न्यायिक आदेशों में कारणों का उल्लेख अनिवार्य: हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के एक लाइन के आदेश को रद्द किया

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक और अर्ध-न्यायिक आदेशों में कारणों का उल्लेख होना आवश्यक है। कोर्ट ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) के उस एक लाइन के आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें एक आयकर विभाग अधिकारी को विभागीय कार्यवाही के दौरान अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया गया था। जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस सुबेंदु सामंत की खंडपीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि आदेश की नींव उसके कारण होते हैं, जिसके बाद कोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए ट्रिब्यूनल को अंतरिम राहत की प्रार्थना पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

तिरुपति में आयकर विभाग के कार्यालय अधीक्षक ए. राजशेखर गौड़ के खिलाफ विभागीय कार्यवाही चल रही थी। यह कार्यवाही 20 नवंबर, 2025 को जारी एक आदेश के तहत शुरू की गई थी। यह आदेश अनुशासनात्मक प्राधिकारी (प्रधान आयकर आयुक्त, तिरुपति चार्ज) द्वारा केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियमावली, 1965 के नियम 15(1) के तहत पारित किया गया था।

इस कार्यवाही को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट), हैदराबाद पीठ के समक्ष मूल आवेदन (ओ.ए.) संख्या 424/2026 दायर किया था। इसके साथ ही उन्होंने सभी विभागीय कार्यवाहियों पर रोक लगाने के लिए अंतरिम राहत की भी मांग की थी।

ट्रिब्यूनल ने 23 अप्रैल, 2026 को याचिका तो स्वीकार कर ली और प्रतिवादियों को जवाब दाखिल करने का समय दिया, लेकिन याचिकाकर्ता की अंतरिम राहत की मांग को बिना किसी विस्तृत टिप्पणी के खारिज कर दिया। अंतरिम राहत की मांग पर ट्रिब्यूनल का आदेश केवल एक वाक्य का था:

“ओ.ए. में मांगी गई अंतरिम राहत को खारिज किया जाता है।”

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ट्रिब्यूनल के इस निर्णय से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर की। याचिका में विभागीय कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की गई और ट्रिब्यूनल के आदेश को मनमाना, अवैध व प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध घोषित करने का आग्रह किया गया।

पक्षों की दलीलें

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील श्री ए. नागा सूर्य वेंकटेश ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल का आदेश एक ‘नॉन-स्पीकिंग’ (बिना कारण का) आदेश था, जो मात्र एक पंक्ति में समाप्त हो गया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि अंतरिम राहत की प्रार्थना को बिना किसी स्पष्टीकरण या विश्लेषण के ही अस्वीकार कर दिया गया था।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों (भारत संघ और अन्य) की तरफ से पेश वकील श्री वाई.एन. विवेकानंद ने कार्यवाही की समय-सारणी का बचाव किया। उन्होंने दलील दी कि ट्रिब्यूनल ने मामले को अपेक्षाकृत कम समय के भीतर यानी 23 जुलाई, 2026 को रजिस्ट्रार कोर्ट के समक्ष जवाब पूरा करने के लिए सूचीबद्ध किया है, जिसका अर्थ है कि मामला तेजी से आगे बढ़ रहा है।

कोर्ट का विश्लेषण

दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने और सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के विवादित आदेश की जांच करने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पाया कि अंतरिम प्रार्थना को खारिज करने वाले आदेश में किसी भी प्रकार का तर्क या कारण नहीं दिया गया था। हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि आदेशों में कारणों का उल्लेख कानून की एक अनिवार्य आवश्यकता है।

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कोर्ट ने टिप्पणी की:

“कानून में यह भली-भांति स्थापित है कि आदेश में कारणों का उल्लेख होना चाहिए। कारण ही किसी आदेश की रीढ़ होते हैं।”

ट्रिब्यूनल के फैसले को इस कानूनी पैमाने पर परखते हुए पीठ ने आगे कहा:

“आदेश में कोई भी तर्कसंगत आधार नहीं दिखाई देता है।”

कोर्ट का निर्णय

इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार कर लिया और ट्रिब्यूनल के आदेश के उस विशिष्ट हिस्से को रद्द कर दिया जिसके द्वारा अंतरिम राहत की मांग को खारिज किया गया था।

कोर्ट ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया कि वह दोनों पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर देते हुए कानून के अनुसार याचिकाकर्ता की अंतरिम राहत की प्रार्थना पर दोबारा विचार करे। खंडपीठ ने आदेश दिया कि यह पुनर्विचार प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी की जाए, जो अधिमानतः अगली निर्धारित तिथि यानी 23 जुलाई, 2026 को हो, अथवा किसी कारणवश उस दिन संभव न होने पर उसके ठीक एक सप्ताह के भीतर अनिवार्य रूप से पूरी कर ली जाए।

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हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने इस मामले के मुख्य गुण-दोष पर अपनी ओर से कोई टिप्पणी नहीं की है और इस याचिका पर किसी भी पक्ष के लिए कोई खर्च तय नहीं किया गया है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: ए राजशेखर गौड़ बनाम भारत संघ एवं अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या: 12292/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस सुबेंदु सामंत
निर्णय की तिथि: 19 जून, 2026

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