केरल के एर्नाकुलम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने वाहन निर्माता कंपनी पियाजियो (Piaggio) को एक बड़ा झटका दिया है। आयोग ने कंपनी को एक पीड़ित ग्राहक को कुल 5.1 लाख रुपये का भुगतान करने का फैसला सुनाया है। शिकायतकर्ता ने अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए पियाजियो का एक मालवाहक वाहन खरीदा था, जिसमें शुरुआत से ही कई तकनीकी गड़बड़ियां थीं। आयोग ने इस मामले में साफ कहा है कि यदि किसी उत्पाद में बुनियादी रूप से ही निर्माण संबंधी कोई खामी (मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट) है, तो वारंटी की अवधि समाप्त होने के बाद भी निर्माता कंपनी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है।
अदालत का फैसला और मुआवजा
फोरम के अध्यक्ष डी. बी. बीनु और सदस्य वी. रामचंद्रन व श्रीविध्या टी. एन. की पीठ ने 30 मई को इस मामले में अपना निर्णय दिया। इस आदेश के तहत पियाजियो को निर्देश दिया गया है कि वह शिकायतकर्ता को गाड़ी की पूरी खरीद कीमत यानी 4.5 लाख रुपये वापस करे। इसके साथ ही पीड़ित को हुई मानसिक प्रताड़ना और असुविधा के एवज में 50,000 रुपये का मुआवजा देने तथा अदालती कार्रवाई के खर्च के रूप में 10,000 रुपये का भुगतान करने का भी आदेश दिया गया है।
रोजी-रोटी के लिए खरीदा था वाहन, पर लगातार आई खराबी
शिकायतकर्ता ने 13 नवंबर 2017 को यूनियन बैंक से लोन लेकर 4.5 लाख रुपये में पियाजियो पोर्टर 1000 (Piaggio Porter 1000) नामक कमर्शियल वाहन खरीदा था। पीड़ित ने गाड़ी मुख्य रूप से माल ढुलाई के काम के जरिए अपनी आजीविका कमाने के लिए ली थी। हालांकि, सड़क पर उतरने के कुछ ही समय बाद गाड़ी में कई तरह की तकनीकी समस्याएं आने लगीं। इसमें मुख्य रूप से इंजन फाउंडेशन में खराबी, बेहद कम पिकअप, ऑयल लीकेज, क्लच से असामान्य आवाज आना, रेडिएटर फैन का ठीक से काम न करना और गियरबॉक्स से आने वाली आवाजें शामिल थीं। कई बार सर्विस सेंटर ले जाने के बाद भी इन समस्याओं का कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सका और आखिरकार गाड़ी पूरी तरह से बंद हो गई, जिसके बाद पीड़ित को कानूनी रास्ता चुनना पड़ा।
कंपनी की दलील और एक्सपर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट
पियाजियो ने अपने बचाव में दलील दी थी कि गाड़ी की वारंटी (24 महीने या 75,000 किलोमीटर, जो भी पहले हो) शिकायत दर्ज होने से काफी पहले ही समाप्त हो चुकी थी। कंपनी का यह भी दावा था कि वाहन का एक्सीडेंट हुआ था और इसे लंबे समय तक बिना इस्तेमाल किए खड़ा रखा गया, जिससे इसकी हालत बिगड़ी। कंपनी के अनुसार, ग्राहक ने केवल नियमित सर्विसिंग के दौरान छोटी-मोटी शिकायतें दर्ज कराई थीं, जिन्हें ठीक कर दिया गया था। वहीं मामले से जुड़े एक सर्विस सेंटर का दावा था कि पीड़ित कभी अपनी गाड़ी सर्विसिंग के लिए उनके पास लेकर ही नहीं आया।
हालांकि, आयोग द्वारा नियुक्त एक विशेषज्ञ आयुक्त (एक्सपर्ट कमिश्नर) ने जब गाड़ी का तकनीकी निरीक्षण किया तो कंपनी के दावे खारिज हो गए। रिपोर्ट में पुष्टि की गई कि गाड़ी में बुनियादी रूप से ही कई गंभीर खामियां थीं, जैसे बार-बार इंजन का बंद हो जाना, इंजन की गलत सेटिंग, गाड़ी में अत्यधिक कंपन होना, लगातार ऑयल लीकेज और गाड़ी की उम्र व चली हुई दूरी के लिहाज से इसका बेहद खराब प्रदर्शन।
कंज्यूमर फोरम की तीखी टिप्पणी
उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले में कहा कि वाहन में देखी गईं गंभीर कमियां सामान्य टूट-फूट के दायरे में नहीं आतीं, बल्कि ये सीधे तौर पर मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट का हिस्सा हैं। पीठ ने पाया कि यह वाहन तकनीक, गुणवत्ता और कारीगरी के तय मानकों पर खरा उतरने में पूरी तरह नाकाम रहा है। फोरम ने स्पष्ट तौर पर कहा कि जब यह साबित हो चुका है कि गाड़ी में शुरुआत से ही मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट था, तो कंपनी केवल वारंटी खत्म होने की आड़ लेकर अपनी कानूनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकती।

