कोलकाता के बालीगंज में बिना किसी स्वीकृत नक्शे के बनाई गई एक इमारत को ढहाने के फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट ने सही ठहराया है। अदालत ने इस कार्रवाई के खिलाफ किराएदारों की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि बिना अनुमति और योजना के खड़ी की जाने वाली इमारतें जन सुरक्षा और मानव जीवन के लिए एक बड़ा खतरा हैं। हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि इस तरह के अवैध निर्माणों से पूरी कड़ाई के साथ निपटा जाना चाहिए।
जस्टिस दिनेश कुमार शर्मा ने 24 जून को दिए अपने निर्णय में म्यूनिसिपल बिल्डिंग ट्रिब्यूनल के पुराने फैसले को बरकरार रखा। उन्होंने कहा कि अदालतों को ऐसे मामलों में बेहद संवेदनशील होना होगा, क्योंकि इस प्रकार के ढांचों को बने रहने देना बड़े हादसों और इंसानी जिंदगियों के नुकसान को खुला निमंत्रण देना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई बार इस बात को रेखांकित किया है कि किसी भी अवैध निर्माण के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया जाना बेहद जरूरी है।
यह विवाद कोलकाता के 11सी, बालीगंज स्टेशन रोड स्थित एक परिसर से जुड़ा है, जिसे गिराने का आदेश कोलकाता नगर निगम (केएमसी) ने दिया था। इस आदेश को ट्रिब्यूनल ने भी सही ठहराया था, जिसके खिलाफ सुमिता मंडल और अन्य किराएदारों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
इमारत की कानूनी परिभाषा पर बहस
याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए वकील शौनक भट्टाचार्य, शौनक मंडल और बिपाशा भट्टाचार्य ने दलील दी कि निगम का यह आदेश पूरी तरह से गलत है। उनका तर्क था कि जिस विवादित ढांचे को गिराने की बात कही जा रही है, वह कोलकाता नगर निगम अधिनियम, 1980 की धारा 2 की उपधारा (5) के तहत ‘इमारत’ की कानूनी परिभाषा के दायरे में ही नहीं आता। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने केएमसी के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए निर्माण की उम्र और समय को लेकर निगम के दावों में विरोधाभास होने की बात भी कही।
कोलकाता नगर निगम का रुख
दूसरी ओर, केएमसी की तरफ से पेश वकील सुभ्रांशु पांडा और ईना भट्टाचार्य ने इन दलीलों का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि निगम के भवन विभाग ने इस संपत्ति का बकायदा निरीक्षण किया था और सभी संबंधित दस्तावेजों की जांच की थी। रिकॉर्ड के मुताबिक, इस जगह पर साल 1984 से कई लोग रह रहे हैं।
निगम के वकीलों ने अदालत को बताया कि अवैध निर्माण की शिकायत मिलने के बाद केएमसी ने उचित कानूनी प्रक्रिया शुरू की थी और कोलकाता नगर निगम अधिनियम, 1980 की धारा 400 के तहत आवश्यक कदम उठाए थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि ढहाने का यह फैसला सभी पक्षों की दलीलों और दावों को सुनने के बाद ही पूरी तरह कानून के दायरे में लिया गया था।
अदालत का हस्तक्षेप से इनकार
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में निगरानी अधिकार क्षेत्र (Revisional Jurisdiction) की कानूनी सीमाओं को भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि वह ट्रिब्यूनल के आदेशों में केवल उसी स्थिति में हस्तक्षेप कर सकती है जब उसमें कोई साफ कानूनी खामी, गड़बड़ी या विसंगति दिखाई दे। केवल इस आधार पर फैसला नहीं बदला जा सकता कि मामले में कोई दूसरा नजरिया भी संभव है।
तथ्यों की समीक्षा के बाद अदालत ने पाया कि बालीगंज स्थित इस विवादित ढांचे के निर्माण के लिए निगम से कोई भी स्वीकृत नक्शा नहीं लिया गया था। इस आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को सही मानते हुए किराएदारों की याचिका को खारिज कर दिया।

