धारा 173(8) सीआरपीसी के तहत आगे की जांच के लिए मजिस्ट्रेट की पूर्व मंजूरी अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट ने व्यावसायिक विवाद में चार्जशीट रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक प्रक्रिया से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पुलिस के लिए दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच (further investigation) करने से पहले संबंधित मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति लेना एक अनिवार्य कानूनी आवश्यकता है। जस्तिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने पलानीसामी वीरराजा और अन्य द्वारा दायर अपील पर यह फैसला सुनाया। इसके साथ ही, कोर्ट ने बेंगलुरु के 10वें एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित एक दशक पुराने धोखाधड़ी और जालसाजी के मामले को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने दो बार क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने के बाद मजिस्ट्रेट से कोई स्पष्ट अनुमति लिए बिना ही तीसरी बार जांच शुरू कर दी थी, और यह भी निष्कर्ष निकाला कि दोनों व्यापारिक भागीदारों के बीच का यह विवाद पूरी तरह से दीवानी (सिविल) प्रकृति का था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद चार अपीलकर्ताओं—पलानीसामी वीरराजा, के. पलानीसामी, अम्माणी और आर. कविता—जो ‘मैसर्स के पी एक्सपोर्टर्स’ नामक फर्म में भागीदार हैं, और निजी शिकायतकर्ता (प्रतिवादी संख्या 2) के बीच का है। शिकायतकर्ता अमेरिका और कनाडा में भी इसी तरह का कपड़ा व्यापार चलाता था।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसने दोनों प्रबंध भागीदारों (आरोपी संख्या 1 और 2) के साथ उत्तर अमेरिकी बाजारों में उनके कारोबार का विस्तार करने के लिए एक व्यावसायिक समझौता किया था, जिसके बदले में उसे इस व्यवसाय से होने वाले मुनाफे का एक-तिहाई हिस्सा मिलना था। शिकायतकर्ता का दावा था कि उसने इस साझेदारी के तहत समय-समय पर निवेश किया और इलिनोइस (अमेरिका) में ‘मैसर्स एसोसिएटेड टेक्सटाइल इंक’ नाम से एक कंपनी भी बनाई। दूसरी तरफ, अपीलकर्ताओं का तर्क था कि उनके बीच ऐसा कोई संयुक्त उपक्रम (ज्वाइंट वेंचर) नहीं था, क्योंकि उन्होंने शिकायतकर्ता के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था जिसमें केवल उसे ही विशेष रूप से सामान की आपूर्ति करने की शर्त रखी गई थी।

साल 2001 में, शिकायतकर्ता ने इलिनोइस की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में एक मुकदमा दायर किया। इस अदालत ने 2 फरवरी 2004 को एकतरफा फैसला सुनाते हुए अपीलकर्ताओं के खिलाफ कुल 2,268,222.46 डॉलर का हर्जाना देने का आदेश दिया। इसके ठीक बाद, शिकायतकर्ता ने बेंगलुरु की सत्र अदालत में धारा 200 सीआरपीसी के तहत एक निजी शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर इंदिरा नगर पुलिस स्टेशन में साल 2006 में मामला दर्ज किया गया।

इस मामले की जांच का घटनाक्रम काफी लंबा और पेचीदा रहा है:

  • 9 अगस्त 2006: पुलिस ने मामले की जांच शुरू की।
  • 17 नवंबर 2006: पुलिस ने पहली क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की, जिसमें कहा गया कि यह विवाद पूरी तरह से सिविल प्रकृति का है।
  • 8 अक्टूबर 2007: मजिस्ट्रेट ने शिकायतकर्ता की ओर से धारा 173(8) सीआरपीसी के तहत आगे की जांच के आवेदन को खारिज कर दिया।
  • 31 मई 2010: सत्र न्यायालय ने शिकायतकर्ता की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए फिर से जांच के आदेश दिए।
  • 22 नवंबर 2011: पुलिस ने एक बार फिर यानी दूसरी बार क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की।
  • 25 फरवरी 2012: इंदिरा नगर के पुलिस इंस्पेक्टर ने तीसरी बार जांच जारी रखने के लिए धारा 173(8) सीआरपीसी के तहत आवेदन किया।
  • 25 सितंबर 2013: पुलिस ने मामले में चार्जशीट दाखिल की, हालांकि अपीलकर्ताओं का दावा था कि उन्हें मई 2022 तक इस बात की कोई जानकारी ही नहीं थी।
  • 5 नवंबर 2014: बेंगलुरु की दीवानी अदालत ने विदेशी अदालत के एकतरफा फैसले के आधार पर दायर शिकायतकर्ता के धन वसूली के दीवानी मुकदमे को भी खारिज कर दिया।
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साल 2022 में इस आपराधिक मामले की जानकारी मिलने पर, अपीलकर्ताओं ने इसे रद्द कराने के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सुश्री वी. मोहाना ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए मुख्य रूप से निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए:

  1. मामले में दो बार क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी गई थी जिससे स्पष्ट था कि विवाद सिविल प्रकृति का है। इसके बावजूद बिना किसी सक्षम न्यायिक प्राधिकारी की मंजूरी के तीसरी बार जांच शुरू की गई।
  2. इस मामले में धोखाधड़ी या जालसाजी की बुनियादी कानूनी शर्तें पूरी नहीं होती हैं।
  3. हाईकोर्ट ने केवल तकनीकी पहलुओं पर विचार किया और मामले के अन्य महत्वपूर्ण पक्षों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।
  4. अमेरिकी कोर्ट ने अपने फैसले में दस्तावेजों की जालसाजी को लेकर कोई स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज नहीं किया था।
  5. कथित लेनदेन 1996 से 2000 के बीच के थे, जबकि शिकायत काफी देरी से साल 2004 में दर्ज कराई गई, जिसका कोई ठोस कारण नहीं दिया गया।
  6. अपीलकर्ता संख्या 3 और 4 (अम्माणी और आर. कविता) की इस मामले में कोई विशेष भूमिका नहीं बताई गई है।

दूसरी ओर, कर्नाटक राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता श्री प्रतीक चड्ढा और शिकायतकर्ता के वरिष्ठ वकील श्री गौरव अग्रवाल ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा:

  1. शिकायतकर्ता द्वारा पैसे भेजे जाने की बात अपीलकर्ताओं ने स्वीकार की है, लेकिन उन्होंने समझौते के अनुसार मुनाफे का हिस्सा नहीं दिया।
  2. अमेरिकी कोर्ट ने शिकायतकर्ता के दावों को सही पाया था, जिसमें अनुबंध का उल्लंघन, धोखाधड़ी के इरादे से प्रेरित करना और अनुचित लाभ कमाना शामिल था।
  3. शिकायतकर्ता द्वारा नियुक्त हैंडराइटिंग एक्सपर्ट ने पुष्टि की कि अपीलकर्ताओं के 119 दस्तावेजों में से 28 पर शिकायतकर्ता के फर्जी हस्ताक्षर थे, जिससे उनका धोखाधड़ी का इरादा साफ होता है।
  4. धारा 173(8) सीआरपीसी जांच एजेंसियों को नया सबूत मिलने पर आगे की जांच करने से नहीं रोकती है।
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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दो मुख्य प्रश्न तय किए: पहला, क्या दो बार क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने के बाद मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना पुलिस तीसरी बार जांच शुरू कर सकती है? और दूसरा, क्या यह विवाद बुनियादी तौर पर सिविल प्रकृति का है?

पहले प्रश्न पर विचार करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि धारा 173(8) सीआरपीसी (और नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 193(9)) के मूल पाठ में सुनवाई शुरू होने से पहले मजिस्ट्रेट की अनुमति लेने का जिक्र स्पष्ट तौर पर नहीं है, लेकिन न्यायिक नजीरों ने इस आवश्यकता को अनिवार्य बना दिया है। विनय त्यागी बनाम इरशाद अली मामले का संदर्भ देते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“आगे की जांच करने और/या पूरक रिपोर्ट दाखिल करने के लिए अदालत की पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता को धारा 173(8) के प्रावधानों के तहत एक अनिवार्य निहितार्थ के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।”

अदालत ने जांच प्रक्रिया में जवाबदेही और समयबद्धता पर विशेष बल दिया। कोर्ट ने रॉबर्ट लालचुंगनुंगा चोंगथु बनाम बिहार राज्य के हालिया फैसले का उल्लेख करते हुए कहा:

“आपराधिक कानून की मशीनरी के सुचारू रूप से काम करने के लिए कारणों का होना बेहद जरूरी है। वे न्याय प्रणाली में निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही की आधारशिला हैं।”

पीठ ने अंतहीन समय तक चलने वाली जांच के खिलाफ चेतावनी देते हुए कहा:

“यदि किसी विशेष अपराध की जांच बिना किसी ठोस कारण के बहुत लंबी अवधि तक जारी रहती है, जैसा कि इस मामले में हुआ, तो आरोपी या शिकायतकर्ता दोनों को ही जांच की स्थिति जानने के लिए या हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर मामले को रद्द कराने के लिए धारा 528 बीएनएसएस/482 सीआरपीसी के तहत हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता होगी।”

मामले के रिकॉर्ड की जांच करने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यद्यपि पुलिस ने तीसरी बार जांच के लिए आवेदन किया था, लेकिन मजिस्ट्रेट द्वारा अनुमति देने का कोई आदेश रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं था। इसलिए कोर्ट ने शिकायतकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि ऐसी अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं थी।

दूसरे प्रश्न पर, दोनों पक्षों के व्यावसायिक संबंधों का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने कहा:

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“पक्षकारों के बीच का विवाद उनके व्यावसायिक संबंधों से जुड़ा है, यानी कि क्या उनके बीच कोई संयुक्त उपक्रम स्थापित हुआ था या नहीं और यदि हां, तो उससे होने वाले मुनाफे का बंटवारा कैसे हो। यह स्पष्ट रूप से एक दीवानी विवाद की प्रकृति का मामला है।”

जालसाजी के दावों पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने आश्चर्य व्यक्त किया कि अमेरिकी अदालत की कार्यवाही के दौरान शिकायतकर्ता ने ऐसे आरोप क्यों नहीं लगाए, जबकि वे दस्तावेज वहीं पेश किए गए थे। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट 1 सितंबर 2009 की है, जबकि विदेशी अदालत का फैसला 2 फरवरी 2004 को ही आ चुका था। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह केवल घटनाओं का समय या उनका क्रम है जो हमारी नजर में इस रिपोर्ट पर की गई निर्भरता को संदिग्ध बनाता है।”

कोर्ट का निर्णय

अदालत ने माना कि इस मामले में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:

“इस मामले की समग्र परिस्थितियों को देखते हुए, अपीलकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई कानून के अधिकार के विपरीत और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगी, क्योंकि तीसरी बार की गई आगे की जांच, जिसके परिणामस्वरूप चार्जशीट दाखिल की गई थी, उसे संबंधित मजिस्ट्रेट की मंजूरी प्राप्त नहीं थी।”

स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल मामले में स्थापित सिद्धांतों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और अपीलकर्ताओं के खिलाफ लंबित एफआईआर और सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।

मामले का शीर्षक: पलानीसामी वीरराजा और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य
वाद संख्या: वर्ष 2026 की आपराधिक अपील जो वर्ष 2024 की स्पेशल लीव पिटीशन क्रिमिनल संख्या 16149 से उत्पन्न हुई है
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 26 मई, 2026

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