‘जज को स्फिंक्स की तरह मूकदर्शक नहीं बैठना चाहिए’; बिना उठाए गए मुद्दों पर अचानक प्रतिकूल फैसले देकर पक्षकारों को चौंकाया नहीं जा सकता: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि निचली अदालतों को मुकदमों के दौरान केवल मूक दर्शक बनकर नहीं बैठना चाहिए और न ही पक्षकारों पर ऐसे मुद्दों पर अचानक प्रतिकूल फैसले थोपने चाहिए जो मामले में विवादित ही नहीं थे। जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस आर. पूर्णिमा की पीठ ने एक प्रॉमिसरी नोट (वचन पत्र) के आधार पर धन वसूली के मुकदमे को खारिज करने वाले निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कार्यवाही के दौरान यदि जज के मन में कोई संदेह हो, तो उसे शांत रहने के बजाय कानूनन स्पष्टीकरण मांगने का पूरा अधिकार और कर्तव्य है। इसके अतिरिक्त, अदालत ने स्पष्ट किया कि इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 269एसएस के उल्लंघन में नकद कर्ज देने मात्र से वह मूल लेनदेन अवैध, अमान्य या शून्य नहीं हो जाता; ऐसे उल्लंघनों के लिए केवल टैक्स कानूनों के तहत स्वतंत्र रूप से वित्तीय जुर्माना लगाया जा सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता और वादी, पी. पलानीकुमार ने प्रतिवादी आर. सेल्वी को उनके पारिवारिक खर्चों और अन्य कर्जों को चुकाने के लिए 5 जून 2015 को 25,00,000 रुपये का नकद ऋण दिया था। पैसे मिलने पर प्रतिवादी ने उसी दिन एक प्रॉमिसरी नोट (Ex.A1) निष्पादित किया, जिसमें उन्होंने 12% वार्षिक ब्याज के साथ राशि चुकाने की सहमति दी थी। सुरक्षा के रूप में प्रतिवादी ने अपनी संपत्ति का मूल बिक्री विलेख (सेल डीड – Ex.A2) भी वादी के पास जमा कराया था।

जब प्रतिवादी ने मूल धन या ब्याज नहीं चुकाया, तो वादी ने 19 जून 2017 को एक कानूनी नोटिस (Ex.A3) भेजा। प्रतिवादी ने 3 जुलाई 2017 को इसका जवाब (Ex.A4) तो दिया, लेकिन भुगतान नहीं किया। इसके बाद वादी ने मदुरै के चतुर्थ अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के समक्ष रिकवरी सूट (O.S.No. 143 of 2017) दायर कर ब्याज सहित कुल 31,54,167 रुपये की मांग की।

निचली अदालत की कार्यवाही के दौरान प्रतिवादी ने न तो कोई लिखित बयान दर्ज किया, न ही वादी से जिरह की और न ही कोई सबूत पेश किया। मुकदमा पूरी तरह से निर्विरोध होने के बावजूद, निचली अदालत ने 28 जून 2018 को इसे खारिज कर दिया। निचली अदालत के जज ने खुद ही तीन मुद्दे तय कर दिए—जैसे वादी की आय का स्रोत, इतनी बड़ी रकम नकद देने का तरीका, और उपलब्ध सर्वोत्तम सबूतों के साथ प्रॉमिसरी नोट का निष्पादन। अंततः जज ने इन तीनों मुद्दों को वादी के खिलाफ तय करते हुए मुकदमा खारिज कर दिया।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता (वादी) ने तर्क दिया कि निचली अदालत द्वारा मुकदमे को खारिज करना पूरी तरह से अनुचित था, खासकर तब जब प्रतिवादी लिखित बयान दर्ज करने या जिरह करने में विफल रही थी। उन्होंने तर्क दिया कि निचली अदालत ने वादी की वित्तीय क्षमता को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया, जबकि प्रतिवादी ने इस पर कभी सक्रिय रूप से आपत्ति नहीं जताई थी। इसके अलावा, निचली अदालत प्रतिवादी द्वारा अपने जवाब नोटिस में की गई स्वीकारोक्ति को समझने में पूरी तरह विफल रही।

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दूसरी ओर, प्रतिवादी के वकील ने दलील दी कि निचली अदालत के जज ने जिम्मेदारी से काम किया और यांत्रिक तरीके से मामला न निपटाने के लिए उनकी सराहना होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले माया देवी बनाम लालता प्रसाद (2015) का हवाला देते हुए प्रतिवादी ने तर्क दिया कि प्रतिवादी की अनुपस्थिति मात्र से वादी अपने आप डिक्री (फैसले) का हकदार नहीं हो जाता, और अदालतों को दावों की सच्चाई से खुद संतुष्ट होना चाहिए।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों के आधार पर मामले का विस्तृत विश्लेषण किया:

1. जज की सक्रिय भूमिका और न्यायिक हस्तक्षेप अदालत ने पाया कि मुकदमे के दौरान निचली अदालत के जज ने वादी की वित्तीय क्षमता के बारे में अपने संदेहों को दूर करने के लिए एक भी सवाल नहीं पूछा। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 और नागरिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 10 नियम 2 का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि जज के पास स्पष्टीकरण मांगने के व्यापक अधिकार थे, लेकिन उन्होंने इसका उपयोग नहीं किया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“न्यायाधीश को स्फिंक्स की तरह मूकदर्शक नहीं बैठना चाहिए। उन्हें वकीलों के साथ संवाद करना चाहिए। अपने मन के संदेहों को दूर करने के लिए गवाहों से सवाल पूछने चाहिए।”

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि अनसुने या बिना उठाए गए मुद्दों पर अचानक प्रतिकूल फैसले देकर पक्षकारों को चौंकाया नहीं जाना चाहिए:

“हमारी न्याय प्रणाली अपनी सारी बातें मेज पर साफ रखने की वकालत करती है। जज के पास छिपाकर रखा हुआ कोई गुप्त पत्ता नहीं होना चाहिए। फैसले का अंतिम परिणाम अप्रत्याशित हो सकता है, लेकिन उसका आधार ऐसा नहीं होना चाहिए।”

इसके अलावा, अदालत ने रेखांकित किया कि सीपीसी के आदेश 10 नियम 3 के तहत किसी भी मौखिक परीक्षा का सार तुरंत लिखित रूप में दर्ज किया जाना अनिवार्य है, जिसे इस मामले में पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया।

2. दलीलों और स्वीकारोक्ति का सिद्धांत अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि प्रतिवादी लिखित बयान दर्ज करने में विफल रही थी, इसलिए वह कोई सबूत भी पेश नहीं कर सकती थी, जैसा कि सिद्दीक मोहम्मद शाह बनाम सरन (1929) और मंजुषा बनाम यूनाइटेड इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2025) के मामलों में स्थापित किया गया है। हालांकि, वह जिरह के जरिए कार्यवाही में भाग ले सकती थी, लेकिन उसने ऐसा भी नहीं किया।

सीपीसी के आदेश 8 नियम 5 के तहत तथ्यों को न नकारने के नियम (नॉन-ट्रेवर्स) को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने प्रतिवादी के जवाब नोटिस (Ex.A4) का विश्लेषण किया। इस नोटिस में केवल यह दावा किया गया था कि वादी किसी तीसरे पक्ष (शांतनाकृष्णन) का मुखौटा मात्र है, लेकिन उसने पैसे मिलने या प्रॉमिसरी नोट पर अपने हस्ताक्षर से इनकार नहीं किया था। कर्नाटक हाईकोर्ट के एम. जीतेंद्र गांधी बनाम हुथप्पा (1999) के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि वादी का निर्विरोध बयान ही प्रॉमिसरी नोट के निष्पादन और राशि की प्राप्ति को साबित करने के लिए पर्याप्त था।

3. नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत धारणा चूंकि यह मामला प्रॉमिसरी नोट पर आधारित था, इसलिए नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 118 के तहत लेन-देन की कानूनी धारणा लागू होती है। कुप्पय्यम्माल बनाम ए. सितेस्वरन (2011) का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस धारणा को खारिज करने का प्राथमिक भार प्रतिवादी पर था। चूंकि वह अदालत में गवाही देने या सबूत पेश करने में विफल रही, इसलिए वह इस जिम्मेदारी को निभाने में असफल रही।

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4. इनकम टैक्स कानून का उल्लंघन और कर्ज की वैधता निचली अदालत की इस आपत्ति पर कि 25,00,000 रुपये का कर्ज पूरी तरह से नकद देकर आयकर अधिनियम की धारा 269एसएस का उल्लंघन किया गया है, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के उल्लंघन से मूल लेनदेन अवैध नहीं हो जाता। आर. सिंगारावेलन बनाम दुरई सेंथिल (2024) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि आयकर रिटर्न में किसी लेनदेन को न दिखाने मात्र से वह लेनदेन अवास्तविक नहीं हो जाता।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय संजबीज तरी बनाम किशोर एस. बोरकर (2025) का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने उसके महत्वपूर्ण निष्कर्ष को उद्धृत किया:

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“यह अदालत मानती है कि आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 269एसएस के किसी भी उल्लंघन पर केवल उसी अधिनियम की धारा 271डी के तहत जुर्माना लगाया जा सकता है। इसके अलावा, न तो धारा 269एसएस और न ही धारा 271डी में यह कहा गया है कि इनके उल्लंघन में किया गया कोई भी लेनदेन अवैध, अमान्य या शून्य हो जाएगा।”

नतीजतन, अदालत ने माना कि 20,000 रुपये से अधिक के नकद लेनदेन को केवल टैक्स नियमों के उल्लंघन के आधार पर दीवानी कानून के तहत अप्रवर्तनीय या शून्य नहीं माना जा सकता।

5. संपत्ति के दस्तावेजों का कब्ज़ा और गवाहों की आवश्यकता अदालत ने पाया कि प्रतिवादी की मूल सेल डीड (Ex.A2) वादी के पास थी, और प्रतिवादी के पास इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं था कि ये दस्तावेज वादी के पास कैसे पहुंचे। इसके अलावा, ईश्वरी अम्मल बनाम वल्लीमायिल (2021) और रानी बनाम आरोकियामल (2014) का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रॉमिसरी नोट के लिए कानूनन किसी गवाह की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए गवाह का परीक्षण न किया जाना कोई मायने नहीं रखता।

अदालत का निर्णय

निचली अदालत के दृष्टिकोण को “पूरी तरह से असंतोषजनक” और उसके कारणों को “अमान्य” पाते हुए हाईकोर्ट ने विवादित फैसले और डिक्री को रद्द कर दिया। अपील को स्वीकार करते हुए वादी के पक्ष में डिक्री जारी की गई। अदालत ने यह भी जोड़ा कि प्रतिवादी द्वारा डिक्री की राशि चुकाए जाने के बाद, वह निचली अदालत से अपने मूल दस्तावेज (Ex.A2) वापस पाने के लिए आवेदन करने की हकदार होगी। इस मामले में कोई अदालती खर्च नहीं लगाया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: पी. पलानीकुमार बनाम आर. सेल्वी
वाद संख्या: ए.एस.(एमडी) संख्या 162/2018
पीठ: जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस आर. पूर्णिमा
निर्णय की तिथि: 04.06.2026

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