केवल वही शिकायतें जिनमें विभागीय कार्रवाई की वास्तविक संभावना हो, वीआरएस खारिज करने के लिए ‘विचाराधीन कार्यवाही’ मानी जा सकती हैं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारी अब्दुर रहमान की अपील को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत उनकी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के नोटिस को खारिज कर दिया गया था। न्यायमुूर्ति पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमुूर्ति आलोक अराधे की खंडपीठ ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘ऑल इंडिया सर्विस (डेथ-कम-रिटायरमेंट बेनिफिट्स) रूल्स, 1958’ के नियम 16(2A) और DoPT के दिशा-निर्देशों के तहत, वीआरएस को अस्वीकार करने के लिए किसी शिकायत का केवल अस्तित्व में होना ही काफी नहीं है। जब तक किसी शिकायत पर विभागीय कार्रवाई शुरू करने का एक ठोस और सक्रिय इरादा न हो, तब तक उसे कानूनन “विचाराधीन कार्यवाही” (Contemplated Proceedings) नहीं माना जा सकता। खंडपीठ ने पाया कि केंद्र सरकार ने इस बारीक अंतर को समझे बिना और निष्क्रिय शिकायतों के आधार पर वीआरएस रोकने का निर्णय लिया, जो कि ‘मस्तिष्क का अनुचित इस्तेमाल न करने’ (Non-application of mind) का स्पष्ट उदाहरण है। कोर्ट ने गृह मंत्रालय (MoHA) को तीन महीने के भीतर इस आवेदन पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता अब्दुर रहमान महाराष्ट्र कैडर के 1997 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। वर्ष 2014 से 2019 के बीच उनके खिलाफ तीन शिकायतें दर्ज की गई थीं:

  1. पहली शिकायत (22 जुलाई 2014): तुकाराम भीमराव जाधव द्वारा दर्ज कराई गई, जिसमें अपीलकर्ता पर उनकी पत्नी को प्रताड़ित करने का आरोप था। इस पर कोई विभागीय कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी।
  2. दूसरी शिकायत (28 अप्रैल 2016): अपीलकर्ता के ससुर द्वारा दर्ज कराई गई, जिसमें पहली पत्नी की सहमति के बिना दूसरा विवाह करने और पहली पत्नी व बेटे को प्रताड़ित करने का आरोप था। इस शिकायत को शिकायतकर्ता द्वारा 22 सितंबर 2017 को औपचारिक रूप से वापस ले लिया गया था।
  3. तीसरी शिकायत (29 मार्च 2019): अपीलकर्ता द्वारा लिखित पुस्तक ‘डिनायल एंड डिप्राइवेशन’ (Denial and Deprivation) के विमोचन समारोह में दिए गए एक भाषण के बाद शुरू की गई थी, जिसमें अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 के नियम 6 और 7 के उल्लंघन का आरोप था।

इससे पहले दो बार वीआरएस के आवेदन वापस लेने या खारिज होने (जो बाद में बंद कर दिए गए थे) के बाद, अपीलकर्ता ने 1 अगस्त 2019 को नियम 16(2A) के तहत वीआरएस के लिए तीन महीने का नोटिस दिया।

16 अक्टूबर 2019 को महाराष्ट्र राज्य सरकार ने इन तीनों शिकायतों की समीक्षा की। यह देखते हुए कि इन मामलों में कोई आरोप पत्र (Chargesheet) जारी नहीं किया गया था और इनमें से किसी भी मामले में कोई बड़ा दंड (Major Penalty) मिलने की संभावना नहीं थी, राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से वीआरएस नोटिस को स्वीकार करने की सिफारिश की थी।

इसके बावजूद, 25 अक्टूबर 2019 को केंद्र सरकार ने इस आधार पर वीआरएस नामंजूर कर दिया कि अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही “लंबित या विचाराधीन” है, इसलिए उन्हें सतर्कता (Vigilance) की दृष्टि से मंजूरी नहीं दी जा सकती।

अपीलकर्ता ने इस अस्वीकृति को केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के समक्ष चुनौती दी। इस चुनौती के लंबित रहने के दौरान, राज्य सरकार ने अधिकारी के खिलाफ तीन औपचारिक आरोप पत्र जारी कर दिए:

  • पहला आरोप पत्र (17 जून 2020): दूसरे विवाह के संबंध में बड़े दंड के लिए।
  • दूसरा आरोप पत्र (6 अक्टूबर 2020): पुस्तक विमोचन भाषण के संबंध में (शुरुआत में छोटा दंड, बाद में इसे बड़े दंड में बदल दिया गया)।
  • तीसरा आरोप पत्र (24 अप्रैल 2022): ड्यूटी से अनुपस्थित रहने, सोशल मीडिया पर वीआरएस की जानकारी साझा करने और सीएए (CAA) विरोधी प्रदर्शनों में शामिल होने के संबंध में।
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कैट (CAT) ने 7 दिसंबर 2023 को अपीलकर्ता की याचिका खारिज कर दी और कहा कि बाद में जारी किए गए आरोप पत्र यह साबित करते हैं कि शिकायतें उस समय विचाराधीन थीं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी 23 जुलाई 2024 को इस फैसले पर मुहर लगाते हुए कहा कि केंद्र सरकार को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार है। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के तर्क

अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री हुज़ेफ़ा अहमदी ने निम्नलिखित दलीलें पेश कीं:

  1. प्रासंगिक तिथि पर कोई कानूनी विचार नहीं: 1 अगस्त 2019 (आवेदन की तिथि) या निर्णय की तिथि तक कोई औपचारिक आरोप पत्र जारी नहीं किया गया था। हरियाणा राज्य बनाम दिनेश सिंह मामले का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि केवल किसी शिकायत के लंबित रहने को कानूनी रूप से “विचाराधीन” नहीं माना जा सकता जब तक कि औपचारिक आरोप तय करने की दिशा में कोई ठोस कदम न उठाया गया हो।
  2. राज्य सरकार की सिफारिश का महत्व: DoPT गाइडलाइन 3(ii) के तहत, अनुशासनात्मक प्राधिकरण के रूप में राज्य सरकार ने स्पष्ट राय दी थी कि कोई बड़ा दंड अपेक्षित नहीं है और वीआरएस स्वीकार किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार इस राय को मनमाने ढंग से दरकिनार नहीं कर सकती थी।
  3. वैकल्पिक राहत: उन्होंने अदालत से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग करने का अनुरोध किया (जैसा कि अशोक कुमार साहू बनाम भारत संघ में किया गया था), ताकि चल रही विभागीय जांच के परिणामों के अधीन अधिकारी को वीआरएस की अनुमति दी जा सके।

प्रतिवादियों के तर्क

भारत संघ की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुश्री ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि:

  1. केंद्र सरकार की सर्वोच्चता: ‘ऑल इंडिया सर्विसेज (अनुशासन और अपील) नियम, 1969’ के तहत बर्खास्तगी या सेवा से हटाए जाने जैसे बड़े दंड केवल केंद्र सरकार द्वारा ही दिए जा सकते हैं। अतः केंद्र सरकार ही अंतिम अनुशासनात्मक प्राधिकरण है और वह राज्य की राय से बंधी नहीं है।
  2. ‘विचाराधीन’ शब्द का व्यापक दायरा: दिनेश सिंह मामले का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि औपचारिक आरोप पत्र दाखिल होने से पहले की पूरी अवधि “विचाराधीन” के दायरे में आती है, और 25 अक्टूबर 2019 को निर्णय के समय ये शिकायतें सक्रिय रूप से विचाराधीन थीं।
  3. निर्णय की तिथि का महत्व: सतर्कता की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए प्रासंगिक तिथि वीआरएस आवेदन की तिथि नहीं, बल्कि अस्वीकृति आदेश पारित होने की तिथि है।
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महाराष्ट्र राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे श्री श्रीरंग वर्मा ने केंद्र सरकार की दलीलों का समर्थन किया और स्पष्ट किया कि आरोप पत्र जारी करने में देरी गवाहों के बयान उपलब्ध न होने के कारण हुई थी।

न्यायालय का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने नियम 16(2A) और DoPT गाइडलाइन 3(ii) के ढांचे के भीतर मुख्य रूप से इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि “लंबित” और “विचाराधीन” कार्यवाही का वास्तविक अर्थ क्या है।

1. “लंबित” बनाम “विचाराधीन” कार्यवाही की कानूनी परिभाषा

न्यायमुूर्ति पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमुूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने इन दोनों शब्दों के बीच एक स्पष्ट कानूनी रेखा खींची:

  • लंबित कार्यवाही (Pending Proceedings): भारत संघ बनाम के.वी. जानकीरमन मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने पुष्टि की कि कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही केवल तभी लंबित मानी जाती है जब औपचारिक रूप से आरोप पत्र (Chargesheet) जारी कर दिया गया हो। चूंकि 25 अक्टूबर 2019 तक अपीलकर्ता को कोई आरोप पत्र नहीं दिया गया था, इसलिए तकनीकी रूप से उनके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक मामला लंबित नहीं था।
  • विचाराधीन कार्यवाही (Contemplated Proceedings): ‘विचाराधीन’ शब्द को परिभाषित करने के लिए कोर्ट ने हरियाणा राज्य बनाम दिनेश सिंह और उत्तर प्रदेश राज्य बनाम जय सिंह दीक्षित के फैसलों पर भरोसा करते हुए कहा:

“वर्तमान संदर्भ में ‘विचाराधीन’ होने का अर्थ केवल किसी शिकायत के अस्तित्व में होना नहीं है, बल्कि उस शिकायत पर कार्रवाई करने के एक सुविचारित और सक्रिय इरादे से है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनी रूप से ‘विचाराधीन’ की श्रेणी में आने के लिए इस बात की ठोस संभावना या आकस्मिकता होनी चाहिए कि शिकायत के बाद औपचारिक विभागीय कार्यवाही शुरू की जाएगी।

2. तथ्यों पर कानूनी कसौटी का अनुप्रयोग

सुप्रीम कोर्ट ने 25 अक्टूबर 2019 की स्थिति के अनुसार तीनों शिकायतों का मूल्यांकन किया:

  • पहली शिकायत (2014): पांच वर्षों तक इस पर राज्य द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई थी। इसलिए यह विचाराधीनता की श्रेणी में नहीं आती।
  • दूसरी शिकायत (2016): यह शिकायत वीआरएस के निर्णय से दो साल पहले ही (सितंबर 2017 में) वापस ले ली गई थी। कोर्ट ने कहा कि इसे किसी भी सूरत में “विचाराधीन” नहीं माना जा सकता था।
  • तीसरी शिकायत (2019): केवल यही एक शिकायत थी जो सक्रिय विचार के अधीन थी, क्योंकि पुलिस महानिदेशक, मुंबई से इस संबंध में जांच रिपोर्ट और ड्राफ्ट आरोप पत्र की प्रतीक्षा की जा रही थी।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि केंद्र सरकार ने निष्क्रिय, पुरानी और वापस ली जा चुकी शिकायतों को एक साथ मिलाकर वीआरएस रोकने का जो निर्णय लिया, वह “मस्तिष्क का इस्तेमाल न करने” (non-application of mind) की कमी को दर्शाता है। इसके अलावा, केंद्र सरकार ने राज्य सरकार की इस महत्वपूर्ण राय पर भी कोई ध्यान नहीं दिया कि तीसरी शिकायत में कोई बड़ा दंड मिलने की संभावना नहीं है।

3. केंद्र की शक्तियां और राज्य की राय का महत्व

अदालत ने स्पष्ट किया कि 1988 के संशोधन के बाद वीआरएस स्वीकार करने का अंतिम अधिकार केंद्र सरकार के पास ही है और वह राज्य सरकार की सिफारिशों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। अशोक कुमार साहू मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा:

“वीआरएस के अनुरोध पर निर्णय लेते समय केंद्र सरकार के पास ही अंतिम शब्द होता है… और ऐसा करते समय वह राज्य सरकार की सिफारिशों से बंधी नहीं होती है।”

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हालांकि, पीठ ने जोड़ा कि यह विवेकाधीन अधिकार असीमित नहीं है। केंद्र सरकार मनमाने ढंग से या रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के विपरीत राय नहीं बना सकती। राज्य सरकार की राय का अपना एक महत्व होता है क्योंकि अधिकारी सीधे उनके प्रशासनिक नियंत्रण में काम करता है।

4. अनुशासनात्मक कार्यवाही में अकारण और अनुचित देरी

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा विभागीय जांच में की गई अत्यधिक देरी पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने पाया कि हालांकि आरोप पत्र 2020 और 2022 में जारी किए गए थे, लेकिन जांच अधिकारियों की नियुक्ति 2024 तक नहीं की गई। अपीलकर्ता को प्रारंभिक सुनवाई के सम्मन क्रमशः 2025 और 2026 में मिले।

आंध्र प्रदेश राज्य बनाम एन. राधाकृष्णन का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि बिना किसी उचित कारण के जांच को लंबे समय तक खींचना कर्मचारी के अधिकारों और मानसिक शांति के खिलाफ है। अदालत ने टिप्पणी की:

“जांच की कछुआ चाल और उसे अकारण लंबित रखना प्रशासनिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। इस अत्यधिक देरी को वीआरएस के नए सिरे से मूल्यांकन में एक महत्वपूर्ण कारक माना जाना चाहिए।”

न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के 23 जुलाई 2024 के फैसले और केंद्र सरकार के 25 अक्टूबर 2019 के अस्वीकृति आदेश को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह मामला विभागीय जांच से जुड़ा है, इसलिए वे सीधे अनुच्छेद 142 के तहत सेवानिवृत्ति के आदेश जारी नहीं करेंगे। इसके बजाय, कोर्ट ने गृह मंत्रालय (MoHA) को निम्नलिखित निर्देश जारी किए हैं:

  1. अपीलकर्ता के वीआरएस नोटिस पर नए सिरे से और निष्पक्षता से विचार किया जाए।
  2. इस तथ्य को ध्यान में रखा जाए कि प्रासंगिक तिथि (25 अक्टूबर 2019) को केवल एक ही शिकायत कानूनी रूप से “विचाराधीन” थी और पहले लिए गए निर्णय में गंभीर तथ्यात्मक त्रुटियां थीं।
  3. जांच प्रक्रियाओं में राज्य सरकार द्वारा की गई “असाधारण और अनुचित देरी” को निर्णय लेते समय ध्यान में रखा जाए।
  4. गृह मंत्रालय तीन महीने के भीतर इस संबंध में एक सुविचारित और तर्कसंगत आदेश पारित करे।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि अपीलकर्ता नए निर्णय से संतुष्ट नहीं होते हैं, तो वे कैट (CAT) सहित कानून के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी उपचारों का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र रहेंगे।

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक: अब्दुर रहमान बनाम भारत संघ और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या _ / 2026 (एसएलपी (सी) संख्या 21390/2024 से उत्पन्न)
  • पीठ: न्यायमूर्ति पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा, न्यायमूर्ति आलोक अराधे
  • निर्णय की तिथि: 26 मई, 2026

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