‘वास्तविक आवश्यकता’ (बोना फाइड रिक्वायरमेंट)। लंबी मुकदमेबाजी के दौरान मूल मकान मालिक कमला देवी, उनके बेटे मदन मोहन और किरायेदार तीनों का निधन हो गया, जिसके बाद उनके कानूनी प्रतिनिधियों ने मामले को आगे बढ़ाया।

किराया 112.50 रुपये प्रति माह तय था। मुकदमे के दौरान किरायेदार ने 17 जुलाई 1998 से 9 जून 2003 तक का बकाया किराया, ब्याज और लागत मिलाकर कुल 8,740 रुपये जमा कर दिए, जिसे स्वीकार कर लिया गया। हालांकि, किरायेदार ने वास्तविक आवश्यकता के आधार को यह कहते हुए चुनौती दी कि 80 वर्ष की वृद्धा द्वारा व्यवसाय शुरू करने की बात काल्पनिक है। उसने यह भी तर्क दिया कि एक अन्य दुकान उनके दूसरे बेटे आदर्श मोहन द्वारा किराए पर दी जा रही थी और एक तीसरी निर्मित दुकान भी खाली पड़ी थी।

नाभा के रेंट कंट्रोलर ने 27 मई 2010 को मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए तीन महीने के भीतर कब्जा सौंपने का निर्देश दिया। इस फैसले को 6 जनवरी 2011 को पटियाला के अपीलीय प्राधिकरण ने बरकरार रखा और माना कि यद्यपि कमला देवी का निधन हो गया है, लेकिन उनके बेटे मदन मोहन से जुड़ी व्यक्तिगत आवश्यकता अभी भी जीवित है।

हालांकि, पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक रिवीजन पिटीशन पर सुनवाई करते हुए इन दोनों निचली अदालतों के सहवर्ती निष्कर्षों को पलट दिया। हाईकोर्ट का मानना था कि मकान मालिक ने तीसरी दुकान की उपलब्धता छिपाई थी और अदालत के समक्ष साफ हाथों से नहीं आई थी, क्योंकि उन्होंने अपने बयान में कहा था कि तीसरी दुकान में कचरा रखा जाता था।

READ ALSO  Supreme Court Denies Anticipatory Bail To Kerala Professor Accused Of Abetting Student Suicide

पक्षों के तर्क और कानूनी रूपरेखा

सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता-मकान मालिक की ओर से एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड श्री अनुराग ने पक्ष रखा, जबकि प्रतिवादी-किरायेदार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मनोज स्वरूप न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) के रूप में पेश हुए।

सुप्रीम कोर्ट ने रेंट कंट्रोल कानूनों और ‘बोना फाइड रिक्वायरमेंट’ (वास्तविक आवश्यकता) की अवधारणा की समीक्षा की। राम कृष्ण ग्रोवर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में तीन जजों की पीठ के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने नोट किया कि रेंट कंट्रोल कानून किरायेदारों के शोषण को रोकने और मकान मालिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए बनाए गए सामाजिक कानून हैं।

वास्तविक आवश्यकता के मानक को स्पष्ट करते हुए शीर्ष अदालत ने शिव सरूप गुप्ता बनाम महेश चंद गुप्ता मामले का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था:

” ‘आवश्यकता’ शब्द द्वारा दर्शाई गई तीव्रता की डिग्री मात्र इच्छा से कहीं अधिक है। ‘वास्तविक आवश्यकता’ वाक्यांश विधायिका के इस इरादे को दर्शाता है कि किसी सनक या पसंद के परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुई महज इच्छा को रेंट कंट्रोल कानून में ध्यान में नहीं रखा जाता है। ऐसी आवश्यकता जो एक सच्ची और ईमानदार इच्छा का परिणाम है – न कि किरायेदार को बेदखल करने का महज एक बहाना – मकान मालिक को अपने या अपने परिवार के किसी सदस्य के लिए परिसर पर कब्जे का दावा करने का अधिकार देती है।”

अदालत ने बलदेव सिंह बाजवा बनाम मोनिश सैनी (जिसमें राम दास बनाम ईश्वर चंदर का हवाला दिया गया था) का भी उल्लेख किया और जोर दिया कि मकान मालिक की इच्छा में एक वस्तुनिष्ठ आवश्यकता का तत्व होना चाहिए, जिसका मूल्यांकन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट के तर्क का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों निचली अदालतों ने तथ्यों के आधार पर यह पाया था कि तीसरी दुकान का इस्तेमाल कबाड़ या कचरा रखने के लिए किया जा रहा था। इस आधार पर हाईकोर्ट के हस्तक्षेप पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

READ ALSO  Supreme Court: Benchmark Disability Alone Does Not Disqualify a Candidate from MBBS Eligibility

“एक पुरानी कहावत है, ‘एक व्यक्ति का कचरा दूसरे व्यक्ति का खजाना हो सकता है’। इसलिए, भले ही इस बयान को जैसा है वैसा ही स्वीकार कर लिया जाए, फिर भी हमें समझ नहीं आता कि इसमें क्या गलत है। इसे इसी तरह इस्तेमाल करने दिया जाए। आखिरकार, शुरुआत से ही कमला देवी और मदन मोहन दोनों ने ‘वास्तविक आवश्यकता’ का दावा किया था। रेंट कंट्रोलर और अपीलीय प्राधिकरण दोनों ने सर्वसम्मति से इसे माना था। जिस दुकान को अब तक किराए पर दिया गया था, उसका उपयोग अब बुटीक चलाने के लिए किया जाएगा।”

शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया कि नागरिक प्रक्रिया संहिता की धारा 115 के तहत रिवीज़नल ज्यूरिसडिक्शन का दायरा बेहद सीमित है। अदालत ने मस्जिद काचा टैंक, नहान बनाम तुफैल मोहम्मद मामले पर भरोसा जताया, जिसमें कहा गया था:

“कानून में यह स्थापित स्थिति है कि नागरिक प्रक्रिया संहिता की धारा 115 के तहत हाईकोर्ट साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता और साक्ष्यों का एक अलग दृष्टिकोण अपनाकर निचली अदालतों के सहवर्ती निष्कर्षों को रद्द नहीं कर सकता। हाईकोर्ट को तथ्यों के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का अधिकार केवल तभी है जब निष्कर्ष विकृत हों या निचली अदालतों द्वारा रिकॉर्ड पर मौजूद भौतिक साक्ष्यों पर विचार न किया गया हो।”

पीठ ने हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम दिलबहार सिंह मामले में संविधान पीठ के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें यह तय किया गया था कि पुनरीक्षण शक्ति प्रथम अपील की अदालत की तरह सभी तथ्यों पर पुनर्विचार करने की शक्ति के समान नहीं हो सकती। इसके अलावा, अंबादास खांडूजी शिंदे बनाम अशोक सदाशिव मामुरकर मामले का संदर्भ देते हुए पुनरावृत्ति की गई कि रिवीज़नल ज्यूरिसडिक्शन का उपयोग तब तक तथ्यों की गलतियों को सुधारने के लिए नहीं किया जा सकता जब तक कि वे क्षेत्राधिकार के मूल से संबंधित न हों।

READ ALSO  आज़ादी के 75 साल बाद भी सुप्रीम कोर्ट में केवल अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग क्यूँ? संसद के शीतकालीन सत्र में उठा सवाल

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करके और अपने पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार की सीमाओं का उल्लंघन करके भूल की है। परिणामस्वरूप, शीर्ष अदालत ने 6 अगस्त 2018 के हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और नाभा के रेंट कंट्रोलर तथा पटियाला के अपीलीय प्राधिकरण के आदेशों को बहाल कर दिया। प्रतिवादी को दो महीने की अवधि के भीतर दुकान का खाली और शांतिपूर्ण कब्जा अपीलकर्ताओं को सौंपने का निर्देश दिया गया है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मदन मोहन (मृतक) कानूनी वारिसों के माध्यम से बनाम ठाकर दास (मृतक) कानूनी वारिसों के माध्यम से
वाद संख्या: सिविल अपील नंबर … / 2026 (@ विशेष अनुमति याचिका (सिविल) नंबर 12435/2019)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 21 जुलाई, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles