इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वकीलों के बैंक अकाउंट को संदिग्ध लेन-देन या मुवक्किलों से मिली फीस के आधार पर पूरी तरह फ्रीज नहीं किया जा सकता, क्योंकि पेशेवर फीस को ‘अपराध की कमाई’ (प्रोसीड्स ऑफ क्राइम) नहीं माना जा सकता। उत्तर प्रदेश पुलिस की साइबर सेल द्वारा एक वकील के बैंक अकाउंट को फ्रीज किए जाने के मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की पीठ ने यह निर्णय दिया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) को दो सप्ताह के भीतर एक व्यक्तिगत हलफनामा दायर कर यह बताने का निर्देश दिया है कि वकीलों के खातों के खिलाफ पुलिस की इस तरह की कार्रवाई को कैसे विनियमित किया जाएगा, ताकि अदालतों में न्याय के संचालन में कोई बाधा न आए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला तब सामने आया जब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई), कृष्णा नगर शाखा, कानपुर के शाखा प्रबंधक ने यह रिपोर्ट दी कि याचिकाकर्ता का बैंक अकाउंट उत्तर प्रदेश पुलिस की साइबर सेल द्वारा कथित धोखाधड़ी वाले लेन-देन के आरोप में फ्रीज कर दिया गया है। याचिकाकर्ता, आयुष बाजपेयी, इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले एक वकील हैं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि संबंधित बैंक अकाउंट में बहुत ही सामान्य लेन-देन हुआ था। इसमें 18 मार्च 2026 को 20,000 रुपये जमा हुए थे और 23 अप्रैल 2026 को 3,700 रुपये के तीन अलग-अलग क्रेडिट दर्ज थे। याचिकाकर्ता के इस खाते में कुल जमा राशि 1,03,071 रुपये थी।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से वकील अर्चित मिश्रा और सौरभ चतुर्वेदी कोर्ट में उपस्थित हुए। वहीं, प्रतिवादियों (उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य) की ओर से सरकारी वकील (स्थायी अधिवक्ता) ने नोटिस स्वीकार किया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने सबसे पहले बैंक अकाउंट फ्रीज करने के संबंध में साइबर सेल के अधिकारों के दायरे की व्याख्या की। कोर्ट ने अपने दो पुराने खंडपीठ के निर्णयों—खालसा मेडिकल स्टोर प्रोपराइटर यशवंत सिंह बनाम रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया गवर्नर व 3 अन्य (2026:AHC-LKO:3701-DB) और मारूफा बेगम बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व 5 अन्य (2025:AHC:190289-DB)—का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि:
“धोखाधड़ी के लेन-देन के मामले में साइबर सेल पूरे बैंक अकाउंट को फ्रीज नहीं कर सकती, केवल उसी हिस्से को फ्रीज किया जा सकता है जो संदिग्ध लेन-देन या अपराध की कमाई का हिस्सा हो।”
इसके बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील होने के पेशेवर दर्जे पर विचार किया। कोर्ट ने कहा कि वकीलों को अपने मुवक्किलों से पेशेवर फीस प्राप्त करने का कानूनी अधिकार है, भले ही उनके मुवक्किल पर कोई भी आरोप क्यों न हो। पीठ ने टिप्पणी की:
“एक वकील किसी ऐसे आरोपी का बचाव कर सकता है जो वास्तव में किसी बड़े घोटाले या धोखाधड़ी में शामिल हो, लेकिन जब ऐसे आरोपी द्वारा अपने वकील के बैंक अकाउंट में फीस भेजी जाती है, तो उस पैसे को अपराध की कमाई नहीं कहा जा सकता। यह वकील का कानूनी पारिश्रमिक है जो केस हाथ में लेने के बाद उनके द्वारा कानूनी रूप से कमाया जाता है।”
इस प्रकार के बैंक खातों को फ्रीज करने से वकालत के पेशे और पूरी न्याय व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कोर्ट ने माना:
“अगर किसी भी रकम के लेन-देन के लिए किसी वकील का बैंक अकाउंट यह कहकर फ्रीज कर दिया जाता है कि यह साइबर धोखाधड़ी है या यह पैसा साइबर फ्रॉड या अन्य अपराध की कमाई है, तो वकीलों के लिए एडवोकेट्स एक्ट के तहत अपने पेशेवर कर्तव्यों का पालन करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इससे खुद कोर्ट के कामकाज में भी बाधा आएगी।”
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस स्थिति और वकील की व्यक्तिगत संलिप्तता के बीच एक स्पष्ट अंतर रेखांकित करते हुए कहा:
“यह बिल्कुल अलग मामला होगा यदि कोई वकील खुद किसी आपराधिक अपराध में शामिल हो और उसके खाते में आया पैसा उसके अपने अपराध की कमाई हो।”
हाईकोर्ट का निर्देश और निर्णय
हाईकोर्ट ने मामले में सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है और प्रतिवादी संख्या 2 को सोमवार तक रजिस्टर्ड पोस्ट (आर.पी.ए.डी.) के जरिए नोटिस तामील कराने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह), लखनऊ को दो सप्ताह के भीतर अपना व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया। इस हलफनामे में उन्हें यह बताना होगा कि पुलिस अधिकारियों द्वारा वकीलों के बैंक खातों को जब्त करने की प्रक्रिया को किस तरह नियंत्रित किया जाए ताकि न्यायालयों में न्याय वितरण का काम प्रभावित न हो।
सभी प्रतिवादियों को दो सप्ताह के भीतर अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। कोर्ट ने इस मामले को अगली सुनवाई के लिए 17 जुलाई 2026 को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया।
इसके साथ ही, रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) को निर्देशित किया गया है कि वे आगामी सोमवार तक इस आदेश की जानकारी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ के माध्यम से अपर मुख्य सचिव (गृह), उत्तर प्रदेश और साइबर सेल, उत्तर प्रदेश पुलिस को प्रेषित करें। साथ ही मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कानपुर नगर के माध्यम से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, कृष्णा नगर शाखा, कानपुर के शाखा प्रबंधक को भी आदेश की प्रति भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: आयुष बाजपेयी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका सिविल संख्या 24589 वर्ष 2026
पीठ: जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार
निर्णय की तिथि: 25 जून 2026

