केरल हाईकोर्ट ने राज्य में सरकारी वकीलों (पब्लिक प्रोसिक्यूटर) की नियुक्ति प्रक्रिया को विनियमित करने वाले एक ड्राफ्ट सर्कुलर को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया है कि उम्मीदवारों के चयन और अंतिम पैनल तैयार करते समय जिला जज की राय को सर्वोपरि महत्व दिया जाना चाहिए।
चीफ जस्टिस सौमेन सेन और जस्टिस श्याम कुमार वी. एम. की बेंच ने यह फैसला 8 जुलाई को दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया। इन याचिकाओं में ड्राफ्ट सर्कुलर के तहत सरकारी वकीलों की नियुक्ति के लिए तय की गई प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी।
ड्राफ्ट सर्कुलर में महत्वपूर्ण बदलाव का निर्देश
हाईकोर्ट ने ड्राफ्ट सर्कुलर के क्लॉज (3) में एक महत्वपूर्ण संशोधन करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि इस क्लॉज में जिला जज की सिफारिश के महत्व को दर्शाने के लिए ‘उचित ध्यान’ (ड्यू रिगार्ड) शब्द के स्थान पर ‘प्राथमिकता’ (ड्यू प्राइमेसी) शब्द का उपयोग किया जाए।
यह निर्णय न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) और वरिष्ठ अधिवक्ता पी. दीपक की उन दलीलों के बाद आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि ड्राफ्ट सर्कुलर में जिला जज की राय को स्पष्ट रूप से प्राथमिकता नहीं दी गई है। याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील एस. के. आदित्यन और शहीना नौशाद ने भी अदालत में तर्क दिया था कि उम्मीदवारों की सूची तैयार करते समय जिला जज के फीडबैक को उचित महत्व नहीं दिया जा रहा था।
जिला पुलिस प्रमुख की भूमिका पर स्थिति साफ
दायर की गई याचिकाओं में ड्राफ्ट सर्कुलर के क्लॉज (2) के तहत नियुक्ति प्रक्रिया में जिला पुलिस प्रमुख को शामिल करने पर भी सवाल उठाए गए थे। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस आपत्ति को खारिज कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस प्रमुख को इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाने के पीछे एक वैध कानूनी कारण है। उनकी भागीदारी से चयन समिति को उम्मीदवारों के चरित्र और उनकी पृष्ठभूमि (एंटीसिडेंट्स) की सही जांच करने में मदद मिलती है, जिससे वे एक बेहतर और सटीक निर्णय ले पाते हैं। हालांकि, बेंच ने यह भी साफ कर दिया कि पुलिस प्रमुख की राय केवल सलाह के तौर पर होगी और अंतिम निर्णय के लिए यह बाध्यकारी नहीं होगी। इस स्पष्टीकरण के साथ कोर्ट ने याचिकाओं का निपटारा कर दिया।
राजनीतिक नियुक्तियों पर मद्रास हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सरकारी वकीलों की योग्यता और चयन प्रक्रिया का यह मामला ऐसे समय में आया है, जब हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट ने भी इस पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। मद्रास हाईकोर्ट ने राज्य सरकारों द्वारा योग्यता की अनदेखी कर केवल राजनीतिक वफादारी के आधार पर सरकारी वकीलों की नियुक्तियों की तीखी आलोचना की थी।
बीते 1 अप्रैल को जस्टिस बी. पुगलेंदी ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि कई बार ऐसे लोगों को सरकारी वकील बना दिया जाता है, जिनकी एकमात्र योग्यता चुनावों के दौरान पोस्टर चिपकाना होती है। अदालत ने एक उत्पीड़ित समुदाय की महिला से दुष्कर्म के प्रयास के दोषी की सजा निलंबित करने की याचिका को खारिज करते हुए यह गंभीर टिप्पणी की थी।
इस मामले में सरकारी वकील की एक बड़ी लापरवाही सामने आई थी, जिसने निचली अदालत में सुनवाई के दौरान पीड़िता को आई शारीरिक चोटों को सबूत के तौर पर पेश ही नहीं किया था। इस गंभीर चूक के बाद भी राज्य सरकार ने उस वकील को हटाने की सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं की थी। जस्टिस पुगलेंदी ने आगाह किया था कि योग्यता के स्थान पर राजनीतिक नजदीकी को तरजीह देने से अदालतों में कमजोर और पीड़ित पक्षों को सही न्याय नहीं मिल पाता है।

