केवल संन्यास लेने के आधार पर संन्यासी के भूमि मुआवज़े के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई व्यक्ति स्वयं को संन्यासी बताता है, केवल इस आधार पर उसके भूमि या मुआवजे के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि, अदालत ने एक आवेदक द्वारा दायर विविध आवेदन को खारिज करते हुए कहा कि उसकी शिकायत का निवारण वर्षों पहले हो चुका है, इसके बावजूद वह लगातार एक ही विषय पर मुकदमेबाजी कर रहा है। यह फैसला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने दिया।

विवाद की पृष्ठभूमि

मामला उस भूमि से जुड़ा है, जिस पर वर्ष 2002 में ग्राम पंचायत द्वारा एक सार्वजनिक संपर्क मार्ग का निर्माण किया गया था। आवेदक का कहना था कि उसकी भूमि प्रभावित हुई और उसे उचित राहत नहीं मिली।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि आवेदक स्वयं को संन्यासी बताता है। हालांकि अदालत ने कहा कि इससे उसके कानूनी अधिकार समाप्त नहीं हो जाते।

अदालत ने कहा:

“भूमि और मुआवजे का दावा करने के उसके अधिकार को केवल इस आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वह स्वयं को संन्यासी बताता है।”

यह विवाद पहले भी कई बार अदालतों के समक्ष आ चुका था। आवेदक ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

2021 में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की थी विशेष अनुमति याचिका

जुलाई 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका खारिज करते हुए राज्य सरकार की उस दलील को रिकॉर्ड पर लिया था कि आवेदक को मुआवजे के अतिरिक्त वर्ष 2005 में ग्राम मलौली में 0.202 हेक्टेयर भूमि भी आवंटित की जा चुकी है। इसी आधार पर अदालत ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था।

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इसके बाद आवेदक ने उस आदेश को वापस लेने के लिए रिकॉल आवेदन दायर किया, जिसे सितंबर 2021 में खारिज कर दिया गया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख

बाद में आवेदक ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जिस भूमि आवंटन का उल्लेख किया गया था, वह उसे वास्तव में उपलब्ध नहीं कराई गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही अतिरिक्त मुआवजे के दावे को अस्वीकार कर चुका है। यदि किसी गलत बयान के आधार पर आदेश पारित हुआ है, तो उसके लिए उपयुक्त उपाय सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उपलब्ध है। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया।

इसके बाद भी जारी रही मुकदमेबाजी

हाईकोर्ट के आदेश के बाद आवेदक ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की, जिसे बाद में वापस ले लिया गया। इसके बाद उसने पुनर्विचार याचिका भी दाखिल की, लेकिन सितंबर 2024 में वह भी खारिज हो गई।

राज्य सरकार ने क्या बताया?

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष राज्य सरकार ने मुआवजे और भूमि आवंटन का पूरा ब्यौरा प्रस्तुत किया। रिकॉर्ड के अनुसार, जिस भूमि पर सड़क बनाई गई थी उसका क्षेत्रफल लगभग 11,000 वर्ग फुट था, जबकि उसके बदले आवेदक को लगभग 21,000 वर्ग फुट भूमि आवंटित की गई।

इसके अलावा उसे कुल ₹7,58,575 का मुआवजा भी दिया गया।

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अदालत के समक्ष प्रस्तुत विवरण के अनुसार:

  • वर्ष 2002 में आवेदक की भूमि पर सार्वजनिक संपर्क मार्ग का निर्माण किया गया।
  • 11 मार्च 2005 से 20 सितंबर 2023 के बीच कुल ₹7,58,575 का भुगतान विभिन्न किस्तों में किया गया।
  • 22 मार्च 2005 को बाराबंकी जिले के मलौली गांव में 0.202 हेक्टेयर कृषि भूमि आवंटित की गई।
  • आवेदक ने उस भूमि पर आश्रम और मंदिर का निर्माण किया।
  • वर्ष 2026 में किए गए आधिकारिक निरीक्षण में यह पाया गया कि आवेदक उक्त भूमि का पूर्ण स्वामित्व अधिकार के साथ उपयोग कर रहा है और वहां आश्रम एवं मंदिर संचालित कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

पीठ ने कहा कि राज्य सरकार ने भुगतान और भूमि आवंटन से संबंधित सभी विवरण रिकॉर्ड पर रख दिए हैं। अदालत ने यह भी नोट किया कि आवेदक ने स्वयं इस तथ्य से इनकार नहीं किया कि उसे भूमि का कब्जा दिया गया था और उसने वहां आश्रम का निर्माण भी किया है।

अदालत ने कहा कि भूमि आवंटन और मुआवजे से जुड़ा विवाद काफी पहले अंतिम रूप से तय हो चुका है। इसके बावजूद आवेदक लगातार नई-नई याचिकाएं दाखिल कर रहा है।

पीठ ने टिप्पणी की कि इस प्रकार की बार-बार की जा रही मुकदमेबाजी अदालत के बहुमूल्य समय की बर्बादी है। अदालत ने कहा कि यह मामला भारी लागत के साथ खारिज किया जा सकता था, लेकिन यह देखते हुए कि आवेदक स्वयं अपनी पैरवी कर रहा है और अब संन्यासी बन चुका है, उस पर लागत नहीं लगाई जा रही।

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अदालत का अंतिम फैसला

विविध आवेदन को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आवेदक की शिकायत का निवारण बहुत पहले हो चुका है और अब उसी विषय पर आगे मुकदमेबाजी की कोई आवश्यकता नहीं है।

अदालत ने कहा:

“वर्तमान विषय से संबंधित कोई भी मुकदमा भविष्य में किसी भी अदालत द्वारा स्वीकार नहीं किया जाएगा, क्योंकि आवेदक की शिकायत का समाधान बहुत पहले किया जा चुका है और इस न्यायालय द्वारा पूर्व में दिखाई गई उदारता के कारण वह एक आदतन वादी बन गया है।”

इन्हीं टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने आवेदन को बिना किसी लागत के खारिज कर दिया और लंबित सभी आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: सत्य नारायण शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य

वाद संख्या: विविध आवेदन संख्या 1666 वर्ष 2026

पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता एवं जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा

निर्णय की तिथि: 26 मई 2026

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