सूरत के नासिर नगर में 100 से अधिक मकानों को ध्वस्त किए जाने के मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने सोमवार को सख्त टिप्पणी की। अदालत ने सवाल उठाया कि गंभीर आरोपों के बावजूद सूरत के नगर निगम आयुक्त अपने पद पर कैसे बने हुए हैं। हाईकोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में राज्य सरकार का रुख केवल एक दिखावा नजर आ रहा है और इससे सरकारी तंत्र की मिलीभगत का संदेश जा रहा है।
निचले अधिकारियों पर कार्रवाई, शीर्ष नेतृत्व पर चुप्पी
सुनवाई के दौरान अदालत ने महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी से पूछा कि जब निचले स्तर के अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है, तो नगर निगम आयुक्त के खिलाफ कोई प्राथमिक या विभागीय जांच शुरू क्यों नहीं की गई। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। अदालत ने सवाल किया कि जांच जारी रहने के दौरान संबंधित अधिकारी को शीर्ष पद पर बने रहने की अनुमति क्यों दी जा रही है।
व्हाट्सएप मैसेज और निजी जमीन पर सवाल
अदालत ने निलंबित नगर निगम अधिकारी सुजल प्रजापति के हलफनामे का अवलोकन किया, जिसमें नगर निगम आयुक्त द्वारा ध्वस्तीकरण कार्य जल्द से जल्द पूरा करने का निर्देश देने वाले व्हाट्सएप संदेश शामिल थे। राज्य सरकार की ओर से इन संदेशों को सामान्य प्रशासनिक फॉरवर्ड बताए जाने पर अदालत ने असंतोष व्यक्त किया। हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि जब नगर निगम ने खुद स्वीकार किया है कि यह निजी जमीन है, तो नगर निगम आयुक्त इस कार्रवाई में व्यक्तिगत रूप से इतनी रुचि क्यों ले रहे थे। इसके साथ ही अदालत ने फ्लोर स्पेस इंडेक्स (एफएसआई) लाभ के लिए आत्मसमर्पण की गई जमीन पर बने ढांचों को गिराने के नगर निगम के कानूनी तर्क पर भी सवाल उठाए।
करदाताओं के पैसे से नहीं, जिम्मेदार अधिकारियों से हो पुनर्वास
हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा गठित समिति को महज एक तथ्य-अन्वेषण अभ्यास (फैक्ट-फाइंडिंग एक्सरसाइज) करार दिया और कहा कि इसके निर्देशों और शर्तों में जवाबदेही तय करने का कोई स्पष्ट तंत्र नहीं है। इसके अलावा, अदालत ने कहा कि बेघर हुए परिवारों के पुनर्वास का वित्तीय बोझ करदाताओं या सरकारी खजाने पर नहीं डाला जाना चाहिए, बल्कि इसका खर्च उन व्यक्तियों से वसूला जाना चाहिए जो इस अवैध कार्रवाई के लिए जिम्मेदार हैं।
सरकार का आश्वासन और मामले की पृष्ठभूमि
अदालत के रुख को देखते हुए महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी ने बताया कि इस संबंध में उच्च स्तरीय बैठकें हुई हैं और सरकार जांच समिति के अधिकारों और कार्यक्षेत्र में संशोधन करेगी।
यह मामला 30 मई को सूरत के वेद रोड स्थित नासिर नगर में हुई कार्रवाई से जुड़ा है, जहां नगर निगम ने अतिक्रमण हटाने के नाम पर लगभग 100 झुग्गियों को ध्वस्त कर दिया था, जिससे 100 से अधिक परिवार विस्थापित हो गए थे। प्रभावित 26 निवासियों ने पुनर्वास और अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। वहीं, घटना के बाद निलंबित किए गए पांच नगर निगम अधिकारियों में से एक सुजल प्रजापति ने अपने निलंबन को अलग याचिका के जरिए चुनौती दी है। नगर निगम पूर्व में कोर्ट में स्वीकार कर चुका है कि यह कार्रवाई केवल भौतिक सीमांकन के दौरान हुई थी और इसे गिराने का कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया था, जिसके आधार पर कोर्ट ने माना था कि निकाय ने खुद स्वीकार किया है कि कार्रवाई गैरकानूनी थी।

