शिमला स्थित हिमाचल प्रदेश नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (HPNLU) के आठ छात्रों को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने अनिवार्य उपस्थिति (अटेंडेंस) पूरी न होने के कारण डिटेन किए गए छात्रों की उस अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अगले सेमेस्टर की कक्षाओं में बैठने की अनुमति मांगी थी।
चीफ जस्टिस गुरमीत सिंह संधावालिया और जस्टिस बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने एकल पीठ के 30 जून 2026 के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने साफ किया कि शैक्षणिक संस्थानों के अनिवार्य नियमों को केवल सहानुभूति या मानवीय आधार पर शिथिल नहीं किया जा सकता। खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक विवेक का दायरा वैधानिक नियमों से ऊपर नहीं हो सकता।
मामले की पृष्ठभूमि और अदालती कार्यवाही
इस मामले की शुरुआत 6 दिसंबर 2025 को हुई थी, जब यूनिवर्सिटी प्रशासन ने पर्याप्त उपस्थिति न होने के कारण सातवें सेमेस्टर के आठ छात्रों को डिटेन करने का आदेश जारी किया था। इस वजह से छात्रों को 11 से 26 दिसंबर 2025 तक होने वाली परीक्षाओं में शामिल होने से रोक दिया गया था।
छात्रों ने यूनिवर्सिटी के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 12 दिसंबर 2025 को एक अंतरिम आदेश देकर छात्रों को परीक्षा में शामिल होने की अनुमति तो दी, लेकिन स्पष्ट कर दिया कि इस अंतरिम राहत से भविष्य में उनका कोई कानूनी हक या दावा नहीं बनेगा।
इसके बाद, 20 मार्च 2026 को छात्रों को आठवें सेमेस्टर की कक्षाओं में भी बैठने की अस्थाई अनुमति मिल गई। इस बार भी यह शर्त लागू थी कि यह अस्थाई राहत मुख्य याचिका के अंतिम फैसले के अधीन होगी और इससे छात्रों को कोई स्थाई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं होगा।
मुख्य याचिका का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने 12 मई 2026 को यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया कि वह लागू नियमों के तहत छात्रों के मामले पर नए सिरे से विचार करे। हालांकि, यूनिवर्सिटी द्वारा दोबारा राहत देने से इनकार करने के बाद छात्रों ने फिर कोर्ट का रुख किया। एकल पीठ ने 30 जून 2026 को उनकी यह याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद छात्रों ने खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की थी।
सहानुभूति के आधार पर राहत संभव नहीं
खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले में कोई कानूनी खामी नहीं पाई और छात्रों की अपील के साथ-साथ सभी लंबित आवेदनों को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि न्याय की पूरी प्रक्रिया कानून के दायरे में ही चलती है। कानून को समग्र बुद्धिमत्ता और न्याय का प्रतीक माना गया है, और अदालतों के पास सिर्फ सहानुभूति के आधार पर नियमों के विपरीत जाकर राहत देने का कोई अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संदर्भ
अपने इस रुख को मजबूत करने के लिए खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले ‘मार्टिन बर्न लिमिटेड बनाम कॉर्पोरेशन ऑफ कलकत्ता (1966)’ का हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत को दोहराया, जिसके अनुसार किसी वैधानिक प्रावधान को लागू करने से निकलने वाले परिणाम कभी भी अनुचित या अहितकर नहीं होते। अदालतों को यह अधिकार नहीं है कि वे नियमों की अनदेखी केवल इसलिए कर दें क्योंकि उनका प्रभाव व्यावहारिक रूप से काफी कठोर या सख्त नजर आ रहा है।

