सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 498-ए के तहत एक पति को दी गई सजा को खारिज करते हुए उसे बरी कर दिया है। अदालत ने महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि बिना किसी विशिष्ट घटना या तारीख के लगाए गए सामान्य और सर्वव्यापी आरोप (general and omnibus allegations) किसी भी आपराधिक मामले में दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकते।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने उड़ीसा हाई कोर्ट और निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के फैसलों को पलटते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य धारा 498-ए के तहत क्रूरता की आवश्यक शर्तों को साबित करने में विफल रहे हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक विवाहित महिला द्वारा कीटनाशक खाकर की गई आत्महत्या से जुड़ा है। मृतका के पति (अपीलकर्ता) और उसके सास-ससुर पर दहेज की मांग को लेकर लगातार मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगाया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने दहेज की मांग का कोई पुख्ता सबूत न मिलने और ससुर (A2) द्वारा कथित तौर पर लिखे गए दहेज मांग पत्र के साबित न होने के बाद, सभी आरोपियों को धारा 304-बी (दहेज मृत्यु) के गंभीर आरोपों से बरी कर दिया था।
हालांकि, मृतका के भाइयों और चचेरे भाई (गवाह PW2 से PW5) की गवाही और मृतका द्वारा अपने भाई (PW3) व पिता को लिखे गए कथित बिना तारीख वाले दो पत्रों (Exts. 6 व 7) पर भरोसा करते हुए ट्रायल कोर्ट ने माना कि आरोपियों ने गैर-कानूनी मांगें पूरी न होने पर मृतका को प्रताड़ित किया था। दिलचस्प बात यह है कि ट्रायल कोर्ट ने खुद अपने फैसले में यह दर्ज किया था कि ये आरोप “बिना किसी विशिष्ट उदाहरण, तारीख या समय के सामान्य और सर्वव्यापी बयानों के रूप में थे।” इसके बावजूद, कोर्ट ने आरोपियों को धारा 498-ए/34 IPC और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 (DP Act) की धारा 4 के तहत दोषी पाते हुए तीन साल के सश्रम कारावास और ₹5,000 जुर्माने की सजा सुनाई।
मामले की अपील पर हाई कोर्ट ने परिस्थितियों की समग्रता को देखते हुए दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत सजा को रद्द कर दिया। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने माना कि मामले में कोई विशिष्ट प्रताड़ना की घटना साबित नहीं हुई है जो धारा 498-ए के दायरे में आए, लेकिन फिर भी उसने “साक्ष्यों में क्रूरता के कुछ विवरणों के आने” का हवाला देते हुए धारा 498-ए के तहत सजा को बरकरार रखा। हालांकि, हाई कोर्ट ने पति (A1) की सजा घटाकर छह महीने और सास-ससुर (A2 व A3) की सजा क्रमशः एक महीने और 15 दिन कर दी। सास-ससुर को परिवीक्षा अधिकारी की निगरानी में रहने की शर्त पर प्रोबेशन (Probation of Offenders Act, 1958) पर रिहा भी कर दिया गया था।
पक्षों के तर्क
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता (पति, जिसने अकेले इस फैसले को चुनौती दी थी) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कैलाश वासुदेव पेश हुए। वहीं, ओडिशा राज्य का पक्ष सरकारी वकील सुश्री अंकिता चौधरी ने रखा।
अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि जब निचली अदालतें पहले ही दहेज की मांग के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर चुकी हैं, तो बिना किसी ठोस साक्ष्य या विशिष्ट घटना के केवल अस्पष्ट और सर्वव्यापी आरोपों के आधार पर धारा 498-ए के तहत दोषसिद्धि को जारी रखना पूरी तरह से विरोधाभासी और न्यायसंगत नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय का कानूनी विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले महिला की मौत से जुड़े चिकित्सकीय और तथ्यात्मक पहलुओं की समीक्षा की। अदालत ने पाया कि मौत कीटनाशक के सेवन से हुई थी, जिसकी पुष्टि पड़ोस की एक महिला (PW9)—जिसने मृतका को कीटनाशक पीते देखा था—और पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर (PW11) की गवाही से हुई।
इसके बाद कोर्ट ने धारा 498-ए के तहत क्रूरता साबित करने के लिए पेश किए गए साक्ष्यों का गहराई से विश्लेषण किया। मृतका के परिजनों (PW2, PW3 और PW5) के बयानों पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा:
“…दहेज की मांग के संबंध में दी गई गवाही सामान्य और सर्वव्यापी प्रकृति की थी। मृतका का भाई (PW3) कहता है कि शादी के दस दिन बाद जब उसके पिता मृतका से मिलने गए, तब उसने दहेज की मांग और इस वजह से होने वाले उत्पीड़न की बात बताई थी… लेकिन न तो किसी विशिष्ट मांग का उल्लेख किया गया, न मांग करने वाले व्यक्ति को इंगित किया गया और न ही किसी विशिष्ट घटना का साक्ष्य दिया गया, जैसा कि हाई कोर्ट ने भी सही माना था।”
अदालत ने पारिवारिक विवाद को सुलझाने के लिए बुलाई गई कथित ग्रामीण पंचायत (समाज) की अभियोजन कहानी में भी गंभीर विसंगतियां पाईं:
- गवाह PW5 ने दावा किया कि इस बैठक में छह लोग शामिल थे, जिनमें PW6 भी थे। लेकिन जांच अधिकारी (PW10) ने अदालत को बताया कि पुलिस को दिए बयान में PW6 ने ऐसी किसी पंचायत या अपनी भागीदारी का कोई जिक्र नहीं किया था, जिसके कारण निचली अदालतों ने भी PW6 की बात पर भरोसा नहीं किया।
- एक अन्य स्वतंत्र गवाह (PW4) ने खुद को पंचायत का हिस्सा बताया, लेकिन उसका नाम PW5 द्वारा दी गई छह सदस्यों की सूची में कहीं नहीं था।
इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा मृतका के लिखे बताए गए पत्रों (Exts. 6 और 7) पर भी गंभीर सवाल उठाए। न्यायालय ने इसमें चार मुख्य खामियों को रेखांकित किया:
- पत्र किसने पुलिस को सौंपे, इस पर विरोधाभास था (भाई PW3 का दावा था कि उसने पत्र सौंपे, जबकि जांच अधिकारी और जब्ती के गवाहों PW6 व PW8 के अनुसार पत्र पिता द्वारा दिए गए थे)।
- पत्रों पर कोई तारीख अंकित नहीं थी।
- जांच अधिकारी ने मृतका के भाई के उस दावे को सिरे से खारिज किया जिसमें उसने डाक के लिफाफे सौंपने की बात कही थी।
- सबसे महत्वपूर्ण रूप से, अभियोजन पक्ष ने यह सत्यापित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया कि पत्रों की लिखाई वास्तव में मृतका की ही थी या नहीं।
इन पत्रों की विषय वस्तु पर विचार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा:
“अस्पष्ट पत्रों की सामग्री… से उत्पीड़न या प्रताड़ना का कोई स्पष्ट मामला सामने नहीं आता, हालांकि इसमें दोनों परिवारों के बीच मतभेद होने का संकेत जरूर मिलता है… परिस्थितियों की समग्रता में, विशेषकर जब लिखाई का मृतका का होना ही साबित नहीं किया गया है, इन कथित पत्रों पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता।”
आईपीसी की धारा 498-ए के कानूनी दायरे को स्पष्ट करते हुए न्यायालय ने कहा:
“हम इस तथ्य से पूरी तरह अवगत हैं कि धारा 498-ए को आकर्षित करने के लिए केवल दहेज की मांग का होना ही आवश्यक नहीं है, क्योंकि पति या उसके परिवार द्वारा की गई कोई भी गैर-कानूनी मांग इसके स्पष्टीकरण (b) के दायरे में आती है। इसके अतिरिक्त, धारा 498-ए का स्पष्टीकरण (a) किसी भी ऐसे जानबूझकर किए गए कृत्य को ‘क्रूरता’ मानता है जो पत्नी को आत्महत्या करने के लिए विवश कर दे।”
परंतु वर्तमान मामले के साक्ष्यों की कमजोरी पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने आगे कहा:
“लेकिन यहाँ गवाही के रूप में पेश किए गए साक्ष्य किसी भी तरह की गैर-कानूनी मांग या शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना के ऐसे किसी कृत्य को उजागर नहीं करते, जैसा कि हाई कोर्ट ने भी सही माना था। फिर दोषसिद्धि क्यों दी गई, यही यक्ष प्रश्न है।”
न्यायालय का निर्णय
सर्वोच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि रिकॉर्ड पर मौजूद मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य धारा 498-ए के तहत अपराध की पुष्टि करने में पूरी तरह असमर्थ हैं। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत और हाई कोर्ट के फैसलों को उलट दिया।
न्यायालय ने अपीलकर्ता (पति) को सभी आरोपों से बरी करते हुए निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में उसकी हिरासत की आवश्यकता न हो, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।
मामले का विवरण
- केस का शीर्षक: गंदाधीपा साहू बनाम ओडिशा राज्य एवं अन्य
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या ——— / 2026 (स्पेशल लीव पिटीशन (क्रिमिनल) नंबर 21118/2025 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
- फैसले की तिथि: 26 मई, 2026

