नगर पंचायत क्षेत्र में पढ़ाई करने वाली छात्रा ग्रामीण कोटे की हकदार नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने चंद्रपुर के जवाहर नवोदय विद्यालय में ग्रामीण कोटे के तहत कक्षा 6 में प्रवेश से इनकार करने के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संक्रमणकालीन क्षेत्र (नगर पंचायत) में कुछ समय के लिए भी पढ़ाई करने वाली छात्रा ग्रामीण आरक्षण श्रेणी के लाभ के लिए पात्र नहीं मानी जाएगी।

जस्टिस अनिल एस. किलोर और जस्टिस राज डी. वाकोडे की खंडपीठ ने चंद्रपुर में केंद्रीय सरकार द्वारा संचालित जवाहर नवोदय विद्यालय के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए कक्षा 6 में एक छात्रा के अंतिम प्रवेश को नामंजूर कर दिया गया था।

संबंधित छात्रा का चयन शुरुआत में ग्रामीण कोटे के तहत अस्थायी तौर पर हुआ था। हालांकि, स्कूल प्रशासन ने दस्तावेजों की जांच में पाया कि छात्रा ने तीसरी कक्षा के दौरान कुछ महीनों के लिए पोंभूर्णा के एक स्कूल में पढ़ाई की थी। चूंकि पोंभूर्णा एक ‘नगर पंचायत’ (संक्रमणकालीन नगर परिषद) क्षेत्र है, इसलिए स्कूल प्रशासन ने इसे शहरी क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया। जवाहर नवोदय विद्यालय के प्रवेश नियमों के मुताबिक, ग्रामीण कोटे के तहत आरक्षण का लाभ लेने के लिए उम्मीदवार को तीसरी, चौथी और पांचवीं कक्षा की पूरी पढ़ाई ग्रामीण क्षेत्र के मान्यता प्राप्त स्कूलों से पूरी करनी अनिवार्य है।

शहरी और ग्रामीण वर्गीकरण पर विवाद

छात्रा की मां ने स्कूल के इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ता की ओर से पक्ष रखते हुए एडवोकेट डी. वाई. चाटप, प्रणव देशमुख और बोधि रामटेके ने दलील दी कि किसी क्षेत्र में नगर पंचायत के गठन का यह मतलब नहीं है कि वह ग्रामीण इलाका पूरी तरह शहरी क्षेत्र में बदल गया है। उन्होंने तर्क दिया कि कानूनन नगर पंचायत एक नगरपालिका निकाय हो सकती है, लेकिन इसे शहरी जोन नहीं माना जाना चाहिए। वकीलों ने स्कूल की प्रवेश मार्गदर्शिका (प्रोस्पेक्टस) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि सरकार द्वारा विशेष रूप से अधिसूचित क्षेत्र ही शहरी माने जाएंगे और बाकी सभी क्षेत्र ग्रामीण श्रेणी में आएंगे।

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इसके विपरीत, स्कूल और केंद्र सरकार की ओर से पेश डिप्टी सॉलिसिटर जनरल कार्तिक एन. शुकुल और एडवोकेट प्रथा एन. हरदास ने तर्क दिया कि किसी क्षेत्र का संक्रमणकालीन या नगरपालिका क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत होना ही यह दर्शाता है कि वह अब व्यावहारिक रूप से ग्रामीण नहीं रहा। उन्होंने कोर्ट के सामने स्पष्ट किया कि ग्रामीण क्षेत्र वे हैं जिन्हें सरकार की अधिसूचनाओं में विशेष रूप से ग्रामीण घोषित किया गया हो, और इसके अलावा अन्य सभी क्षेत्रों को शहरी माना जाएगा।

ग्रामीण परिवेश और व्यावहारिक समझ पर हाईकोर्ट का जोर

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पीठ ने 10 जुलाई को अपने फैसले में स्कूल के वर्गीकरण को सही माना और कहा कि छात्रा ग्रामीण कोटे की निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा नहीं करती है।

निर्णय के दौरान कोर्ट ने ग्रामीण आरक्षण के मुख्य उद्देश्य और इसके पीछे की सोच पर प्रकाश डाला। पीठ ने संस्कृत के महान नीतिशास्त्री भर्तृहरि के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘नीतिशतकम्’ के एक श्लोक का संदर्भ दिया, जिसमें विद्या को एक ऐसा सुरक्षित गुप्त धन बताया गया है जिसे कभी खोया या चुराया नहीं जा सकता। जजों ने अपनी टिप्पणी में कहा कि ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े लोग वहां की जमीनी चुनौतियों जैसे कि आर्थिक तंगी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, खराब परिवहन व्यवस्था, अपर्याप्त चिकित्सा सेवाएं और कृषि पर अत्यधिक निर्भरता को बहुत करीब से और बेहतर ढंग से समझते हैं।

कोर्ट ने रेखांकित किया कि जब ऐसी ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले लोग भविष्य में नीति निर्माता (पॉलिसी मेकर) बनते हैं, तो वे अधिक प्रभावी और व्यावहारिक नीतियां तैयार करने में सक्षम होते हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की योजनाएं केवल कागजी दस्तावेजों तक सीमित न रहकर जमीन पर वास्तव में लागू हो पाती हैं।

वंचित और ग्रामीण छात्रों को विशेष सहयोग

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हाईकोर्ट ने जवाहर नवोदय विद्यालय योजना के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 के तहत इन आवासीय स्कूलों की स्थापना इसलिए की गई थी ताकि ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभावान बच्चों को उच्च गुणवत्ता वाली आधुनिक शिक्षा मिल सके।

चूंकि शहरी क्षेत्रों के बच्चों के पास बेहतर स्कूल, योग्य शिक्षक और कोचिंग संस्थान जैसी आधुनिक सुविधाएं आसानी से उपलब्ध होती हैं, इसलिए सरकार इन आवासीय स्कूलों का पूरा खर्च खुद वहन करती है। इस योजना के जरिए पात्र छात्रों को मुफ्त शिक्षा, भोजन, आवास, यूनिफॉर्म और किताबें दी जाती हैं, ताकि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच मौजूद शैक्षिक और विकासात्मक अंतर को पाटा जा सके।

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