सुप्रीम कोर्ट ने अदालती जालसाजी मामले में सजा घटाई, आनुपातिक सजा के सिद्धांत पर दिया जोर

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक कार्यवाही में जमानत के लिए फर्जी राजस्व दस्तावेज जमा करने के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने दोषी व्यक्ति की पांच साल की जेल की सजा को घटाकर उसके द्वारा पहले से काटी जा चुकी दो साल से अधिक की अवधि में बदल दिया। अदालत ने साफ किया कि न्यायिक प्रक्रिया में जालसाजी करना बेहद गंभीर अपराध है, लेकिन इसके साथ ही यह भी कहा कि सजा तय करते समय अपराधी की परिस्थितियों और आनुपातिकता के सिद्धांत को ध्यान में रखना जरूरी है।

मंगलवार को फैसला सुनाते हुए जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच ने कहा कि सजा केवल बदला लेने या दंड देने की भावना से तय नहीं की जा सकती। कोर्ट को मामले के तथ्यों और आरोपी की पृष्ठभूमि को भी देखना चाहिए।

सजा में आनुपातिकता का सिद्धांत जरूरी

अदालत ने स्पष्ट किया कि सजा तय करते समय अपराध की गंभीरता और उससे जुड़ी परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाना जरूरी होता है। इसके लिए आरोपी की भूमिका, वह कितने समय तक जेल में रहा है, मामला कितना पुराना है और उसे राहत देने वाले अन्य कारकों पर विचार किया जाना चाहिए। बेंच के मुताबिक, सजा की पूरी प्रक्रिया का मुख्य केंद्र आनुपातिकता का सिद्धांत होना चाहिए, न कि केवल कठोर दंडात्मक कार्रवाई।

मामले के तथ्य और राहत के आधार

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इस मामले में कोर्ट ने आरोपी को राहत देते हुए कई महत्वपूर्ण पहलुओं को रेखांकित किया। यह घटना साल 2014 की है, जिसका अर्थ है कि आरोपी पिछले 10 साल से भी अधिक समय से अदालती कार्यवाही का सामना कर रहा है। इसके अलावा, ऐसा कोई रिकॉर्ड या सबूत पेश नहीं किया गया जिससे पता चले कि आरोपी आदतन अपराधी है या इस घटना से पहले या बाद में किसी अन्य आपराधिक गतिविधि में शामिल रहा है।

कोर्ट ने यह भी पाया कि यह मामला किसी संगठित अपराध, बड़े पैमाने पर आर्थिक धोखाधड़ी, सरकारी संस्थानों को निशाना बनाकर की गई व्यवस्थित जालसाजी या किसी बड़े वित्तीय नुकसान से जुड़ा नहीं था। इन सभी तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि आरोपी के लिए दो साल से अधिक की जेल की सजा पर्याप्त है और उसकी शेष सजा को पहले से काटी गई अवधि में बदल दिया।

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अदालती दस्तावेजों की पवित्रता सर्वोपरि

भले ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आरोपी की सजा कम कर दी हो, लेकिन अदालत ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि न्यायिक प्रक्रिया में जालसाजी को कतई हल्के में नहीं लिया जाएगा। बेंच ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 467 (जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी) और 471 (फर्जी दस्तावेज का असली के रूप में इस्तेमाल) के प्रावधान सरकारी और कानूनी दस्तावेजों की प्रामाणिकता और पवित्रता बनाए रखने के लिए ही बनाए गए हैं। अदालत के सामने फर्जी दस्तावेज पेश करना सीधे तौर पर इन कानूनी मानकों को कमजोर करता है।

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