कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेंगलुरु में ढाई साल के एक बच्चे की लापरवाही से हुई मौत के मामले में तीन आरोपियों के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे को बंद करने का आदेश दिया है। अदालत का यह निर्णय आरोपियों द्वारा पीड़ित परिवार के लिए पांच लाख रुपये का एक सुरक्षित मुआवजा ढांचा (स्ट्रक्चर्ड पैकेज) तैयार करने की सहमति देने के बाद आया है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस राशि को फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में रखा जाए ताकि मूल रकम सुरक्षित रहे और मिलने वाले ब्याज से परिवार का गुजारा हो सके।
जस्टिस एम नागाप्रसन्ना की एकल पीठ ने 9 जुलाई को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह विशेष व्यवस्था पीड़ित परिवार की दो बेटियों के भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से की गई है। इसके साथ ही, परिवार के रोजमर्रा के खर्चों में मदद के लिए आरोपियों को अगले एक साल तक हर महीने 10,000 रुपये का अतिरिक्त भुगतान करने का भी निर्देश दिया गया है।
मुआवजे की रकम दो लाख से बढ़ाकर पांच लाख की गई
यह मामला बेंगलुरु के राजराजेश्वरी नगर का है, जहां 27 मई को एक निर्माण स्थल पर ढाई साल का मासूम बच्चा खेलते हुए चला गया था। इस स्थल की देखरेख मुख्य आरोपी वेलु उर्फ वेलमयिल सोमू और दो अन्य लोग कर रहे थे। वहां काम के सिलसिले में पानी का एक खुला टैंक रखा हुआ था, जिसमें दुर्घटनावश गिर जाने से बच्चे की डूबकर मौत हो गई। घटना के बाद राजराजेश्वरी नगर पुलिस स्टेशन में लापरवाही से मौत का मामला दर्ज किया गया था।
मामले की अदालती सुनवाई के दौरान आरोपियों ने शुरुआत में बच्चे के पिता को दो लाख रुपये की एकमुश्त सहायता राशि देने का प्रस्ताव रखा था, जो पेशे से राजमिस्त्री हैं। लेकिन जस्टिस नागाप्रसन्ना ने इस शुरुआती प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। उनका कहना था कि किसी बच्चे के जीवन की कीमत को इतनी कम राशि में नहीं समेटा जा सकता, जो इस बड़ी त्रासदी के दर्द को भी बयां न कर सके। अदालत की गंभीर रुख के बाद, आरोपियों ने 1 जुलाई को कोर्ट के सामने नया प्रस्ताव पेश किया, जिसमें उन्होंने पांच लाख रुपये की सुरक्षित निधि और एक साल तक मासिक भुगतान की बात स्वीकार की।
अदालतें केवल विवाद नहीं सुलझातीं बल्कि न्याय की संरक्षक भी हैं
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि अदालतों का काम केवल विवादों का निपटारा करना ही नहीं है, बल्कि जब कानून का सामना मानवीय पीड़ा से होता है, तो वे निष्पक्षता और न्याय की मूक संरक्षक बन जाती हैं। अदालत ने माना कि कोई भी कानूनी प्रक्रिया या पैसा किसी माता-पिता के खोए हुए बच्चे को वापस नहीं ला सकता और न ही उनके दुख को पूरी तरह कम कर सकता है। फिर भी, जहां दोनों पक्ष समझौते के जरिए मामले को बंद करना चाहते हैं, वहां कोर्ट की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इसे सिर्फ एक व्यावसायिक सौदा न बनने दे, बल्कि इससे पीड़ित परिवार का वास्तविक पुनर्वास सुनिश्चित हो।
जस्टिस नागाप्रसन्ना ने इस बात पर भी विशेष ध्यान दिया कि रोजमर्रा के संघर्षों से जूझ रहे किसी गरीब परिवार को यदि एक बार में बड़ी रकम मिल जाए, तो वह तात्कालिक जरूरतों में ही समाप्त हो सकती है। इसी व्यावहारिक अनुभव को ध्यान में रखते हुए अदालत ने मुआवजे की राशि को फिक्स्ड डिपॉजिट में सुरक्षित रखने का आदेश दिया, ताकि भविष्य में पीड़ित परिवार की दोनों बच्चियों का पालन-पोषण ठीक से हो सके।

