सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य (National Chambal Gharial Sanctuary) के संवेदनशील क्षेत्र में चल रहे अवैध खनन पर राजस्थान सरकार के रवैये को लेकर बेहद तल्ख टिप्पणी की है। अदालत ने राज्य सरकार की “उदासीन प्रशासनिक प्रवृत्ति” पर गहरा रोष व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसा लगता है जैसे प्रशासनिक अमला केवल न्यायिक दबाव और सख्ती के बाद ही नींद से जागता है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मंगलवार को इस मामले की स्वतः संज्ञान (suo moto) सुनवाई के दौरान यह तीखी फटकार लगाई। अदालत ने इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की कि राजस्थान की प्रशासनिक मशीनरी ने इस पर्यावरणीय संकट पर तब कदम बढ़ाए, जब अदालत ने राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने की चेतावनी दी।
न्यायिक सख्ती बनाम जिम्मेदार शासन
शीर्ष अदालत ने इस साल मार्च में चंबल क्षेत्र में धड़ल्ले से चल रहे अवैध खनन की मीडिया रिपोर्टों पर स्वतः संज्ञान लिया था। इस मामले में अदालत ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के साथ-साथ राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारों को पक्षकार बनाया था।
सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार ने अपने गृह, वित्त, वन, परिवहन और खान विभागों के माध्यम से कोर्ट में पास अलग-अलग अनुपालन हलफनामे (compliance affidavits) दाखिल किए। इनमें बताया गया कि अवैध खनन की निगरानी के लिए हाई-टेक आईटी सिस्टम, 118 सीसीटीवी कैमरों और अतिरिक्त गश्ती वाहनों के लिए ₹65 करोड़ से अधिक का बजट मंजूर किया गया है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इन योजनाओं के क्रियान्वयन की समय-सीमा से संतुष्ट नहीं हुआ। राज्य सरकार ने इन व्यवस्थाओं को पूरा करने के लिए 18 से 36 महीने का समय मांगा था, जिसे कोर्ट ने पूरी तरह से खारिज कर दिया।
पीठ ने कहा, “हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि राज्य द्वारा प्रस्तावित 18 से 36 महीने की समय-सीमा चंबल क्षेत्र में बने गंभीर पर्यावरणीय आपातकाल के अनुकूल नहीं है। ऐसे संकट के समय में तत्काल और निर्णायक कदम उठाने की जरूरत होती है।”
अदालत ने आगे जोड़ा कि निगरानी तंत्र, अंतर-विभागीय तालमेल और जब्ती नियमों जैसे महत्वपूर्ण फैसले केवल तभी लिए गए जब कोर्ट का रुख सख्त और दंडात्मक होने लगा। यह स्थिति दर्शाती है कि शासन स्वतः अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के बजाय केवल अदालती आदेशों के दबाव में काम कर रहा है।
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से तुलना: राजस्थान का रवैया “सुस्त”
यह पहला मौका नहीं है जब शीर्ष अदालत ने राजस्थान सरकार की सुस्ती पर नाराजगी जताई है। इससे ठीक 12 दिन पहले, यानी 12 मई को हुई सुनवाई में कोर्ट ने राजस्थान के ढुलमुल रवैये की तुलना पड़ोसी राज्यों मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से की थी, जिन्होंने इस मामले में पहले ही सक्रिय कदम उठा लिए थे।
पिछली सुनवाई में अदालत ने बेहद कड़े शब्दों में कहा था कि बार-बार निर्देश देने के बावजूद राजस्थान सरकार ने कोई हलफनामा तक दर्ज नहीं किया था। तब बेंच ने राज्य के रवैये को “लापरवाह, उदासीन और सुस्त” करार दिया था, जिसके कारण राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य जैसे संरक्षित वन्यजीव आवासों को अपूर्णीय पर्यावरणीय क्षति पहुंच रही है।
इसके अलावा, पिछले महीने ही सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार के उस विवादित फैसले पर रोक लगा दी थी, जिसमें चंबल घड़ियाल अभयारण्य के करीब 732 हेक्टेयर क्षेत्र को डी-नोटीफाई (संरक्षित सूची से बाहर) करने की कोशिश की जा रही थी।
वन विभाग में रिक्तियां भरने के निर्देश और जमीनी कार्रवाई के आंकड़े
पर्यावरणीय तबाही को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान तीनों राज्यों को निर्देश दिया है कि वे अपने-अपने वन विभागों में जमीनी स्तर पर सुरक्षाकर्मियों की कमी को दूर करें। कोर्ट ने सभी खाली पदों को एक वर्ष के भीतर भरने का आदेश दिया है।
चंबल से सटे राजस्थान के जिलों में अवैध खनन का जाल कितना गहरा है, इसका अंदाजा राज्य सरकार द्वारा कोर्ट में पेश किए गए साल 2023 से अब तक के इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है:
- धौलपुर: 730 एफआईआर दर्ज, 725 आरोपी गिरफ्तार और 817 गाड़ियां जब्त।
- करौली: 52 एफआईआर दर्ज, 99 आरोपी गिरफ्तार और 77 गाड़ियां जब्त।
- कोटा: 33 एफआईआर दर्ज, 51 आरोपी गिरफ्तार और 36 गाड़ियां जब्त।
- बूंदी: 13 एफआईआर दर्ज, 19 आरोपी गिरफ्तार और 14 गाड़ियां जब्त।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि यद्यपि स्थानीय स्तर पर गिरफ्तारियां और गाड़ियां जब्त करने जैसी कार्रवाई चल रही है, लेकिन चंबल अभयारण्य को खनन माफियाओं से हमेशा के लिए सुरक्षित रखने के लिए केवल तात्कालिक छापे काफी नहीं हैं। इसके लिए अब राजस्थान सरकार को एक स्थाई, पारदर्शी और सक्रिय प्रशासनिक ढांचे तैयार करना होगा।

