सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63 के तहत किसी वसीयत के निष्पादन (execution) और सत्यापन (attestation) को साबित कर देना ही उसे वैध मानने के लिए पर्याप्त नहीं है, यदि वह दस्तावेज संदेहास्पद परिस्थितियों से घिरा हो। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले को खारिज करते हुए कहा कि वसीयत को अदालत की अंतरात्मा को संतुष्ट करना चाहिए, और इसे पेश करने वाले व्यक्ति (propounder) को किसी भी संदेहास्पद पहलू का ठोस और विश्वसनीय स्पष्टीकरण देना होगा।
इस फैसले के साथ, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के उन सहमत फैसलों को बहाल कर दिया, जिन्होंने एक विवादित वसीयत को खारिज कर दिया था। इस विवादित वसीयत के जरिए एक आश्रित पत्नी को पूरी तरह से बेदखल कर गैर-रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाया गया था और इसके रजिस्ट्रेशन पेज पर बिना हस्ताक्षर वाले बदलाव किए गए थे।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद सिविल सूट नंबर 51/1993 से शुरू हुआ, जिसे स्वर्गीय छज्जू राम की विधवा भाम्बो देवी ने दायर किया था। छज्जू राम एक अनपढ़ किसान थे, जो विवादित संपत्ति के एकमात्र मालिक थे। 5 फरवरी 1992 को बिना किसी संतान के और बिना वसीयत किए उनका निधन हो गया। चूंकि उनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए सामान्य उत्तराधिकार नियमों के तहत उनकी विधवा ही उनकी एकमात्र कानूनी वारिस थीं। हालांकि, प्रतिवादियों—बिशन दास और राम सिंह—ने 6 नवंबर 1974 की एक रजिस्टर्ड वसीयत पेश कर संपत्ति पर अपना मालिकाना हक जताया।
प्रतिवादियों ने इस वसीयत के आधार पर रेवेन्यू रिकॉर्ड में म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) अपने पक्ष में करवा लिया। भाम्बो देवी ने इस म्यूटेशन और वसीयत को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि यह एक फर्जी दस्तावेज था और इसे धोखाधड़ी या अनुचित प्रभाव के तहत तैयार किया गया था। उन्होंने खुद को संपत्ति का एकमात्र मालिक घोषित करने और कब्जा दिलाने की मांग की। प्रतिवादियों ने इसका विरोध करते हुए दावा किया कि छज्जू राम ने उनके द्वारा की गई सेवा और प्रेम-स्नेह के बदले में अपने पूरे होशोहवास में यह वसीयत लिखी थी।
ट्रायल कोर्ट ने कई संदेहास्पद परिस्थितियों को देखते हुए विधवा के पक्ष में फैसला सुनाया। इनमें सबसे प्रमुख बात यह थी कि पत्नी को इस कमजोर आधार पर वसीयत से बेदखल कर दिया गया था कि उसके पास “पर्याप्त गहने और नकदी” हैं (जिसका कोई विवरण नहीं था)। इसके अलावा, वसीयत के पिछले हिस्से पर जहां सब-रजिस्ट्रार का रजिस्ट्रेशन एंडोर्समेंट था, वहां गंभीर और बिना हस्ताक्षर वाले बदलाव (कट्टिंग्स) किए गए थे। कई जगहों पर “लक्ष्मी कांत बस्सी” नाम को काटकर हाथ से “छज्जू” लिखा गया था, लेकिन उस पर सब-रजिस्ट्रार के कोई हस्ताक्षर या सत्यापन नहीं था।
प्रथम अपील की सुनवाई के दौरान भाम्बो देवी का निधन हो गया और सरदारी लाल (अपीलकर्ता) को उनके कानूनी प्रतिनिधि के रूप में शामिल किया गया। प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले की पुष्टि की। लेकिन दूसरी अपील में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इन सहमत फैसलों को पलट दिया। हाईकोर्ट ने माना कि चूंकि उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63 के तहत एक गवाह द्वारा वसीयत के निष्पादन और सत्यापन को साबित कर दिया गया था, इसलिए पिछले पन्ने पर की गई कट्टिंग्स महत्वहीन थीं और वसीयत पूरी तरह वैध थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता ने दलील दी कि प्रतिवादियों ने खुद स्वीकार किया था कि वादी मृतक की एकमात्र श्रेणी-1 (Class I) वारिस थी, इसलिए उसकी विरासत के अधिकार के लिए किसी अलग सबूत की जरूरत नहीं थी। उन्होंने तर्क दिया कि वसीयत को साबित करने का भार पूरी तरह से उसे पेश करने वाले पक्ष पर होता है, जिसे अदालत की न्यायिक अंतरात्मा को संतुष्ट करना पड़ता है। अपीलकर्ता ने कई संदेहास्पद परिस्थितियों की ओर इशारा किया, जिनमें एक देखभाल करने वाली पत्नी को स्वाभाविक अधिकार से वंचित करना, वसीयतकर्ता का अनपढ़ होना और रजिस्ट्रेशन पेज पर बिना स्पष्टीकरण वाली कट्टिंग्स शामिल थीं, जिससे सही रजिस्ट्रेशन का कानूनी अनुमान खत्म हो गया था। उन्होंने एच. वेंकटचला अयंगर बनाम बी.एन. थिम्मजम्मा और रानी पूर्णिमा देबी बनाम कुमार खगेंद्र नारायण देब जैसे पूर्व फैसलों का हवाला दिया।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि वादी की दलीलें विरोधाभासी थीं, क्योंकि उन्होंने एक तरफ वसीयत को फर्जी बताया और दूसरी तरफ इसे धोखाधड़ी या अनुचित प्रभाव के तहत निष्पादित करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि चूंकि वादी ने खुद गवाही नहीं दी और न ही धोखाधड़ी साबित करने के लिए कोई सबूत पेश किया, इसलिए उनका मुकदमा खारिज होना तय था। उन्होंने तर्क दिया कि एक अटेस्टिंग गवाह की मदद से वसीयत का निष्पादन पूरी तरह साबित हो गया था और रजिस्ट्रेशन पेज पर की गई कट्टिंग्स का वसीयत के मुख्य हिस्से पर कोई असर नहीं पड़ता। उन्होंने मधुकर डी. शेंडे बनाम ताराबाई आबा शेडगे और श्रीदेवी बनाम जयराजा शेट्टी मामलों का हवाला देते हुए कहा कि असमान बंटवारा या पूरी तरह बेदखल करना वसीयत को स्वतः अवैध नहीं बनाता।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के कई महत्वपूर्ण पहलुओं की जांच की। सबसे पहले कोर्ट ने वादी की दलीलों की निरंतरता पर विचार किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत वैकल्पिक दलीलें दी जा सकती हैं और धोखाधड़ी का वैकल्पिक आरोप लगाने का मतलब यह नहीं है कि वसीयत के निष्पादन को स्पष्ट रूप से स्वीकार कर लिया गया है।
इसके अलावा, कोर्ट ने माना कि वादी (विधवा) का खुद अदालत में गवाही न देना मुकदमे के लिए नुकसानदेह नहीं था। चूंकि प्रतिवादियों ने वादी की शादी और छज्जू राम के मालिकाना हक पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी, इसलिए ‘नॉन-ट्रावर्स के सिद्धांत’ (CPC के आदेश VIII नियम 5) के तहत वे तथ्य पहले से ही स्वीकार्य थे और उन्हें साबित करने की आवश्यकता नहीं थी।
वसीयत को साबित करने के पैमाने पर सुप्रीम कोर्ट ने जसवंत कौर मामले का हवाला देते हुए टिप्पणी की:
“ऐसी परिस्थितियों में जहां वसीयत का निष्पादन संदेह के दायरे में हो, उसे साबित करना केवल वादी और प्रतिवादी के बीच का सामान्य विवाद नहीं रह जाता। आमतौर पर चलने वाली यह विरोधी प्रक्रिया ऐसे मामलों में अदालत की अंतरात्मा का विषय बन जाती है। तब विचार करने योग्य वास्तविक प्रश्न यह होता है कि क्या वसीयत पेश करने वाले व्यक्ति द्वारा दिए गए सबूत अदालत की अंतरात्मा को यह संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं कि वसीयत सचमुच वसीयतकर्ता द्वारा निष्पादित की गई थी। जब तक वसीयत पेश करने वाला पक्ष इसे बनाने के पीछे की संदेहास्पद परिस्थितियों का कोई ठोस और विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं देता, तब तक अदालत का संतुष्ट होना असंभव है।”
इस पैमाने को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संदेहास्पद परिस्थितियों का मूल्यांकन किया:
- पत्नी को बेदखल करना: कोर्ट ने माना कि हालांकि केवल बेदखल करना हमेशा संदेहास्पद नहीं हो सकता, लेकिन एक देखभाल करने वाली और आश्रित पत्नी को छोड़कर गैर-रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाना बेहद अस्वाभाविक है और यह “अदालत की अंतरात्मा को झकझोरता है।” वसीयत में दिए गए कारण (कि पत्नी के पास गहने थे और लाभार्थियों ने सेवा की थी) तथ्यात्मक रूप से गलत या बेहद कमजोर पाए गए।
- अशिक्षा और गलत विवरण: वसीयतकर्ता एक अनपढ़ किसान थे जो केवल अंगूठे का निशान लगा सकते थे। वसीयत में गंभीर तथ्यात्मक गलतियां थीं, जैसे लाभार्थियों को वसीयतकर्ता का “भतीजा” बताना और यह दावा करना कि वह उनके साथ रहते थे, जबकि सबूतों ने इसे गलत साबित कर दिया।
- वसीयत पर कट्टिंग्स: रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1908 के तहत रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के साथ यह माना जाता है कि प्रक्रिया सही ढंग से हुई होगी। हालांकि, चूंकि वसीयत पेश करने वाले का नाम “लक्ष्मी कांत बस्सी” से बदलकर “छज्जू” कर दिया गया था और इस पर सब-रजिस्ट्रार के कोई हस्ताक्षर या पुष्टि नहीं थी, इसलिए कोर्ट ने माना कि इस कानूनी अनुमान का लाभ खत्म हो गया। कोर्ट ने कहा कि इस बदलाव के कारण यह सत्यापित करना असंभव हो गया कि क्या सब-रजिस्ट्रार ने वास्तव में छज्जू राम को वसीयत पढ़कर सुनाई थी या उनकी पहचान की पुष्टि की थी।
अंत में, कोर्ट ने सीपीसी (CPC) की धारा 100 के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर विचार किया। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“‘अदालत की अंतरात्मा संतुष्ट होने’ जैसे पारंपरिक मुहावरों का उपयोग किसी तथ्य के प्रश्न को कानून के प्रश्न में नहीं बदल सकता। यह मुहावरा केवल विवेक का एक नियम है और यह कहने का एक तरीका मात्र है कि जब संपत्ति के कानूनी वारिसों को उनकी विरासत से पूरी तरह या आंशिक रूप से वंचित किया जा रहा हो, और वह व्यक्ति खुद गवाही के लिए जीवित न हो, तो ऐसे कार्य को वैध मानने से पहले अत्यधिक सावधानी बरती जानी चाहिए। लेकिन इन सबके बावजूद, यह सवाल हमेशा तथ्य का प्रश्न ही रहता है।”
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि संदेहास्पद परिस्थितियों का स्पष्टीकरण न मिलने पर निचली अदालतों द्वारा लिया गया निर्णय पूरी तरह तथ्यों पर आधारित था, इसलिए हाईकोर्ट के पास हस्तक्षेप करने के लिए कानून का कोई ठोस प्रश्न (substantial question of law) नहीं था और उसने धारा 100 CPC के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले और आदेश को खारिज कर दिया। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले की पुष्टि की, जिससे स्वर्गीय विधवा के कानूनी प्रतिनिधि के पक्ष में मालिकाना हक और स्थायी निषेधाज्ञा (permanent injunction) का आदेश बहाल हो गया। मुकदमे के खर्च को लेकर कोई आदेश नहीं दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सरदारी लाल बनाम बिशन दास और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2016 की 10990
पीठ: जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
निर्णय की तिथि: 06 जुलाई, 2026

