अदालती समय के बाद आपातकालीन मामलों की सुनवाई के लिए बनेगा नियम? सुप्रीम कोर्ट ने मांगा व्यावहारिक खाका

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अति महत्वपूर्ण मामलों में अदालती समय के बाद (ऑफ-ऑवर्स) न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाने पर विचार करने की सहमति जताई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने देश भर के हाईकोर्ट और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर इस संबंध में एक व्यावहारिक प्रशासनिक ढांचा तैयार करने के लिए सुझाव मांगे हैं।

इस तीन सदस्यीय पीठ में मुख्य न्यायाधीश के साथ जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहाना भी शामिल हैं। पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि वे एक ऐसी ठोस प्रशासनिक योजना का मसौदा पेश करें जिसे अदालती समय के बाद की अर्जियों के प्रबंधन के लिए लागू किया जा सके।

दुरुपयोग की आशंका और नियम का दायरा

सुनवाई के दौरान अदालत और सरकार दोनों ने अदालती समय के बाद मामलों की सुनवाई की व्यवस्था के संभावित दुरुपयोग को लेकर चिंताएं व्यक्त कीं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने संकेत दिया कि यदि ऐसे नियम बनाए जाते हैं, तो उन्हें केवल जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े संवेदनशील मामलों तक ही सीमित रखना पड़ सकता है ताकि इस सुविधा के गलत इस्तेमाल को रोका जा सके। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि वकील कभी-कभी बेहद अस्पष्ट आवेदन दायर कर देते हैं, जिससे तत्काल सुनवाई तय करना मुश्किल हो जाता है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आगाह किया कि रात में अदालती सुनवाई का एक खुला विकल्प देने से कृत्रिम आपातकालीन स्थितियां खड़ी की जा सकती हैं। उन्होंने एक काल्पनिक उदाहरण देते हुए कहा कि व्यावसायिक मामलों से जुड़े पक्षकार अगली सुबह होने वाली लेनदारों की समिति (सीओसी) की बैठक से ठीक पहले रात 12 बजे एकतरफा (एक्स-पार्टी) आदेश हासिल करने के लिए आपातकालीन सुनवाई की मांग कर सकते हैं। मेहता ने सुझाव दिया कि सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर न्यायिक आदेश के बजाय प्रशासनिक स्तर पर विचार करे, या फिर हाईकोर्टों को अपने राज्य की परिस्थितियों के अनुसार स्थानीय नियम बनाने की छूट दी जाए।

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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस आशंका को सही ठहराया। उन्होंने याद किया कि पूर्व में उन्होंने हाईकोर्टों से सरकारी अस्पतालों की तरह चौबीसों घंटे काम करने का अनुरोध किया था, लेकिन वे मानते हैं कि जमीनी स्तर पर ठोस योजना बनाए बिना ऐसी किसी भी व्यवस्था की केवल घोषणा कर देने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

वर्गीकृत पहुंच और न्याय की उपलब्धता

जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण होने वाले विलंब को सीधे तौर पर न्याय से इनकार नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि नियमित अदालती समय और सामान्य कामकाजी घंटों के बाद की व्यवस्था को एक समान नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार, अदालती घंटों के बाद दी जाने वाली ‘वर्गीकृत पहुंच’ (ग्रेडिड एक्सेस) अपने आप में कोई अन्याय नहीं है।

जस्टिस बागची ने रेखांकित किया कि ऑनलाइन फाइलिंग प्रणाली लागू होने के बाद से तकनीकी तौर पर अदालत के दरवाजे कभी बंद नहीं होते। अक्सर समस्या तब आती है जब किसी मामले की गंभीरता को लेकर याचिकाकर्ता की उम्मीद और अदालत की रजिस्ट्री के स्वतंत्र मूल्यांकन में अंतर होता है। इस प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने सुझाव दिया कि एक ऐसा नियम बनाने पर विचार किया जा सकता है जिसके तहत किसी भी आपातकालीन संदेश या याचिका पर अदालत की रजिस्ट्री को अधिकतम एक घंटे के भीतर जवाब देना अनिवार्य हो।

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आम नागरिकों की चुनौतियां और याचिकाकर्ता के तर्क

यह याचिका अधिवक्ता मेहरविश रीन द्वारा दायर की गई है। उन्होंने दलील दी कि वर्तमान में रात के समय अदालतों तक पहुंच बेहद सीमित है, विशेषकर उन गरीब और वंचित लोगों के लिए जो सरकारी कानूनी सहायता समितियों पर निर्भर हैं, क्योंकि ये समितियां केवल दिन में ही काम करती हैं। रीन के अनुसार, गंभीर समस्याओं से जूझ रहे लोगों को अपनी अर्जियों पर सुनवाई के लिए अगली सुबह तक इंतजार करने को मजबूर होना पड़ता है।

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याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 32(4) का हवाला दिया, जो मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने के अधिकार की रक्षा करता है और स्पष्ट करता है कि इस संवैधानिक अधिकार को किसी भी परिस्थिति में तब तक निलंबित नहीं किया जा सकता जब तक कि संविधान में ही इसका प्रावधान न हो।

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए रीन ने एक अंतरधार्मिक जोड़े से जुड़ा अपना व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किया। उन्होंने बताया कि पुलिस द्वारा जोड़े को अलग किए जाने के बाद उन्होंने रात में आपातकालीन सुनवाई के लिए अदालत की रजिस्ट्री से संपर्क करने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें सुबह तक इंतजार करने को कह दिया गया। इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि संबंधित अधिकारी का वह निर्णय तात्कालिकता के गलत मूल्यांकन का परिणाम हो सकता है, लेकिन इसे व्यवस्थागत स्तर पर न्याय से वंचित किया जाना नहीं कहा जा सकता।

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