सुप्रीम कोर्ट: वाणिज्यिक मात्रा वाले NDPS मामलों में धारा 37 की दोहरी शर्तों पर विचार अनिवार्य; ड्रग तस्करी आरोपी को दी गई जमानत रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा एक ड्रग तस्करी मामले में आरोपी को दी गई नियमित जमानत रद्द करते हुए कहा है कि वाणिज्यिक मात्रा (Commercial Quantity) से जुड़े NDPS मामलों में धारा 37 के तहत निर्धारित दोहरी शर्तों पर विचार किए बिना जमानत नहीं दी जा सकती। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमाइकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने पंजाब सरकार की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 10 जनवरी 2024 को दर्ज एफआईआर संख्या 06 से संबंधित है, जिसमें NDPS अधिनियम की धारा 21(सी), 29, 61 और 85 के तहत आरोप लगाए गए थे। अभियोजन के अनुसार, पुलिस ने गांव वीराम के पास नहर रोड पर एक चेकपोस्ट स्थापित की हुई थी। इसी दौरान एक महिंद्रा एक्सयूवी 300 वाहन पुलिस को देखकर भागने का प्रयास करने लगा, लेकिन कुछ दूरी पर बंद होकर रुक गया। वाहन में सवार दो व्यक्तियों से पूछताछ की गई।

पुलिस को संदेह होने पर NDPS अधिनियम की धारा 50 के प्रावधानों का पालन करते हुए तलाशी ली गई। तलाशी के दौरान दोनों व्यक्तियों के कब्जे से 1.465 किलोग्राम हेरोइन बरामद हुई। बरामद पदार्थ को जब्त किया गया और बाद में फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट में इसकी पुष्टि डायएसिटाइलमॉर्फीन (हेरोइन) के रूप में हुई।

जिस आरोपी को जमानत दी गई थी, वह घटनास्थल पर मौजूद नहीं था। जांच के दौरान सह-आरोपियों ने कथित रूप से खुलासा किया कि उन्होंने यह हेरोइन उसके निर्देश पर प्राप्त की थी, जबकि वह उस समय गोइंदवाल साहिब केंद्रीय जेल में बंद था। जांच में यह भी आरोप लगाया गया कि वह जेल के भीतर से अवैध मोबाइल फोन का उपयोग कर ड्रग तस्करी नेटवर्क संचालित कर रहा था।

हाईकोर्ट से मिली थी जमानत

तरणतारन की विशेष अदालत ने 3 जुलाई 2025 को आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उसने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया।

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15 अक्टूबर 2025 को हाईकोर्ट ने उसे जमानत दे दी। हाईकोर्ट ने कहा था कि केवल आपराधिक पूर्ववृत्त (Antecedents) जमानत से इनकार का आधार नहीं हो सकते। अदालत ने हिरासत की अवधि और मुकदमे के शीघ्र समाप्त होने की संभावना न होने को भी ध्यान में रखा था।

इसके विरुद्ध पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

सुप्रीम कोर्ट में पक्षों की दलीलें

राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि हाईकोर्ट ने NDPS अधिनियम की धारा 37 के तहत लगाए गए वैधानिक प्रतिबंधों की अनदेखी की। चूंकि मामला वाणिज्यिक मात्रा की हेरोइन से संबंधित है, इसलिए आरोपी को जमानत नहीं दी जानी चाहिए थी। यह भी कहा गया कि आरोपी के खिलाफ इसी प्रकार के अपराधों से जुड़े तीन आपराधिक मामले पहले से लंबित हैं।

वहीं आरोपी की ओर से तर्क दिया गया कि उसका एफआईआर में नाम नहीं था और उससे कोई बरामदगी भी नहीं हुई। उसे झूठा फंसाया गया है। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि वह लगभग एक वर्ष सात माह से जेल में है, जांच पूरी हो चुकी है और 24 अभियोजन गवाहों में से केवल दो की ही गवाही दर्ज हुई है, इसलिए मुकदमे के शीघ्र समाप्त होने की संभावना नहीं है।

धारा 37 की शर्तों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मुख्य प्रश्न यह है कि क्या हाईकोर्ट का आदेश NDPS अधिनियम की धारा 37 से संबंधित स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप था।

अदालत ने धारा 37 और पूर्व के फैसलों का उल्लेख करते हुए दोहराया कि वाणिज्यिक मात्रा वाले मामलों में जमानत देने से पहले अदालत को यह संतुष्ट होना आवश्यक है कि आरोपी प्रथम दृष्टया दोषी नहीं है और जमानत पर रिहा होने के बाद वह कोई अपराध करने की संभावना नहीं रखता।

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स्टेट ऑफ मेघालय बनाम लालरिंटलुआंगा सैलो मामले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“NDPS अधिनियम की धारा 37(1)(बी)(ii) और इस विषय पर दिए गए पूर्व निर्णय स्पष्ट करते हैं कि NDPS मामलों में जमानत याचिका पर विचार करते समय धारा 37 के अनिवार्य प्रावधानों की अनदेखी करते हुए उदार दृष्टिकोण अपनाना स्वीकार्य नहीं है। धारा 37 के तहत आवश्यक निष्कर्ष दर्ज करना जमानत देने की पूर्व शर्त है और ऐसे आवेदनों पर आदेश पारित करते समय इससे बचा नहीं जा सकता।”

पीठ ने पाया कि वर्तमान मामला निर्विवाद रूप से वाणिज्यिक मात्रा की हेरोइन से संबंधित है, लेकिन हाईकोर्ट के आदेश में धारा 37 की दोहरी शर्तों पर कोई विचार नहीं किया गया था।

अदालत ने कहा:

“विवादित आदेश का सामान्य अवलोकन ही यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि हाईकोर्ट ने दोहरी शर्तों पर बिल्कुल भी विचार नहीं किया। ऐसी स्थिति में यह आदेश कानून की दृष्टि में टिक नहीं सकता।”

आपराधिक पूर्ववृत्त और हिरासत की अवधि पर विचार

सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं भी धारा 37 की कसौटी पर आरोपी के मामले का परीक्षण किया और पाया कि जमानत का कोई आधार नहीं बनता।

अदालत ने कहा कि आरोपी के खिलाफ NDPS अधिनियम के तहत समान प्रकृति के अपराधों के पूर्ववृत्त मौजूद हैं। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि जमानत मिलने पर वह दोबारा ऐसा अपराध नहीं करेगा।

हिरासत की अवधि के संबंध में अदालत ने कहा कि आरोपी केवल एक वर्ष सात माह जेल में रहा है, जबकि दोषसिद्धि की स्थिति में उसे अधिकतम बीस वर्ष तक की सजा हो सकती है। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि उसने इतनी लंबी अवधि तक कारावास भुगता है कि अनुच्छेद 21 के आधार पर उसे जमानत दी जाए।

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लंबी हिरासत और जमानत पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने यह भी कहा कि विभिन्न मामलों में लंबी हिरासत के आधार पर जमानत देने के संबंध में एकरूपता नहीं दिखाई देती है। अदालत ने नोट किया कि हाल ही में तस्लीम अहमद बनाम दिल्ली सरकार मामले में यह प्रश्न विचारार्थ भेजा गया है कि विशेष कानूनों के तहत जमानत मामलों में अनुच्छेद 21, लंबी हिरासत और वैधानिक प्रतिबंधों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।

हालांकि, इस मामले में अदालत ने उस प्रश्न पर विस्तृत टिप्पणी करने से परहेज किया और कहा कि न्याय का हित सर्वोपरि है। अदालत ने यह भी कहा कि जब देश की संप्रभुता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच टकराव हो, विशेष रूप से ड्रग तस्करी जैसे मामलों में, तो राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार की अपील स्वीकार करते हुए 15 अक्टूबर 2025 का पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का जमानत आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि धारा 37 की अनिवार्य शर्तों पर विचार किए बिना जमानत दी गई थी और मामले के तथ्यों के आधार पर आरोपी जमानत का हकदार नहीं था।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: स्टेट ऑफ पंजाब बनाम बलराज सिंह उर्फ बिल्ला

वाद संख्या: एसएलपी (आपराधिक) संख्या 896 वर्ष 2026 से उत्पन्न आपराधिक अपील

पीठ: जस्टिस संजय करोल एवं जस्टिस नोंगमाइकापम कोटिस्वर सिंह

निर्णय की तिथि: 2 जून 2026

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